देवी उवाच

 


राधा का ब्याह हुए पाँच दिन हो गए। उसके बाद वह मायके का फेरा लगाकर आज सुबह ससुराल चली गई। सारे मेहमान और नाते रिश्तेदार भी लौट गए। घर अचानक खाली सा लगने लगा। लेकिन कुसुम को इसी खालीपन का इंतजार था। वह राधा की कही बात पर अकेले में सोच-विचार करना चाह रही थी। वैसे सोचना भी क्या है , और सच तो यह है कि सोचकर होना भी क्या है ! हाँ एक बात है कि साल भर वह जिस बात को सच समझ रही थी वह आद्योपांत झूठ निकली। राधा ना बताती तो कुसुम और राधा के पिता देवधर ने उसे सच ही मानते रहना था। वास्तव में देवधर तो अभी भी सच ही मान रहे हैं।राधा ने केवल माँ से बात की है पिता से नहीं , और कुसुम ने उन्हें बताया ही नहीं है। शादी के ताम झाम के बीच इन बातों का न मौका था और ना जरूरत। लेकिन अब वह सोच में पड़ गई है कि उसे पति से बात करनी चाहिए या नहीं।

सब रिश्तेदार लौट गए तब देवधर और कुसुम बरामदे में ही बैठ गए। देवधर के चेहरे पर सुकून था और कुसुम के चेहरे पर अभी भी व्याकुलता थी। तभी तो देवधर ने उसके कंधों को झकझोरते हुए हँसते हुए कहा, " अब तो मुस्कुरा दो राधा जी की माता जी..."
कुसुम थोड़ा मुस्कराई , फिर पूछा , " चाय बना दूँ ?"
" तुम तो रोज ही बनाती हो , आज मैं बनाता हूँ। तुम भी क्या याद करोगी "  देवधर ने कहा और उठ गए।
कुसुम ने  ना कुछ कहा और ना ही उन्हें रोका। वह चाह भी यही  रही थी। जब तक चाय बनकर आती उसका दिमाग फिर उसी प्रश्न में उलझ गया।

देवधर दो प्याली चाय के साथ एक बिस्कुट का पैकेट लाये। एक प्याली कुसुम को देकर बिस्कुट निकाले और उसे  देते हुए बोले , " सच ही कहते हैं, भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है , है ना ?
" मैं सदा से यही तो कहती आयी हूँ , तुमने अब माना है " कुसुम ने बिस्कुट लेते हुए कहा।
" हाँ , मानता हूँ। लेकिन बेटी के ब्याह की चिंता हर बाप को होती है। फिर राधा के साथ दो बार जो हुआ उसके बाद तो सचमुच घबरा गया था। "

कुसुम कुछ नहीं बोली। डर और चिंता तो उसे भी थी। राधा उनकी इकलौती बेटी है। वह फौज में जाना चाहती थी। उन्होंने , विशेषकर देवधर ने उसे रोका नहीं। पढ़ाई में वह अव्वल रही और खेलकूद या अन्य कार्यकलापों में भी हमेशा से आगे रही है। आस-पड़ोस के लोगों में वह लोकप्रिय है। जब पिता ने उसे कॉलेज आने-जाने के लिए स्कूटी दिलवानी चाही तो ज़िद करके मोटर साइकल ले लिया। निडर तो वह शुरू से रही है। धड़ल्ले से मोटर साइकिल चलाकर शहर भर घूमती। फौज में जाने के लिए साहस और दृढ़ता तो चाहिए ही , यही सोचकर देवधर ने कभी टोका नहीं। लेकिन राधा सभी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के बावजूद फौज में नहीं जा सकी। वह उनके शारीरिक मापदण्डों पर पूरी नहीं उतरी। अपने स्वभावानुसार वह दो दिन घर पर उदास बैठी रही लेकिन तीसरे दिन फिर बाइक उठाकर घूमने निकल पड़ी। फौज में जाने का सपना पूरा न होने की भरपाई उसने बाइक मैराथॉन में हिस्सा लेकर की। लद्दाख तक बाइक चला कर गई और दूसरे स्थान पर रही। स्थानीय अखबारों और टीवी चैनलों पर उसे बहुत सराहा गया। कई चैनलों और समाचार पत्रों में उसके इंटरव्यू आये। स्थानीय स्कूलों में छात्रों का मनोबल और साहस बढ़ाने के लिए उसे बुलाया जाता। शहर में मिल रही लोकप्रियता से फौज में जाने के अधूरे सपने का दुःख जाता रहा।

