सरवन
जब वह घर से चला तब तक सूरज निकला नहीं था l बादलों की वजह से पौ फटने के बावजूद अंधेरा ही था। रोज ही वह इस समय घर से निकल जाता है। उसके घर से मॉडल टाऊन तक पहुँचने में उसे तेज कदमों से चलने के बाद भी बीस मिनट लग ही जाते हैं। उसकी कोशिश यही होती है कि वह साहब लोगों के उठने से पहले पहुँच कर अपना काम कर ले ताकि बाबुओं के दफ्तर के लिए निकलने पर उन्हें उनकी गाड़ी साफ और चमचमाती मिले।
उसे जब से याद है वह यही करता आया है। उस इलाके के लगभग सभी लोग उसे जानते हैं और वह भी सबको पहचानता है। उसके बाद कितने ही लड़के आए और गए लेकिन वह टिका हुआ है। शायद इसलिए भी उसे सब पसंद करते हैं। मोहल्ले में कोई गाड़ी खरीदे तो उनकी मर्जी यही रहती है कि गाड़ी सरवन ही धोएगा , और सरवन ने भी किसी को निराश नहीं किया। उसे पता होता है कि कौन से साहब को कितने बजे गाड़ी तैयार चाहिए और वह उसी हिसाब से क्रमवार गाड़ियों की सफाई कर दिया करता है। रंगबिरंगी गाड़ियों को जब वह धो रहा होता है तब उसका ध्यान उसके रंग को निखारने और सजाने में ऐसा रमा होता है जैसे कि वह किसी निर्जीव गाड़ी को नहीं, एक जीते-जागते जीव को सँवार रहा हो। उसके हाथों को भी मानों हर गाड़ी की पहचान है। वह आँखें मूँदकर धोए तब भी उसके हाथ कार के शीशे और दरवाजों के घुमावदार कोनों पर यंत्रचालित से चल पड़ते हैं।
उसे याद था कि तीसरी मंजिल वाली मैडम ने सवेरे साढ़े छह बजे गाड़ी तैयार करने को कहा था। उसने चौकीदार के कमरे से बाल्टी, तौलिए और साबुन की बोतल उठायी और उनके दरवाज़े की घंटी दबा दी।
"आ गया सरवन, जल्दी हाथ चलाना, मुझे आधे घंटे में निकलना है," कहते हुए उन्होंने गाड़ी की चाभी उसे पकड़ा दी।
" हो जाएगा जी, फिकर नहीं करो आप," कहकर सरवन चाभी लेकर तेजी से मुड़ा।
बागीचे के नल से बाल्टी भरी और मैडम की कार धोने लगा। उसने मैडम की गाड़ी को धोकर सूखे तौलिए से पोंछ दिया , उड़ती–सी लेकिन गौर से एक नजर पूरी गाड़ी को देखा और वाइपर उठाकर खड़े कर दिये। वह गाड़ी धो चुकने के बाद ऐसा ही किया करता है ताकि उसे और गाड़ी के मालिक को पता चल जाए कि गाड़ी धुल चुकी है। चाभी जेब में डालकर वह दूसरी गाड़ी की ओर बढ़ गया। तभी मैडम को तेज कदमों से आता देखकर उसने चाभी देते हुए कहा ," लो मैडम जी चमका दी आपकी गाड़ी।" मैडम ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया , चाभी ली और गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी स्टार्ट करके मुड़ी और हॉर्न बजाकर सरवन को देखने लगी। सरवन भागकर गया और वाइपर नीचे कर दिये। मैडम तेजी से निकल गई।
सरवन को मैडम की गाड़ी सबसे अच्छी लगती है...नीले रंग की चमचमाती गाड़ी। बाहर से जितनी शानदार , अन्दर से भी उतनी ही सुन्दर। गाड़ी से मिलते –जुलते रंग की ही सीटें। उसे साफ करते हुए सरवन ने उसकी गद्देदार नरमी को महसूस किया है। डैशबोर्ड पर नीले काँच की गणपति की छोटी सी मूरत। कार हैंगर पर नीली डोर से बँधी छोटी–सी गुड़िया। एक सुगंध है जो मैडम से भी आती है और उनकी गाड़ी में भी हर समय रहती है। सरवन सिर्फ कल्पना ही करता है कि कभी वह इसकी सवारी करेगा... हालाँकि वह जानता है और अच्छी तरह से जानता है कि ऐसा हो ही नहीं सकता।
