देवी उवाच
राधा का ब्याह हुए पाँच दिन हो गए। उसके बाद वह मायके का फेरा लगाकर आज सुबह ससुराल चली गई। सारे मेहमान और नाते रिश्तेदार भी लौट गए। घर अचानक खाली सा लगने लगा। लेकिन कुसुम को इसी खालीपन का इंतजार था। वह राधा की कही बात पर अकेले में सोच-विचार करना चाह रही थी। वैसे सोचना भी क्या है , और सच तो यह है कि सोचकर होना भी क्या है ! हाँ एक बात है कि साल भर वह जिस बात को सच समझ रही थी वह आद्योपांत झूठ निकली। राधा ना बताती तो कुसुम और राधा के पिता देवधर ने उसे सच ही मानते रहना था। वास्तव में देवधर तो अभी भी सच ही मान रहे हैं।राधा ने केवल माँ से बात की है पिता से नहीं , और कुसुम ने उन्हें बताया ही नहीं है। शादी के ताम झाम के बीच इन बातों का न मौका था और ना जरूरत। लेकिन अब वह सोच में पड़ गई है कि उसे पति से बात करनी चाहिए या नहीं। सब रिश्तेदार लौट गए तब देवधर और कुसुम बरामदे में ही बैठ गए। देवधर के चेहरे पर सुकून था और कुसुम के चेहरे पर अभी भी व्याकुलता थी। तभी तो देवधर ने उसके कंधों को झकझोरते हुए हँसते हुए कहा, " अब तो मुस्कुरा दो राधा जी की माता जी..." कुसुम थोड़ा मुस्कराई , फिर पूछा ...