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लुका छुपी

 योगी बाबू के घर पर खासी चहल-पहल है। दोनों बेटियाँ, दामाद और उनके बच्चे सभी आये हुए हैं। बीते कल उनकी पत्नी की बरसी जो थी। बरसी की रस्म बहू,बेटे और बेटियों ने मिलकर अच्छी तरह पूरी कर दी। वैसे भी योगी बाबू को अपने बच्चों से, बहू और दोनों दामादों से कोई शिकायत नहीं है। सब उनकी इज़्ज़त करते हैं, बहू भी पूरा खयाल रखती है , पत्नी के जाने के बाद तो और भी। दोपहर को नाती-पोतों ने मिलकर फ़िल्म देखने का प्रोग्राम बना लिया। नयी फिल्मों में योगी बाबू को कोई रुचि नहीं है, ये जानते हुए बड़े नाती ने कहा , 'मैंने "लुकाछुपी" डाउनलोड कर रखी है नानू , घर पर ही देखेंगे।' ' हम सब देखेंगे दादू, आपको भी अच्छी लगेगी देखना , ' पोते का आग्रह था। ' अरे , पर ये तुम्हारी वाली नयी फिल्में मुझे नहीं रुचती।' 'दादू , ये मज़ेदार है , हँस-हँस कर पेट दुख जायेगा आपका ! आपके ज़माने की रोन्दू फिल्मों जैसी नहीं है ', पोते ने दलील दी तो वे हँसे बिना नहीं रहे। 'देख लीजिए बाबूजी , बच्चों का मन है ,' बेटे ने कहा तो योगी बाबू तैयार हो गये। लेकिन योगी बाबू तो फ़िल्म का विषय देखकर ही भौंचक...