वह पच्चीस की हो गई तो देवधर को उसके ब्याह की चिंता होने लगी। जात-बिरादरी में वर की तलाश शुरू हुई। देवधर ने सपरिवार अपने पैतृक गाँव जाकर कुलदेवी की पूजा अर्चना करके दामाद खोजने का कार्य विधिवत आरंभ किया।

देवधर को अपने कुलदेवी पर अटूट विश्वास है। कोई भी काम शुरू करने से पहले वह कुलदेवी का आशीर्वाद लेने गाँव जरूर जाते है। पूजा अर्चना हो जाने के बाद वे भजन संध्या के लिए मंदिर के प्रांगण में बैठ गए। गाँव के बूढ़े-बुज़ुर्गों के लिए हर शनिवार को भजन संध्या में बैठना नियम है। देवधर , कुसुम और राधा को एक लंबे अरसे बाद यह अवसर मिला था।

सत्संग में भक्तिपूर्ण कीर्तन गूँज रहा था। तभी गाँव में अपने धार्मिक कार्य-कलापों के लिए जानी जानेवाली दुर्गा भाभी के शरीर में देवी की सवारी आ गयी। वे खुले बालों को झटके से लहराते हुए झूमने लगी।  उन्हें देखकर भजन मंडली को भी उत्साह मिल रहा था। भजनों का दौर अपने चरम पर हो तो गाँव में यह सब  होना स्वाभाविक माना जाता है। गाँव वालों की ऐसी मान्यता है कि देवी उन्हीं के शरीर में आती हैं जिनकी आत्मा पवित्र और शुद्ध हो। इसलिए ऐसे लोगों को गाँव में सम्मान और आदर की दृष्टि से देखा जाता है। देवी आने पर कई बार लोग उनसे अपनी समस्याओं को दूर करने के उपाय भी पूछते हैं , और कभी - कभी देवी स्वयं ही किसी को बिना पूछे उनकी चिंताओं के निवारण के उपाय बताती हैं। देवी की सवारी आने पर भाभी के हावभाव एकदम बदल जाते।

तभी दुर्गा भाभी ने देवधर की तरफ देखा और दोनों हाथों को उनके सिर पर फेरते हुए बोली , " संभलकर कदम बढ़ाना , मंगल होगा। "  
इसे देवी का निर्देश मानकर वे घर लौट आए।

कुछ हफ्तों में ही राधा के लिए दिल्ली में एक रिश्ता मिला। लड़का एक अमेरिकी कम्पनी में अच्छे पद पर कार्यरत था, खाता-पीता समृद्ध परिवार था। लड़के वालों ने पहली मुलाकात के लिए उन्हें ही दिल्ली आने को कहा। कुसुम, राधा और स्वयं देवधर को लड़का और परिवार पसंद आ गए। छोटे से पारिवारिक समारोह में रोके की रस्म कर ली गई। लेकिन विवाह के लिए कुछ महीनों की बाध्यता थी। लड़के को तुरंत छुट्टी मिलना संभव नहीं था और उसके बाद शुभ मुहूर्त दो महीने बाद ही था। लगभग नौ महीनों बाद ही विवाह संभव था। इस प्रयोजन पर किसी को आपत्ति नहीं थी।

सबकुछ ठीक चल रहा था या कम से कम सब ठीक दिख रहा था। राधा और उसके मंगेतर के बीच फोन पर संपर्क था। देवधर और कुसुम आश्वस्त थे कि इस अवधि में दोनों को एक दूसरे को समझने का मौका मिल रहा है।

लगभग तीन महीने बाद एक दिन समधी ने सूचना दी कि वे घर आ रहे हैं। कुसुम ने उनके आवभगत की बढ़ चढ़कर तैयारी की। भोजन की बेहतरीन व्यवस्था के साथ - साथ उनके मनोरंजन के लिए शहर घूमने की योजना भी बनायी। लेकिन दोपहर को जब उनकी गाड़ी घर के सामने आकर रुकी , तो केवल लड़के के पिता को आता देखकर उन्हें निराशा हुई। अचानक उनसे मिलने आने के कारण के बारे में सोचकर मन अनजानी आशंका से व्याकुल हो गया।

