चींटियाँ
दिल्ली वह पहली बार नहीं आया,दर्जनों बार आ चुका है, और हर बार दिल्ली आते ही पहली प्रतिक्रिया यही होती है; उफ्फ! इतनी भीड़! उस भीड़ में व्यक्ति की एक इकाई की हैसियत मानों ख़त्म हो गयी थी, वह सिर्फ़ उस भीड़ का हिस्सा था। वह सोचता रहा कि इतने लोग एक ही वक्त में एक ही दिशा की तरफ क्योंं बढ़ते जा रहे हैं। फिर दूसरे ही पल अपने बारे में सोचा, उसे तो बस अड्डे होकर आगे पाँच घण्टे का सफर तय करना है। इनमें से हर कोई पता नहीं कहाँ जा रहा हो...सब एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं लेकिन मंज़िलें अलग-अलग।
उसके सामने ब्लू लाईन बस आकर रुक गयी। वह पीछे हट गया। पीछे से एक हुजूम धक्का देता हुआ आगे बढ़ गया और क्षण भर में पहले से ठसाठस भरी हुई बस में जाने कहाँ समा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, बस स्टाॅप पर अब भी उतनी ही भीड़ थी।उसने एक आटोरिक्शा ले ली। बस स्टाॅप पर खड़े रहते हुए धूप का गुनगुना स्पर्श अच्छा लग रहा था,पर रिक्शा में बैठते ही सरसराती हवा की ठण्डक उसे कंपकंपी देने लगी थी। उसने घड़ी देखी, बारह बज रहे थे। चण्डीगढ़ पहुँचते-पहुँचते रात तो हो ही जाएगी।
साउथ दिल्ली की साफ-सुथरी सड़कें पिछली रात की बारिश के बाद और भी धुल गयी थी। इस वीआयपी इलाके से निकलते ही सड़कों की हालत का अंदाज़ा उसने पहले ही लगा रखा था।
जल्दी ही उसकी रिक्शा लाल किले के सामने बत्तियों पर खड़ी थी। सड़क के दोनों तरफ गंदला पानी इकट्ठा था। तारों पर सड़क किनारे रहने वाले बंजारों और फुटपाथियों के भीगे कपड़े टंगे थे। रिक्शा वाले ने उसे बस अड्डे के बाहरी छोर पर ही छोड़ दिया। वहाँ से वह कीचड़ और गंदगी से बचता हुआ बस अड्डे के अंंदर दाखिल हुआ। खाने-पीने की दुकानों पर किसी सस्ते तेल की गंध फैली हुई थी। मैले कपड़े पहने हुए एक लड़का बड़ी-सी कड़ाही में समोसे तल रहा था। उसके पास ही एक थाल में फूले हुए भटूरे रखे थे। उसे लगा वे भटूरे तब भी यूँ ही रखे थे, जब वह पिछले हफ्ते दिल्ली आया था। नाक पर रुमाल रखे वह आगे निकल गया। बस खड़ी मिल गयी। सीटें भी खाली थीं। वह दो जनों वाली एक सीट पर बैठ गया।साथ में कोई न आये,इस ख़याल से उसने अपना बॅग सीट पर ही रख दिया।बस में उसकी कोशिश यही रहती है कि दो की सीट पर वह अकेला ही सफर करे।
हफ्ते भर में ही दिल्ली ने उसे थका दिया था। काम तो फिर भी नहीं हुआ। सरकारी नौकरी मिल नहीं रही थी और अपना काम था कि जमने का नाम नहीं ले रहा था। तब तक वही प्राइवेट नौकरी और बंधुआ मजदूरी ! उसने अगली सीट के डण्डे पर बाँह रखकर सिर टिका दिया।