उसने एक–एक करके सभी गाड़ियों को धो दिया , फिर रुककर सबको देखा मानों निरीक्षण कर रहा हो कि कहीं कुछ छूट न गया हो। रविवार है इसलिए किसी को जल्दी नही। वह बागीचे की मुंडेर पर बैठ गया , जेब से बीड़ी निकाली और लंबा कश लेकर फेफड़ों में धुआँ भर लिया। उसके सामने गाड़ियों की लंबी कतार थी। वह गाड़ियों के नाम भी नहीं जानता लेकिन कौन सी गाड़ी किसकी है वह जानता है। वह बरसों से गाड़ियों को धोने का काम कर रहा है , लेकिन आज तक किसी गाड़ी में बैठकर देखा नहीं। वह नहीं जानता कि गाड़ी में बैठने का अनुभव क्या होता होगा। अलबत्ता गाड़ी के भीतरी हिस्से , सीटें , स्टीयरिंग , आदि देखकर ही वह बता सकता है कि कौन सी गाड़ी बेहतर है। यह बात बिल्कुल अलग है कि ऐसी जाँच और गाड़ियों का आपसी मूल्यांकन करना उसका अपना ही शौक है। न कोई उसे पूछता है और न सरवन ने किसी से कभी कहा है। भला कोई उसे पूछे भी क्यों ? गाड़ियों को लगन से साफ करके , धो-धाकर चमकाने में होने वाला सुख उसका है , सिर्फ उसका। साफ-सुथरी गाड़ी में बैठकर जब साहब या मेमसाब लोग सरवन को देखते हैं तो उनकी आँखों की मौन प्रशंसा सरवन को आनंद से भर देती है। उसे लगता है कि साहब लोगों की गाड़ी पर उसका भी कुछ अधिकार है और गाड़ी में बैठकर साहब लोगों को मिलने वाले सुख में उसका भी योगदान है।
उसने बीड़ी के ठूंठ को मसलकर मिट्टी में दबा दिया और बाल्टी उठाकर चौकीदार के कमरे में रख दी। जेब से चाभियों के गुच्छे निकालकर अलग–अलग करके सभी को लौटाने लगा। आज तक उससे चाभी लौटाने में भी गलती नहीं हुई।
सरवन जिनकी गाड़ियाँ धोता है , वे उसकी अम्मा को भी जानते हैं , क्योंकि वह उन्हीं घरों में काम किया करती थी। तब वह कभी–कभी अम्मा के साथ जाया करता था। जब अम्मा की सेहत गिरने लगी तो सरवन ने काम शुरू कर दिया। शुरू में जिनके घर अम्मा काम करती थी उन्होंने ही उसकी सिफारिश पर उसे काम दिया। सरवन ने मन लगाकर काम किया इसलिए धीरे–धीरे दूसरे घरों ने भी उसे रख लिया। सरवन ने सिर्फ पाँचवी कक्षा तक पढ़ाई की है। उसका बाप रिक्शा चलाता था। दस बरस हुए एक सड़क दुर्घटना में मर गया। तब से सरवन ने अपनी अम्मा का हाथ बंटाना शुरू कर दिया। चार साल पहले उसकी अम्मा भी गुजर गयी , तब से सरवन अकेला रह गया है। अब यह मोहल्ला और यहाँ के बाशिंदे उसका सबकुछ है। इसलिए वह रविवार को भी छुट्टी नहीं करता। घर बैठकर करे भी तो क्या। मन ही मन सोचा करता है कि रविवार को जब साहेब लोग घूमने जाते हैं तब भी तो गाड़ी साफ-सुथरी होनी चाहिए। जैसे आज नीली गाड़ी वाली मॅडम ने जाना था। वह साफ न करता तो क्या वैसी ही धूलभरी गाड़ी में जाती !
वह शुरू ही से रंग–बिरंगी गाड़ियों से मोहित होता रहा है। जब गाड़ी धोने का काम मिला तो वह बहुत खुश हुआ। अब अलग–अलग गाड़ियों को करीब से देखने और छूने का मौका मिल गया। जैसे–जैसे वह काम करने लगा गाड़ियों का मोह बढ़ता गया और गाड़ी में बैठकर देखने की चाह बलवती होती गई। पर ऐसी उसकी तक़दीर कहाँ ! वह गाड़ियों को अपना–सा समझ कर उन्हें सजाने जैसा धोया करता है और मन ही मन कल्पना के गोते लगाकर जी बहलाता रहता है।
पाँचवी कोठी वाले सेठजी का लड़का बंटी उसका दोस्त है। वह सरवन से बहुत बतियाता है। एक वही है जो सरवन के सपनों को भी जानता है। लेकिन उसके पास गाड़ी नहीं है , एक मोटरसाइकिल है जिसपर वह सरवन को घुमा चुका है। वह भी कार की सवारी का सपना देखता है। लेकिन सरवन की तरह कार में बैठकर सिर्फ सैर करना उसका सपना नहीं है। यूँ तो वह सैकड़ों बार कार में बैठकर दूर– दूर तक घूम चुका है। वह स्वयं को ड्राइवर की सीट पर देखता है , अपनी गाड़ी...स्टीयरिंग पर फिसलते उसके हाथ...इस कल्पना से ही उसे नशा आने लगता है। सरवन के साथ वह घण्टों अपने सपने के बारे में बोलता है। एक सरवन ही है जो उसका मज़ाक उड़ाए बिना उसकी सुनता रहता है। वह कई बार कह चुका है कि उसकी गाड़ी लेते ही सबसे पहले वह सरवन को लॉन्ग ड्राइव पर ले जायेगा। सरवन मुस्कुरा भर देता है,पर अपने मन की नहीं कहता कि वह बंटी की गाड़ी में जरूर घूमेगा लेकिन उसका सपना किसी भी कार में नहीं , मैडम की कार में बैठकर घूमने का है। उसे नहीं पता कि बंटी यह बात जानता है।