वे राधा से बहुत प्यार से मिले। कुसुम और देवधर से भी मीठे शब्दों में बातचीत करते रहे। देवधर का पता नहीं , लेकिन कुसुम को उनका आना असामान्य लग रहा था। भोजन के बाद उन्होंने  कुसुम से उसकी पाक कला की प्रशंसा में कसीदे पढ़ दिये। राधा अपने कमरे में चली गई तब समधी जी ने आने के कारण पर चर्चा शुरू की।

" आपने तो तैयारी शुरू कर ही दी होगी...लड़की वालों के लिए जितना भी समय मिले कम ही होता है..., है ना देवधर भाई ? " कहकर वे जबरदस्ती हँसने से लगे। कुसुम ने पति की और देखा तो उनकी आँखों में भी प्रश्नचिह्न था। पर वे कुछ नहीं बोले।
" अब बिरादरी वालों को पता चला कि हमनें बेटे का रिश्ता कर दिया है तो कुछ तो नाराज़ ही हो गए... बताइये..." उन्होंने ही बात आगे बढायी।
" उन्हें तो खुश होना चाहिए...भला नाराज़गी की क्या बात है इसमें ?" देवधर कुछ असमंजस में बोले।
" अजी देवधर साहब ,अच्छे रिश्ते पर सबकी नजर होती है। आप खुद सोचो , एक तो लड़का अमेरिकी कम्पनी में , यानि देर-सबेर वह अमरीका तो जायेगा ही। उसपर छत्तीस लाख का पैकेज...लालच तो आयेगा ही। आप भाग्यशाली हैं , आपने दाँव मार लिया। " वे अपनी ही बात पर जोर से हँसे।
" आपका कहना ठीक है , लेकिन जोड़ी बराबर की है , हमारी लड़की भी उस लायक है तभी तो आपको पसंद आयी... "  देवधर ने माहौल हलका करने की कोशिश की।
" मैंने बिल्कुल यही कहा उनसे ... बिल्कुल यही , "  वे शब्दों पर अनावश्यक जोर देते हुए बोले।
" जनाब , मुझसे कहने लगे कि लड़की को थार में बिठाकर विदा करेंगे...तो मैंने भी कह दिया कि इसमें कौन सी बड़ी बात है ? इतना तो देवधर साब भी कर देंगे , एक ही तो बिटिया है...ठीक बोला ना..."
कुसुम और देवधर की अनायास नज़रे मिली।
" ले...लेक.... लेकिन भाई साहब... ये तो..."  देवधर को शब्द ही नहीं सूझ रहे थे।
" देखो देवधर साहब , जिंदगी में एक बार यह मौका मिलता है , आपकी तो वैसे भी एक ही बच्ची है...है कि नहीं...ठाठ और शान तो उसकी ही बढ़ेगी...बाकी आप समझदार हैं...समाज में इज्ज़त के लिए थोड़ा बहुत करना ही पड़ता है..."
देवधर और कुसुम चुप रहे।
" लकिली आपके पास बहुत टाइम है... हाँ फैसला अलबत्ता जल्दी करना पड़ेगा , मैं भी उनको जवाब देने लायक बनूँ..." 
कहते हुए वे उठे , दोनों हाथ जोड़कर बोले , " आज्ञा है ? "
फिर कुसुम की ओर मुड़े , " भोजन बहुत स्वादिष्ट था भाभीजी , माँ का असर बेटी पर भी जरूर होगा..."  वे नकली सी हँसी के साथ बोले। कुसुम और देवधर भी मुस्कुराने का असफल प्रयास कर रहे थे।
राधा से मिलकर जाने की बात न उन्होंने की और ना देवधर ने।

उनके निकलते ही देवधर बरामदे में पड़ी कुर्सी पर धम्म से बैठ गए। कुसुम भी तनाव में थी। वह जाकर पानी ले आयी। देवधर ने ग्लास उठाया लेकिन उसे हाथ में लिये बैठे रहे।

