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Showing posts from July, 2026

देवी उवाच

  राधा का ब्याह हुए पाँच दिन हो गए। उसके बाद वह मायके का फेरा लगाकर आज सुबह ससुराल चली गई। सारे मेहमान और नाते रिश्तेदार भी लौट गए। घर अचानक खाली सा लगने लगा। लेकिन कुसुम को इसी खालीपन का इंतजार था। वह राधा की कही बात पर अकेले में सोच-विचार करना चाह रही थी। वैसे सोचना भी क्या है , और सच तो यह है कि सोचकर होना भी क्या है ! हाँ एक बात है कि साल भर वह जिस बात को सच समझ रही थी वह आद्योपांत झूठ निकली। राधा ना बताती तो कुसुम और राधा के पिता देवधर ने उसे सच ही मानते रहना था। वास्तव में देवधर तो अभी भी सच ही मान रहे हैं।राधा ने केवल माँ से बात की है पिता से नहीं , और कुसुम ने उन्हें बताया ही नहीं है। शादी के ताम झाम के बीच इन बातों का न मौका था और ना जरूरत। लेकिन अब वह सोच में पड़ गई है कि उसे पति से बात करनी चाहिए या नहीं। सब रिश्तेदार लौट गए तब देवधर और कुसुम बरामदे में ही बैठ गए। देवधर के चेहरे पर सुकून था और कुसुम के चेहरे पर अभी भी व्याकुलता थी। तभी तो देवधर ने उसके कंधों को झकझोरते हुए हँसते हुए कहा, " अब तो मुस्कुरा दो राधा जी की माता जी..." कुसुम थोड़ा मुस्कराई , फिर पूछा ...

सरवन

जब वह घर से चला तब तक सूरज निकला नहीं था l बादलों की वजह से पौ फटने के बावजूद अंधेरा ही था। रोज ही वह इस समय घर से निकल जाता है। उसके घर से मॉडल टाऊन तक पहुँचने में उसे तेज कदमों से चलने के बाद भी बीस मिनट लग ही जाते हैं। उसकी कोशिश यही होती है कि वह साहब लोगों के उठने से पहले पहुँच कर अपना काम कर ले ताकि बाबुओं के दफ्तर के लिए निकलने पर उन्हें उनकी गाड़ी साफ और चमचमाती मिले। उसे जब से याद है वह यही करता आया है। उस इलाके के लगभग सभी लोग उसे जानते हैं और वह भी सबको पहचानता है। उसके बाद कितने ही लड़के आए और गए लेकिन वह टिका हुआ है। शायद इसलिए भी उसे सब पसंद करते हैं। मोहल्ले में कोई गाड़ी खरीदे तो उनकी मर्जी यही रहती है कि गाड़ी सरवन ही धोएगा , और सरवन ने भी किसी को निराश नहीं किया। उसे पता होता है कि कौन से साहब को कितने बजे गाड़ी तैयार चाहिए और वह उसी हिसाब से क्रमवार गाड़ियों की सफाई कर दिया करता है। रंगबिरंगी गाड़ियों को जब वह धो रहा होता है तब उसका ध्यान उसके रंग को निखारने और सजाने में ऐसा रमा होता है जैसे कि वह किसी निर्जीव गाड़ी को नहीं, एक जीते-जागते जीव को सँवार रहा हो। उसके ह...