घर लौटने तक दोपहर के बारह बज जाते हैं और तब सरवन का अपना दिन शुरू होता है। कभी कभी सरवन काम निपट जाने के बाद भी देर तक चौकीदार की कोठरी में बैठा गप्प हाँकता रहता है। वह चौकीदार को मोहल्ले के बारे में पुरानी जानकारी देता रहता है क्योंकि वह सभी घरों की बातें जानता है। इस मोहल्ले के कई बच्चे उसके साथ ही बड़े हुए हैं। उनकी शादी भी हो चुकी और किसी–किसी के तो आगे अपने भी बच्चे हो चुके। अपनी उम्र का अंदाज़ा उसे उन्हें देखकर लग जाता है। उस हिसाब से सरवन पैंतीस पार कर चुका। ब्याह की उम्र भी निकल गयी। जब तक थी तब तो खुद को भी कभी सूझा नहीं। अब तो हो ही नहीं सकती। सरवन के पास कुछ नहीं है जिसे देखकर कोई लड़की उससे शादी करना चाहेगी , न रूप , न पैसा , न घर और न ही ढंग का कोई काम–धंधा। उसपर जितनी उम्र का उसने अंदाज़ लगाया है , वास्तव में सरवन उससे बड़ा ही लगता है। चेहरे का रंग साफ कहलाने लायक तो कभी था ही नहीं , उल्टा जिंदगी की ऊहापोह और उतार – चढ़ाव ने उसकी हिम्मत की ही तरह उसके रंग को और भी पक्का कर दिया है। पानी में देर तक काम करने से उसकी हाथ–पैर की उंगलियों में सूजन हो चुकी है जो किसी तरीके से कम नहीं होती। चल–चलकर घुटने टेढ़े हो गए हैं और उसकी चाल बिलकुल बेढ़ंगी। वह सालभर एक सरीखे कपड़े पहनता है। उसके कपड़ों की जरुरत साहब लोगों के पुराने कपड़ों से ही पूरी हो जाती है। उसे लगातार पानी में काम करना पड़ता है इसलिए वह एड़ी तक की पतलून नहीं पहनता , पुरानी पतलून को काटकर घुटनों तक की निकर और आधी बाजू की टी शर्ट या कमीज़ , यही पहनावा है उसका। सर्दियों में भी उसने पूरी बाजू का स्वेटर कभी नहीं पहना। पहले था नहीं इसलिए और अब उसके बगैर सर्दियाँ झेलने की आदत हो गई है इसलिए। आधी बाजू के एक स्वेटर से वह पूरा जाड़ा निकाल लेता है। बीड़ी पी–पीकर होंठों का रंग स्याह हो चुका है। उम्र से पहले ही बालों में सफेद रेशे आ गए हैं। कुल मिलाकर बात ये है कि सरवन ही आइने में खुद की छवि नहीं देख सकता तो किसी और से वह क्या उम्मीद करे ! लेकिन एक बात ये भी सही है कि थक – हार कर घर लौटकर जब रोटी बनाने बैठता है तब उसे किसी घरवाली की कमी ख़लती जरूर है। तब सरवन का जी करता है कि कोई होता जो उसके लिए रोटी सेक देता।
आजकल कभी–कभी सरवन को सुबह सवेरे जल्दी उठने को जी नहीं चाहता। जी करता है कि नींद के बिना ही बिस्तर पर लोटता रहे। लेकिन ऐसा न हो सकता है , न वह कर सकता है। आखिर साहबों और मेमसाहबों की आदत उसी ने तो बिगाड़ी है। अब तो आलम ये है कि रविवार को भी उसकी अपेक्षा की जाती है , हालाँकि उस दिन का अवकाश सरवन का अधिकार है। लेकिन वह ऐसा नहीं सोचता क्योंकि ये सब लोग उसे अपने ही लगते हैं।
पहली कोठी वाले साहब ने नई गाड़ी ली है। उनकी पहली गाड़ी सरवन ही धोता है। चमचमाती लंबी सफेद गाड़ी देखकर ही वह इस बात का इंतजार कर रहा था कि वे उस गाड़ी की धुलाई के लिए उससे कहेंगे। सुबह चाभी लेने गया तो पूछते–पूछते रह गया। चाभी लौटाने गया तो दरवाजे पर मेमसाहब थी। उसने चाभी पकड़ायी ही थी कि अंदर से साहब की आवाज सुनाई दी , " उसे कल से मना कर दो , "
" अरे हाँ , ...सुनो कल से तुम गाड़ी मत धोना ...,... हिसाब साहब कर देंगे सुबह। "
सरवन को शब्दों पर यक़ीन–सा नहीं हुआ। पूछना तो चाह रहा था कि वह नहीं तो कौन धोएगा , लेकिन मुँह से शब्द ही नहीं फूटे। वह तो कुछ और ही सोच रहा था...