" अब क्या करोगे ? "  कुछ देर की स्तब्धता  के बाद कुसुम  के सवाल ने सन्नाटा तोड़ा। देवधर के चेहरे पर भावावेग की असंख्य रेखाएं बन-मिट रही थी।
" ये लोग ऐसा भी कर सकते हैं..., नहीं सोचा था... थार देना मेरे बस का तो नहीं है। "
कुसुम ने हताशा और निराशा की एक गहरी साँस ली। फिर बोली ,
" अभी शुरू किया है , कहाँ जाकर रुकेंगे क्या पता...! मुझे लग ही रहा था कि इस तरह अचानक  आने का कोई मतलब तो होगा। "

उस रात कुसुम और देवधर सारी रात जागकर आने वाली स्थिति को संभालने का तरीका सोचते रहे। समधी जो शर्त रख गए थे , देवधर के लिए वह संभव नहीं था। राधा को पता लगा तो उसने स्पष्ट कह दिया कि वह लड़के वालों की शर्तों पर शादी कभी नहीं करेगी , रिश्ता टूटता है तो टूट जाए। हुआ भी वही। राधा ने लड़के को फोन पर ख़री-ख़री सुना दी और खुद ही रिश्ता करने से मना कर दिया। उन लोगों ने बेटे को दिये हुए उपहार आदि लौटा दिए। फिर देवधर ने भी वैसे ही किया।     

देवधर को मायूसी तो हुई , लेकिन राधा के साहस और परिपक्वता से उन्हें बहुत संबल मिला। रिश्तेदारों और आस - पड़ोस में भी राधा की हिम्मत और आत्मविश्वास के आगे किसी को कुछ बोलने का साहस नहीं हुआ।

छह महीने बीत गए। कुसुम और देवधर ने बहुत जगह रिश्ते की बात की लेकिन  बात बन नहीं सकी। कहीं उम्र आड़े आ जाती , कहीं लड़का अच्छा नहीं लगता और कहीं कुंडली नहीं मिलती। तीनों एक बार फिर गाँव गए। कुलदेवी की पूजा अर्चना की। भजन सन्ध्या के बाद दोबारा दुर्गा भाभी पर देवी की सवारी आ गई। इस बार देवधर ने स्वयं बेटी के रिश्ते की बात की। बहुत देर की चुप्पी के बाद उन्होंने एक ही शब्द बोला - संघर्ष।

देवधर अब रिश्ते की बात करते हुए सचेत हो गए। लेन-देन के बारे में स्पष्टवादी रहना उचित समझा। ऑनलाइन संस्था के जरिये एक रिश्ता पसंद आ गया। लड़का बंगलुरु में रहता था और उसके माता-पिता अजमेर। परिवार और वर के विषय में आपसी बातचीत के बाद देवधर सपरिवार अजमेर गए। सबकुछ ठीक होता रहा। देवधर ने लड़के वालों से स्पष्ट कह दिया था कि वे किसी प्रकार का दहेज नहीं देंगे। लड़के वालों ने भी स्वीकार किया कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए , बल्कि यदि देवधर  आर्य समाज में सादगी से विवाह करना चाहते हो तो भी उन्हें आपत्ति नहीं है। लेकिन देवधर अपनी इकलौती बेटी की शादी सादगी से ही लेकिन पूरी परंपरागत तरीके से करना चाहते थे।

पहली मुलाकात के महीने भर बाद राधा की उस लड़के के साथ सगाई हो गई। कुसुम और देवधर उनके परिवार के व्यवहार से आश्वस्त हो गए। शादी की तारीख दो महीने बाद की तय कर दी गई। तैयारी शुरू हो गई। देवधर और उनके समधी में फोन पर बात होती रहती। यही नहीं राधा की होने वाली सासु माँ भी उससे और कुसुम से बात करती। तैयारी के विषय में पूछताछ होती। कभी राधा से कपड़ों और गहनों के संबंध में पसंद-नापसन्द की जानकारी ली जाती। निमंत्रण पत्र छपकर आ गए तो देवधर सपरिवार गाँव जाकर कुलदेवी को अर्पित कर आये। फिर नाते-रिश्तेदारों, परिचितों को दिये गए। राधा खुश थी और उसकी खुशी से माता पिता भी। एक दिन देवधर को अचानक एक विचार कौंधा कि दुर्गा भाभी के माध्यम से देवी ने संघर्ष की बात की थी , लेकिन देवी की ही कृपा से सारे काम नियोजित तरीके से सम्पन्न हो रहे हैं। तब देवधर कहाँ जानते थे कि अगले क्षण क्या होने वाला है !

शादी को दस दिन रह गए थे। एक दिन अचानक समधी जी की गाड़ी दरवाजे पर रुकी। बिना किसी पूर्वसूचना के उनका आना सामान्य तो हो ही नहीं सकता। लड़के के मातापिता , परिवार में सबसे बड़े उसके ताऊ और मामा जी गाड़ी से उतरे। सभी के चेहरे गम्भीर थे। कुसुम और देवधर ने उत्साह दिखाते हुए स्वागत किया लेकिन मेहमान जबरन मुस्कुराते से लगे।
" क्या बात है , ऐसे अचानक कैसे आना हुआ... सब कुशल तो है...? "  देवधर से रहा नहीं गया। समधी हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
" मुझे क्षमा कीजिए भाई साहब , हम बहुत शर्मिंदा हैं..." उनकी आवाज भर्रा गई। उनकी पत्नी की आँखों से आँसू बहने लगे।
" ऐसा क्या...."  देवधर का वाक्य पूरा होता उससे पहले वे बोले ,
" मेरे लड़के ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा...उसने शादी से इनकार कर दिया है....बहुत शर्मिंदा हूँ भाई साहब..."
देवधर और कुसुम को मानो काटो तो खून नहीं ...
" ये कैसी बच्चों वाली बात कर रहे हैं आप...? मेरी... मेरी बच्ची की जिन्दगी का सवाल है...मज़ाक कर रहे हैं क्या... ? "  देवधर की आवाज काँप रही थी। कुसुम जड़वत हो गई। कमरे में कुछ देर सन्नाटा छा गया।
" बतायें तो हुआ क्या ? " देवधर ने पूछा।
" क्या कहूँ... किसी दूसरी लड़की के साथ रहा है बंगलौर में... "
" तो क्या उसकी नींद अब टूटी है , मेरी बेटी की कोई इज्ज़त है कि नहीं....अजीब अहमकाना बात कर रहे हैं आप...."  देवधर को अपने ऊपर गाज गिरती महसूस हो रही थी। उनके स्वर में गुस्सा और निराशा घुलमिल गई।
" माफी चाहता हूँ , क्या करूँ मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा भाई साहब , परिवार की , आपकी , हमारी , सबकी इज्ज़त का गुड़गोबर कर दिया..."

वे बहुत शर्मिंदा तो थे , लेकिन मजबूर भी। उनके बेटे ने एक दिन पहले ही उन्हें बताया कि बंगलौर में  किसी लड़की के साथ रिश्ते में था और वह लड़की शायद अब उसे धमकी देने लगी थी। विकट स्थिति थी। लड़के के मातापिता असहाय थे , देवधर तो थे ही। बंगलूरू में लड़के का किसी लड़की से प्रेम सम्बन्ध था जिसके बारे में स्पष्टतः  मातापिता को कोई जानकारी नहीं थी। यही नहीं, लड़का - लड़की कुछ समय लिव - इन में साथ रहे भी। लड़की के मातापिता ने पता लगते ही दखल दिया और लड़की को ले गए। लेकिन अब जब उसे पता चला कि लड़का शादी रचा रहा है तो उसने दोबारा संपर्क किया। इस सारे ऊहापोह में शादी का दिन नजदीक आ गया और लड़के ने आनन - फानन में शादी से इनकार कर दिया। अब यह तो तय ही था कि उसकी शादी उसकी प्रेमिका से हो या ना हो , राधा से तो कतई नहीं हो सकती। लेकिन यह घटना राधा और उसके माता-पिता के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण थी। शादी को गिनती के दिन बचे थे , आमंत्रण पत्र बाँटे जा चुके थे , शेष सभी इंतजाम किये जा चुके , ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाए यह किसी को सूझ नहीं रहा था। लड़के वालों ने देवधर और कुसुम ही नहीं राधा से भी हाथ जोड़कर क्षमा याचना की। लेकिन जो होना था हो गया। देवधर बहुत निराश हो गए। चिंता और परेशानी से तबियत बिगड़ने लगी। राधा भी चुप हो गई। यह दूसरी बार था जब परिवार , आसपड़ोस सब जगह उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