अगली सुबह जब वह घर से निकला तो बेचैनी में कदम उठ ही नहीं रहे थे। मस्तिष्क में सैकड़ों सवाल गुत्थमगुत्था थे...वह क्यों नहीं धोएगा ? और अगर वह नहीं तो कौन ?
कल से ही एक तरह की बेचैनी हो रही है , दिल रोज से ज्यादा धड़क रहा है। सरवन ने एक घर की घंटी दबायी और चाभी लेकर गाड़ी धोता रहा। हाथ गाड़ी को धो–पोंछ रहे थे और मन किसी आशंका से भरा जा रहा था। काम निपटाकर वह चौकीदार की कोठरी में जा बैठा। जेब से बीड़ी निकाल कर सुलगा ली। नज़र बार–बार पहली कोठी वाली गाड़ी पर टिक रही थी। नई गाड़ी के बगल में ही पुरानी वाली भी खड़ी थी। सरवन को वो दिन भी याद है जब साहब ने पुरानी वाली गाड़ी खरीदी थी। तब से वही धोता आया है , लेकिन आज...
तभी गेट पर एक मोटरसाइकिल रुकी। चौकीदार बाहर निकलकर उससे नाम पता पूछने लगा। फिर इशारे से उसी नई गाड़ी की ओर देखकर कुछ कहा। सरवन की तरफ मुड़ा और बोला , " पहली कोठी वाले को पूछ रहा था। गाड़ी धोनी है... तुझे नहीं कहा क्या उन्होंने ? "
सरवन चुप रहा। उसकी नज़र उसी लड़के का पीछा कर रही थी। वह लड़का मोटरसाइकिल से उतरा ... उसके कपड़ों या चाल –चलन से वह गाड़ी धोने वाला तो कतई लगता नहीं। साफ–सुथरे कपड़े , जीन्स के ऊपर कमीज़ के साथ जैकेट , पैरों में घुटनों तक के रबड़ के गमबूट , जैकेट की जेब में मोबाइल और उससे लगे इयरफोन , आँखों पर रंगीन चश्मा...उसने कोठी वालों से चाभी ली। मोटरसाइकिल पर टंगी चमचमाती हुई नई बाल्टी उतारी। हैंडल पर टंगे थैले से कुछ तोलिए निकाल कर कंधे पर रखे और बगीचे से बाल्टी भरने लगा। सरवन को उसके आगे स्वयं का डीलडौल भद्दा लगा। वह लड़का आसपास की दुनिया से बेखबर , अपनी धुन में गाड़ी धोता रहा। उम्र में वह सरवन से काफी छोटा होते हुए भी अपने काम में निपुण लग रहा था।
अगले दिन वह लड़का जल्दी आ गया। सरवन उसके बगल वाली गाड़ी ही धो रहा था। वह आया और नई गाड़ी धोने लगा। उसने सरवन की तरफ देखा तक नहीं। सरवन ने भी यूँ जताया जैसे उसका ध्यान नहीं है लेकिन कनखियों से उसकी हर गतिविधि वह भाँप रहा था। लड़के के पास गाड़ी धोने का सामान नया–नया लग रहा था। उसकी बाल्टी , तौलिया , साबुन आदि सब नया और महंगा था। वह सरवन से ज़्यादा पैसे लेता होगा फिर भी साहब ने उसे काम पर क्यों रख लिया...सरवन से पूछा ही नहीं।
आज सरवन का ध्यान अपने काम पर कम और उस लड़के की तरफ ज्यादा लगा रहा। चौकीदार से वह जान गया था कि उसे सरवन से ज़्यादा पैसे मिल रहे हैं। कुछ दिनों में ही उसे दो तीन गाड़ियों का काम और मिल गया। सरवन को जानते बूझते देर नहीं लगी कि अब वहाँ उसका एकछत्र राज खत्म हो चला है। वह लड़का उसके बाद आता लेकिन चार–पाँच गाड़ियाँ धोकर सरवन से पहले ही निपटा लेता। कुछ पुराने घरों को छोड़कर कई घरों की गाड़ियों को धोने का काम अब सरवन के हाथ से निकलकर उसके पास चला गया।
एक दिन की बात है। सरवन अपना काम निपटाकर चौकीदार के साथ बैठकर गप्पे हाँक रहा था। उसके पास अब ज्यादा गाड़ियों का काम नहीं रह गया था , इसलिए जल्दी निपटकर वह चौकीदार के साथ बैठा इधर–उधर की बातें करके समय बिताता। तभी किसी मशीन की गरगराने जैसी आवाज आने लगी। सरवन दीवार की टेक लगाए बैठा बीड़ी फूँकता रहा, चौकीदार उठकर बाहर देखने गया। जब कुछ समय तक वह नहीं लौटा तो सरवन को जिज्ञासा हुई। बीड़ी के ठूंठ को मसलकर वहीं छोड़ वह बाहर आया। वह लड़का जिसे सब बॉबी बुलाते , नई गाड़ी पर एक गोलाकार मशीननुमा किसी चीज को घुमा रहा था। गाड़ी पर साबुन की झाग फैली हुई थी और यह मशीन उसपर फिसलती हुई सफाई कर रही थी। कुछ और लोग भी उसे उत्सुकता से देख रहे थे। उस लड़के को पता था या नहीं,वह अपना काम तल्लीनता से कर रहा था। थोड़ी देर बाद उसने रुककर गाड़ी पर बाल्टीभर पानी उंडेल दिया। तब तो गाड़ी की सतह ऐसी चमचमाती निकल आयी जैसे कि बिल्कुल नयी हो। सरवन विस्मित सा देखता रहा।