समय तो बीतना ही था , बीतता रहा। देवधर और कुसुम की चिन्ता जाने का नाम नहीं ले रही थी। देवधर को तनाव के चलते रक्तचाप की शिकायत होने लगी। एक - दो बार अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ गई।ऐसे में उन्होंने फिर गाँव जाने का मन बना लिया। कुलदेवी के सामने देवधर हाथ जोड़कर बैठ गए। चाह तो वे रहे थे कि दुर्गा भाभी के माध्यम से जाने कि आगे कैसा और कौन सा कदम उठाया जाये , लेकिन पंडितजी न बताया कि वे चार धाम की यात्रा पर गई हैं।

मंदिर में भजन कीर्तन चल रहा था। देवधर, कुसुम और राधा आँखें मूँदकर बैठे थे। तभी किसी ने देवधर की कोहनी पर थपकी दी। आँखें खोली तो उस व्यक्ति ने राधा की ओर इशारा किया। राधा अपना सिर वैसे ही घुमा रही थी जैसे दुर्गा भाभी देवी आने पर घुमाती हैं। कुसुम और आसपास के लोग भी उत्सुकता से देखने लगे। राधा पहली बार ही ऐसा कर रही थी। पंडितजी बोले , " आज बिटिया के आ गई माता रानी...देवधर बाबू , धन्य हो गए.."

कुछ देर बाद वह अपने मातापिता की तरफ मुड़ी, कुछ पल उन्हें देखती रही , फिर बोली , " बेटी का दुःख है ना... कुछ मत करो...वर खोजना बंद करो , वह खुद चलकर आयेगा ... भरोसा रखो... मंगल ही मंगल है..."

अपनी ही बेटी में माता का स्वरूप देखकर  देवधर भावुक हो गए।
आँसू बहने लगे, मानो माता ने पीड़ा हर ली। प्रणाम करके , स्वयं को माता के सम्मुख समर्पित करके वे लौट आए।

गाँव से लौटकर वे वास्तव में चिंतामुक्त हो गए। उन्हें तो यूँ भी अपनी कुलदेवी पर अटल विश्वास था। अब तो माता ने उनकी बेटी के माध्यम से ही उन्हें उपाय बता दिया तो चिंता क्या और क्यों करनी ? अपनी बेटी में माता का स्वरूप देखने के बाद उसके लिए उनके मन में वात्सल्य के साथ एक स्नेहसिक्त सम्मान और श्रद्धा भी जाग गई। राधा घर पर भी मंदिर में आँखें मूँदकर बैठती लेकिन उसपर माता की सवारी नहीं आयी। उस घटना के बाद राधा को एक अलग दृष्टि से देखा जाने लगा था , हालाँकि उसके व्यवहार में कुछ भी नहीं बदला। देवधर को तो देवी के कहे पर पूरा विश्वास था। 

राधा का रिश्ता  टूटे  नौ-दस महीने हो चले थे। देवी के कहे अनुसार उन्होंने लंबे समय तक उसके रिश्ते के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया। लगभग साल भर बाद उनके एक परिचित, जिनकी बेटी मानसी राधा की सखी थी , उनके घर आये। वे अपनी बेटी का विवाह कर चुके थे। उन्होंने देवधर के सामने एक रिश्ते का प्रस्ताव रखा। लड़का सेना में मेजर था। उन्होंने कहा कि वे उन्हें जानते हैं और उनसे राधा की बात कर आये है। लड़के वाले मिलने के लिए इच्छुक है। देवधर को देवी की बात याद आ गई। दोनों परिवार आपस में मिले , बातचीत हुई , एकदूसरे को पसंद किया और बात बन गई। पिछले दो अनुभवों के बाद कुसुम और देवधर थोड़ा घबराए हुए थे , लेकिन अपनी देवी की बात पर भरोसा रखकर कार्य सम्पन्न करते रहे।