" साला , ये तो सबकी छुट्टी कर देगा। कैसी अनोखी मसीन है , " चौकीदार ने कुछ हँसते हुए उससे कहा , पर सरवन कुछ बोला नहीं।
घर लौटकर भी वह उसी मशीन के बारे में सोचता रहा। चौकीदार की बात का उसने जवाब नहीं दिया था लेकिन वह भी वही सोचता रहा। उस मशीन से कुछ ही देर में गाड़ी ऐसी निखरने लगी थी , जैसी सरवन देर तक रगड़कर भी न चमका सके। सरवन ने इस एक काम के अलावा कुछ किया ही नहीं , लेकिन उसने आज से पहले ऐसी किसी मशीन के बारे में कभी देखा–सुना नहीं।
बॉबी की मशीन चर्चा का विषय बनी रही। नतीजा यह हुआ कि कोई नयी गाड़ी खरीदता तो उसके धोने का काम अब सीधे बॉबी की झोली में ही जाता। सरवन के हिस्से वही पुरानी गाड़ियाँ रह गई। उसकी कमाई भी पहले से कम हो गई और सरवन को यही चिंता सताती रही।जब तक वह काम में लगा रहता भूला रहता , लेकिन घर लौटकर यही बात सोच–सोचकर परेशान रहने लगा कि बाकी लोगों ने भी उसे निकालकर बॉबी को काम दे दिया तो उसका क्या होगा। तब उसने भगवान का शुक्र अदा किया कि उसका ब्याह नहीं हुआ, वरना तो सरवन चिंता से मर ही जाता। अकेली जान का क्या, कुछ भी खाये , किसी दिन ना मिले तो ना भी खाये।
बॉबी से उसकी दोस्ती हो गई। वह लड़का बुरा नहीं , बस नये जमाने के लड़कों की तरह सरवन और उसमें बहुत अंतर है। उसने भी अपने दिल को समझा लिया। सरवन आज भी पुराने तरीके से ही काम करता आ रहा है। वहीसाबुन,पानी ,तौलिया... दुनिया ने हर मामले में तरक्की कर ली तो गाड़ी धोने में पुराना तरीका कैसे बना रहेगा...उसने बदली हुई परिस्थिति से समझौता करना ही ठीक समझा और जैसा उसकी अम्मा कहती थी , वैसा ही उसने भी मान लिया कि उसके भाग्य में जितना और जो होगा वह उससे कोई नहीं छीन सकता , जो नहीं होगा वह कोई दिलवा भी नहीं सकता। इस ख़्याल के बाद उसका जी हल्का हो जाता। लेकिन जिस जगह और परिवारों के लिए वह अपनेपन के साथ काम करता आ रहा है अब वही लोग और इलाका जाने क्यों उसे पराये लगने लगे हैं। हर एक तारीख को उसे आशंका होती है कि कोई कहेगा कि कल से गाड़ी मत धोना। यूँ वह मन को समझा लिया करता है कि इलाके की सभी गाड़ियों को सरवन धोए ये संभव ही नहीं है। सच तो यह है कि अब उससे ज़्यादा काम होता भी नहीं। पहले मोहल्ले भर का काम करने के बाद भी उसे थकान नहीं हुई , लेकिन अब तीन या चार गाड़ियां धोकर वह कुछ देर बैठ जाता है। एकाध बीड़ी का कश भर कर फिर जुटने की ताकत बटोर लेता है। उसे यह तसल्ली है कि तीसरी मंज़िल वाली मैडम ने उसे नहीं निकाला। उनकी नीली गाड़ी पुरानी होते हुए भी पहली कोठी वाले की नयी गाड़ी से ज़्यादा चमकती है। सरवन जब उसे धोता है तब मन के घोड़े कल्पना के कुलांचे भर रहे होते हैं। वह गाड़ी की सवारी कर रहा होता है और कार की खुशबू उसके भीतर तक समायी होती है।
रविवार को बॉबी नहीं आया करता लेकिन सरवन ने अपनी आदत नहीं छोड़ी। आजकल जाड़े की सुबह उसे पहले से ज़्यादा ठंडी लगती है, फिर भी उसका मन छुट्टी लेने को नहीं चाहता। हाँ इतना जरूर है कि रविवार को वह कुछ देर से ही सही पर आ जाता है।
आज भी रविवार है। सुबह वह घर से निकला तब धुंध थी। उसे अम्मा की बात याद आ गई कि जब सवेरे धुंध हो तो समझ लेना चाहिए कि दिन साफ निकलेगा। उसका मन धूप सेंकने को कर रहा था। बस जल्दी निपटकर आज वह सारा दिन धूप में लेटा रहेगा। उसके घर की मुंडेर से धूप जल्दी भाग जाती है, इसलिए वह पास वाले मैदान में चला जाया करता है। वहाँ उनींदेपन में घास पर लेटे रहना सुकून देता है। एक मन यह भी चाह रहा था कि छुट्टी कर जाये। फिर लगा नहीं, क्या पता किसी को जाना हो और उसकी राह देखते रह जाएँ। लेकिन जल्दी वापस आकर मैदान में लेटकर धूप सेंकने की कल्पना में उसके कदम तेजी से बढ़ने लगे।
चौकीदार बाहर ही खड़ा मिल गया। हथेली पर रखे तम्बाकू को अँगूठे से मसलते हुए उसे देखकर मुस्कुराया।
" आई गये सरवन बाबू" कहकर तम्बाकू की चुटकी को जीभ के नीचे रखकर हथेलियाँ झाड़ ली।
सरवन के होंठों पर बस इतनी ही मुस्कुराहट आयी कि चौकीदार को उसकी बात की प्रतिक्रिया मिल जाये। आज तो वह जल्दी निपटकर घर जाने की फिराक में था। उसने चौकीदार के कमरे से सामान उठाया और बाल्टी भरकर पहली गाड़ी की ओर बढ़ा। धीरे –धीरे कोहरा छंटने लगा और मुलायम –सी धूप निकलने लगी। गाड़ियों का काम निपटाकर घर जाने तक उसे और घंटा भर लग जाएगा। तब तक मौसम और खिल जायेगा। रात भर की ओस से भीगी घास सूख जायेगी और हवा की ठंडक भी धूप में पककर गुनगुनी हो जायेगी। गाड़ियों पर चलते यंत्रचालित से हाथों के साथ सरवन यही सोच रहा था। बस जल्दी काम निपट जाए। आस –पास के घरों से लोग निकल कर धूप में अपनी –अपनी जगह बनाने लग गए। कुछ साहब लोगों के हाथ में अखबार था , किसी के हाथ में फोन। कुछ बच्चे भी बल्ला , गेंद या अपनी छोटी साइकिलें लेकर निकल पड़े। जाड़ों में रविवार को धूप निकले तो धूप में बैठकर वक्त गुजारने का लालच कोई नहीं रोक पाता।
" सरवन भैया , कल मेरे लिए कड़ी पत्ता जरूर लाना, चाहिए तो आज ही था पर कल कहना भूल गई , " तीसरी कोठी वाली मेमसाब ने कुर्सी धूप में खिसकाते हुए कहा। सरवन ने मुस्कुराकर हामी भर दी। इस तरह के छोटे–मोटे कितने ही काम लोग सरवन से करवा लेते हैं और वह भी मुस्कुराते हुए कर देता है।
वह तीसरी मंज़िल वाली मैडम की गाड़ी की ओर बढ़ा। मैडम जी कुछ और महिलाओं के साथ पास ही खड़ी एक सब्जी वाले की रेहड़ी पर मटर चुन रही थी।
" आज मैडमजी मटर की टिक्की बनाएगी...सस्ते हो गए ना मटर। "
" तेरी अम्मा बनाती थी ना ? तभी टिक्की याद आ रही है तुझे। "
वह सरवन की तरफ थोड़ा–सा मुड़ते हुए बोली।
" अम्मा की क्या याद मैडमजी...अब तो रोटी मिल जाए वही काफी है," सरवन की बात की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी।
" घरवाली ले आ , वो बना दिया करेगी तेरे लिए टिक्की , " किसी और ने कहा। सरवन ने मुड़कर देखना चाहा कि कौन बोला। लेकिन वह मुड़ न सका। गाड़ी की छत को धोता उसका हाथ अनायास ही नीचे खिसका , इससे पहले कि सरवन संभालने की कोशिश करता , अचानक वही हाथ तेजी से फिसला और खिसक कर कुछ यूँ नीचे आया कि सरवन उसके दबाव से लड़खड़ाकर नीचे गिर गया।
" अरे , अरे , सम्भाल के सरवन..."
" देख के सरवन..."
" घरवाली की बात करते ही लड़खड़ा गया ये तो...."