विवाह में दो दिन बाकी थे। सब कुशल मंगल चल रहा था। रिश्तेदारों के आने से घर में गहमागहमी थी। कुसुम  राधा के साथ उसके  ससुराल ले जाने वाले कपड़ों को सूटकेस में संजो रही थी। देवधर विवाह के स्थल की तैयारी करने गए थे। तभी राधा ने कहा ,
" मम्मी देवी की कही बात सच होती है ? "
" देखा नहीं , पिछली दोनों बारी... फिर जब तेरे पर भी तो आई.. ," कुसुम बोली।
" लेकिन मम्मी...उस दिन..."  वह कुछ कहते कहते रुक गई। कुसुम ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
" मम्मी , उस दिन मेरे अंदर देवी नहीं थी.."  राधा ने डरते-डरते कहा। कुसुम का हाथ रुक गया।
" क्या कह रही है ? "
" देवी की सवारी नहीं आयी थी , मैंने अपने मन की बात कही थी..."

कुसुम हैरानी से बेटी को देखती रही , कोई आ ही ना जाए, ये सोचकर उठकर दरवाजा बंद किया।
" ये क्या कह रही है तू राधा ? पापा को झूठ बोला.... मंदिर में... देवी की....??! "  वह हतप्रभ थी।
" पापा टेंशन में घुले जा रहे थे... कुछ कहा तो मानते नहीं... बीमार होने लगे थे , देखा था ना आपने..,इसलिए देवी की बात बनाकर कह दिया...और देखो हो गया ना सब ठीक ? "

कुसुम समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे ! देवधर चिंता में घुले जा रहे थे , सच ही था। लेकिन राधा ने जो किया वो भी जायज़ नहीं लगा।
" भगवान की कृपा से ये रिश्ता आ गया नहीं तो , तू झूठी पकड़ी जाती... अच्छा लगता क्या ? "
" मेजर मुझे लद्दाख में मिले थे... "  अब तो कुसुम के आश्चर्य की सीमा नहीं थी।
" मतलब तू उनको भी पहले से ही जानती थी ? "
" नहीं , एक ही बार वहाँ मिले थे , बाइक मैराथॉन के फंक्शन में। बाद में फेसबुक पर कॉन्टैक्ट हुआ, लेकिन वहाँ भी उन्होंने कभी ज्यादा बात नहीं की। जब पापा की तबियत ठीक नहीं थी तब मैंने एक उदास सी कविता लिखी थी फेसबुक पर। उसे पढ़कर उन्होंने पूछा कि सब ठीक तो है ना। इतनी टेंशन हो रही थी तब उनको मैंने अजमेर वाली और पहले वाली बात बतायी।"
" तो रिश्ता कैसे भेजा उसने ? "
" वो तो मानसी के पापा के दोस्त मेजर के पापा के साथ काम करते थे आर्मी में। उन्होंने उनसे अपनी बात की... फिर उन्होंने अंकल से कहा..."
" तू क्या क्या कह रही है राधा... इतना सब रचा ...."
" आपको बताना तो था लेकिन पहले बताने का मौका मिला ही नहीं... फिर पापा को पता लगता कि उस दिन देवी थी ही नहीं तो...."
" अब भी जब पता चलेगा  ? "
" शादी के बाद आप बता देना ..."
कुसुम हैरान  थी , राधा की बातों पर भी , और भगवान की लीला पर भी। परेशान थी तो इस बात को लेकर कि देवधर की प्रतिक्रिया क्या होगी राधा की बात जानकर।

राधा का ब्याह  निर्विघ्न सुख-शांतिपूर्वक सम्पन्न हो गया। अब कुसुम राधा की बात बताने के लिए शब्द ढूँढ रही थी।
"  कुसुम , किस बात की चिंता में हो ? राधा मेरी बेटी है, तुम समझती हो मैं नहीं जानता उसे...हमारे बीच कुछ छुपा नहीं कुसुम , तुम जो कहना चाहती हो मैं जानता हूँ। राधा से विदाई के समय बात हो गई थी..." कुसुम को एक ही साथ आश्चर्य और निश्चिंतता का आभास हुआ।

फिर देवधर ने जो बताया उसे सुनकर विदाई के उस आखिरी पल को याद करते हुए कुसुम के चेहरे पर एक अजीब सा संतोष आ गया।