सरवन को गिरता देखकर पता नहीं कौन क्या बोला। उसे तो जैसे किसी की आवाज़ नहीं सुनायी दी। सरवन का शरीर काँप रहा था , वह कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था शायद , लेकिन शब्द गले में ही अटक गए हों जैसे। तभी बंटी का ध्यान उसकी तरफ गया और किसी आशंका से वह सरवन की ओर लपका , "अरे...अरे देखो इसे क्या हुआ..."
उसकी बात सुनकर खेलते हुए बच्चे भी मुड़े और सब्जी खरीदती महिलाएं भी। बंटी उसे पकड़कर उठाने लगा लेकिन सरवन उठ ही नहीं रहा था। बंटी उसे बार–बार उठने को कहता रहा , पर ना सरवन उठ पा रहा था और ना ही बंटी उसे उठा पा रहा था। आसपास धूप में बैठे कई लोग उसकी तरफ लपके। सभी अपनी –अपनी ओर से उसे कुछ कह रहे थे , पर सरवन के कानों मे कोई आवाज नहीं पहुँच रही थी। उसकी आंखें भारी हो रही थी, आवाज गले में अटक गयी और शरीर का बायां हिस्सा मानो उससे अलग हो गया। बंटी सरवन को हिला नहीं पाया।
" इसे डॉक्टर के पास ले चलो जल्दी…सरवन को दौरा पड़ा है…" पता नहीं किसने कहा, लेकिन यह सुनते ही बंटी ने पूरा जोर लगाकर सरवन को उठा लिया। धूप में बैठा हर व्यक्ति हरकत में आ गया।भीड़ इकट्ठा हो गयी।
" बंटी, इसे बिठा गाड़ी में…जल्दी…!"
बंटी ने देखा सरवन की नीली गाड़ी वाली मैडमजी अपनी गाड़ी में बैठ कर चलने के लिए तैयार थी। उनकी गाड़ी धोते हुए ही तो सरवन को दौरा पड़ा था। बंटी और कुछ लोगों ने मिलकर सरवन को गाड़ी में बैठाया। वह स्वयं उसे पकड़ कर साथ बैठ गया। मैडम ने तेजी से गाड़ी मोड़ी और अस्पताल की ओर दौड़ायी।
" ओये सरवन, देख तू मैडम की गाड़ी में बैठा है...उठकर देख तो.." बंटी ने उसके गालों को थपथपाते हुए कहा, " तू कहता था ना तुझे मैडम की गाड़ी में घूमना है..."
उसे होश में रखने के लिए बंटी और मैडम लगातार बोले जा रहे थे। मैडम को सरवन के सपने की कोई जानकारी नहीं थी लेकिन बंटी की बात सुनकर वे भी वही बोलने लगी।
" देख सरवन आज तूने गाड़ी पूरी धोयी भी नहीं फिर भी तुझे सैर करवा रही हूँ... डॉक्टर को दिखाकर वापस भी तो इसी से आना है...."।
सरवन उनींदी–सी आँखों से कभी बंटी को देख रहा था और कभी मैडम को। उसकी आँखें जो देख रही थी और जो महसूस कर रहा था , उसे वह चीख–चीख़कर कहना चाह रहा था, लेकिन उसकी पलकें बोझिल हो रही थी और कहने के लिए भरसक कोशिश के बाद भी वह बोल नहीं पा रहा था। बंटी उससे क्या कह रहा है सरवन समझ नहीं पा रहा था। गाड़ी की आवाज,तेजी से लग रहे झटके और एक सुगंध सब को वह कभी अपने बहुत करीब महसूस करता तो कभी सबकुछ उसे पीछे छूटता सा लग रहा था। गाड़ी के इंजिन की आवाज उसे अपनी धड़कन लग रही थी और किसी के बोलने का स्वर कभी दूर कभी पास आता जाता रहा था। सरवन की आँखों के आगे कभी अंधेरा छा रहा था तो कभी पलकें खोलने की नाकाम कोशिश में रोशनी की एक लकीर में उसे बंटी का चेहरा दिख जाता। मैडम की आवाज मानो कोसों दूर से आ रही थी। वह आँखें खोलकर उनको देखना चाह रहा था।
" सरवन सोना मत... मुझे देख...तूने कितनी चमकाकर रखी है ये गाड़ी...आज पूरी धोयी नहीं तूने, पूरी धोएगा तभी घर जाने दूँगी तुझे... समझा..." मैडम का गला रुंध गया। आँखों से एक धारा गाल पर बह गयी। वह सरवन से बोलते हुए तेजी से चला रही थी। सरवन को वे बरसों से जानती है,उसकी माँ रामदेवी सबसे पहले उन्हीं के पास काम करती थी और सरवन ने भी सबसे पहले उन्हीं की गाड़ी धोने से शुरुआत की थी। उन्हें बरसों पुराना सरवन याद आ रहा था जो पहली बार अपनी माँ के साथ उनके घर आया था।
" बंटी इसे सोने मत देना... हम पहुँचने ही वाले हैं..." लाल बत्ती पर तेजी से ब्रेक लगाते हुए वे बोली।
ब्रेक के झटके से सरवन की धड़कन भी मानो रुकने लगी। बंटी ने उसे झकझोरा..." सरवन देख... तुझे पता है तू कहाँ है...मैडम की कार में...सरवन बता उनको तुझे सैर करनी थी ना...कैसी लगी बता..."
मैडम और बंटी दोनों ही असहाय से उसे संभालने की कोशिश कर रहे थे। तभी सिग्नल की बत्ती हरी हो गई। मैडम ने खिड़की का शीशा नीचे कर दिया।एक ठंडी बयार कार में भर गई। उस झोंके में मैडम और उनकी गाड़ी से आनेवाली वह सुगंध भी थी जो उसे बेहद पसंद है।
सरवन को लगा मानो मैडम की कार में वह उनकी बगल वाली सीट पर बैठा पहाड़ी घुमावदार सड़कों पर घूम रहा है...तभी सामने पहाड़ी के अंत में तेज़ रौशनी का बड़ा सा धब्बा दिखायी दिया...सरवन की आँखें चौंधियाने लगी...
"सरवन, जगा रह ...जगा रह...बस आ गए हम..." कभी सरवन से तो कभी खुद से बड़बड़ाते हुए उन्होंने गाड़ी को तेजी से अस्पताल के आपातकालीन गेट से अंदर उसी रौशनी के धब्बे के पास पहुँचा दिया।
गाड़ी के रुकते ही वहाँ मौजूद डॉक्टर,नर्स और सहायक तुरंत स्ट्रेचर लेकर आ गये और सरवन को ले जाने लगे। उसकी शिथिल होती देह को उठाते समय सरवन का हाथ कार की चमकीली सतह पर यूँ घिसट गया मानो जिसे वह बरसों से सहलाता आया है उसे अंत में वह एक बार फिर छू लेना चाहता हो। कार की नीली चमकीली , दमकती सतह पर सरवन के पसीने और गर्द की एक लकीर बन गई।
मैडम ने अपनी गाड़ी को एक बार देखा। सुबह सरवन के धो चुकने के बावजूद अस्पताल तक आने में फिर धूल से भर गई थी। वे कैसे जान पाती कि वह सिर्फ उनकी अपनी सुविधा या वैभव के लिए नहीं थी , सरवन की महत्त्वाकांक्षा और सपने का हिस्सा भी थी। एक कैनवस पर रंग भरने की तरह वह उसपर अपने सपने संजोता रहा था। सरवन ने अपने काम की शुरुआत उनकी गाड़ी धोने से ही की थी। शायद आज आखिरी बार भी उसने उन्हीं की गाड़ी धोई और उस कार में अपने सपने की लॉन्ग ड्राइव भी ले ली।
अस्पताल की दहलीज पर सरवन ने आँखें मूँद ली।
© भारती बब्बर
( निवेदन है कि रचना के संबंध में अपनी राय जरूर बतायें , और हाँ , कृपया अपना नाम अवश्य लिखें। 🙏 )
बेहतरीन लिखती हैं आप लाजवाब❤️🤲❤️
ReplyDeleteबहुत आभार आपका 🙏
ReplyDeleteबेहतरीन l कहानी में हर छोटी छोटी चीज़ों का वर्णन बहुत सुंदर करती हो , बीड़ी बुझाना, धूप, कोहरा I
ReplyDeleteहरेन्द्र
बहुत आभार हरेंद्र 🙏
Deleteप्रणाम दीदी शब्दों को पिरोकर कथा का रूप देकर दिल को छू लेने वाली अदाकारा आप ही हो सकती हैं अदभुत लेखनी वाह पूरा चलचित्र आंखों के आगे छा गया
ReplyDeleteबहुत आभार आपका 🙏हो सके तो अपना परिचय जोड़ दें।
Deleteललित सिराड़ी -
ReplyDelete👌सरवन के चरित्र को बहुत जीवंत उतारा है..। उसकी कार्य शैली उसकी सोच का चित्रण इतना स्पष्ट है की लगता है जैसे आपके सामने ही सरवन अपने काम को अंजाम दे रहा हो।
कहानी का अंत बहुत हृदय विदारक है..। बहुत अच्छी लगी और PATHETIC.
प्रणाम सर 🙏
Deleteआपको मेरी कहानी भायी, तो मेरी लेखनी सार्थक हो गयी। बहुत आभार आपका 🙏
भारती, एक आम आदमी की ज़िंदगी में क्या कुछ गुज़रता है ,उस के अरमान , आकाछाए और मजबूरी का अहसास अपनी लेखनी से बहुत ही अलग और उमदा तरीक़े से किया है. बहुत ही मार्मिक कहानी है 😍
ReplyDeleteआपकी टिप्पणी बहुमूल्य है, परिचय से वंचित हूँ। धन्यवाद। 🙏
DeleteHar baar ki tarah is baar bhi dil ko chune wali kahani didi
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार🙏
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