विदाई के वक्त जब देवधर ने राधा को गले लगाया था, तब राधा रो पड़ी थी। उसने पिता के कान में धीरे से कहा था, "पापा, मुझे माफ़ कर देना... मैंने आपसे..."
तब देवधर ने राधा के सिर पर हाथ रखकर, उसे चूमते हुए बीच में ही टोक दिया और हँसकर कहा — "पगली, बाप हूँ तेरा ! लद्दाख फतह करने वाली मेरी शेरनी अचानक सिर घुमाने लगे, तो क्या मैं समझूँगा नहीं ? तूने अपनी माँ को तो जरूर सब बता दिया होगा,., है ना...? पर मुझसे छिपाया। मैं जानता हूँ, उस दिन मंदिर में कुलदेवी भले ना आई हों, लेकिन मेरे लिए तो मेरी बेटी ही देवी बनकर खड़ी हो गई थी, जिसने डूबते हुए बाप को तिनके का सहारा दे दिया। जा, मेरी बच्ची खुश रह।"
राधा ने फटी आँखों से पिता को देखा था, और देवधर की आँखों में एक गहरी, समझदार और आश्वस्त करने वाली मुस्कान थी।

कुसुम ने चाय की आखिरी चुस्की ली। उसे अब समझ आया कि देवधर तो सब पहले से ही जानते थे। दरअसल वह अनकहा रहस्य जो वह सोच रही थी कि सिर्फ उसके और राधा के बीच है, वह देवधर और राधा के बीच का एक मूक समझौता था। दो औरतों ने नहीं, बल्कि पूरे परिवार ने एक-दूसरे के आत्मसम्मान और प्यार की रक्षा के लिए उस पवित्र झूठ को सच बनाए रखा था...

बरामदे में हल्की धूप फैल रही थी, उसकी गुनगुनाहट देवधर की मुस्कान में झलक रही थी। कुसुम के चेहरे की व्याकुलता अब पूरी तरह शांत हो चुकी थी।

© भारती बब्बर


( सुधि पाठकों से अनुरोध है कि कृपया टिप्पणी अवश्य करें और अपना नाम भी टिप्पणी के साथ अवश्य लिखें )


Comments

  1. बहुत बढ़िया 👌👍 हरेंद्र सिंह रावत

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    1. धन्यवाद हरेंद्र 🙏

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  2. "देवी उवाच्चो "
    तुम्हारे सशक्त लेखन के हिसाब से पहली लंबी दास्तान समतुल्य नहीं लगी लेकिन समापन से पहले कहानी ने तुम्हारी भाषा और लेखन में भारती ने अपनी छाप छोड़ी है.। मैं समीक्षक नहीं हूँ और विषय बोध भी अच्छा नहीं है लिहाजा प्रेजूडिसेज आड़े आ गई.। मैं नाचने वाले देवी देवता, बाबा, संत, तथाकथित जोगियों का साधारण तया हिमायती नहीं हूँ। इससे अंधविश्वास
    पनपता है। असाधारण का मुझे अनुभव नहीं है किस्से सुने है। तुम्हारा आशय भी तो अंत में यही है।बुरा मत मानना..।
    स्नेसिक्त शुभकामनायें।

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    1. ललित सिराड़ी

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    2. ललित सिराड़ी

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    3. आपकी तटस्थ प्रतिक्रिया बहुत ही अच्छी लगी सर। मैं पाठक से केवल प्रशंसा नहीं विवेचन चाहती हूँ। वैसे इस विषय पर लिखने का मेरा आशय इसे स्वीकारोक्ति देना बिलकुल नहीं है। मैंने ये देखा अवश्य है, लेकिन मैं मानती नहीं । आपका आभार और प्रणाम 🙏🏻🙏🏻

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  3. बहुत ख़ूब 👌🏻 यथार्थ के बिल्कुल क़रीब । गाँवों में ऐसा ही होता है 👌🏻

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  4. देवी जिस तरह से कही गई है, वह कहानी नहीं , सच्ची घटना लगती है और कहानी की ख़ूबसूरती भी यही है
    Sharda Rana

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    1. हर कहानी की प्रेरणा समाज के ही किसी पात्र अथवा घटना से मिलती है। 🙏धन्यवाद

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