बस में सवारियाँ चढ़़ रही थीं। सब एक दूसरे से अपरिचित। पता नहीं कौन कहाँ रहता होगा, क्या करता हो, कहाँ और क्यों जा रहा हो ! वह कई बार सोचता है कि जितने लोग हैं उतनी ज़िदगियाँ, उतनी कहानियाँ, उतनी ही मुश्किलें ! हर रोज़ वह कितने ही लोगों को देखता है, मिलता है, हर एक से बातचीत भी नहीं होती, किसी-किसी से नज़रें भी नहीं मिलती। किसी से परिचय मुस्कुराहट तक होता है, और किसी से दो-चार बातें हो जाती हैं। उसने चारों ओर नज़रें घुमायी, कोई चेहरा ऐसा नहीं लगा जिससे परिचय की गुंजाइश हो। साथ में तीन वाली सीट पर एक मोटा-सा हरियाणवी बैठा था जो अपनी बोली में कंडक्टर को रह-रहकर आवाज़ें लगा रहा था। बस का अड्डे पर खड़ी रहना शायद उसे बेहद अखर रहा था। वह तीन की सीट पर दो की जगह घेरे बैठा था। उसे देखकर वह मोटा आदमी मुस्कुराया और बोला, "पत्ता नईं के कर रेया है यो! "... परिचय की हल्की-सी शुरूआत। जवाब में वह बिना कुछ बोले मुस्कुरा दिया। उसका जवाब पिछली सीट पर बैठे व्यक्ति ने दिया, " ये इब रोट्टी खाके ही हिल्लेंगे ताऊ! " और दोनों बेवजह ही हँस पड़े।
अगली सीट पर दो व्यक्ति देश की हालत पर लगातार बहस कर रहे थे। एक सरकार के परखच्चे उड़ा रहा था और दूसरा उसका अनुमोदन किये जा रहा था।उन्हें देखकर ऐसा नहीं लगा कि वे एक-दूसरे को जानते हों, पर उनकी बातें गरमागरम बहस में छिड़ी हुई थी। तभी साथ वाली बस शुरु हुई उनमें से एक आदमी लपककर उछला और चिल्लाया, ओेए, ऐते अंबाले दी बस है ! दूसरे ही क्षण वह बस से बाहर होकर उस चलती बस में चढ़़ गया। दूसरे व्यक्ति ने भी बहस बीच में रह जाने की प्रतिक्रिया नहीं दी और चुपचाप एक सस्ती-सी पत्रिका निकाल कर उसमें डूब गया। उसके साथ की सीट पर एक ग्रामीण दंपत्ति आकर बैठ गये तो मुड़कर देखा भी नहीं।
उसे ऐसे में याद आती हैं दीवार पर क़तारबद्ध चलती चींटियाँ। उसे याद है बचपन में वह दीवार पर दोनों ओर से चढ़़ और उतर रही चींटियों को देखा करता। हर चींटी अपनी गति से अपनी राह पर चलती रहती। अचानक रुककर दूसरी दिशा से आने वाली चींटी के मुँह से मुँह लगा कर क्षण भर रुकती और फिर अगले ही क्षण अपनी राह चल पड़ती। कभी-कभी ये चींंटियाँ आमने-सामने आकर भी न रुकती तो कभी साथ चल रही चींटी से पल-भर बात कर लेती। उसकी बाल-कल्पना में वे चींंटियाँ बाज़ार जा रही होती या दूसरे किसी और काम पर। रास्ते में जैसे कोई परिचित मिल जाए वैसे ही किसी परिचित चींटी के मिल जाने पर हालचाल पूछकर आगे निकल जाती।
अब भी जब कभी वह सफर पर निकलता है, उसे क़तारबद्ध चींटियों का ख़याल ज़रुर आता है। कौन कहाँ जा रहा है पता नहीं,यात्रा में थोड़ी देर मिले, बातचीत की और आगे निकल गये। क्या पता फिर मिलें न मिलें। ये भी तो हो सकता है कि इस वक्त बस अड्डे पर कोई ऐसा हो जिसके साथ वह पहले भी सफर कर चुका हो!
बस का कंडक्टर आ गया तो उसने टिकट ली और बस चल पड़ी। अंधेरा होने से पहले पहुँचे तो ठण्ड कम होगी। कल की बारिश के बाद ठण्ड बढ़ गयी थी। बस लगभग भर चुकी थी। उसकी साथ की सीट के अलावा एकाध सीट खाली थी। गति पकड़ती बस में लपककर दाँत की दवा बेचने वाला चढ़़ गया..."हाँ तो भाई साहब, आप सबको घर जाने की जल्दी है...लेकिन मैं आपका ज्यादा वक्त नहीं लूंगा। आप में से कई भाई लोग दाँत के दर्द से परेशान रहते होंगे...उसकी वजह है कीड़ा...दाँत में कीड़ा लग जाता है, दाँत खोखला हो जाता है। गरम पियो तो परेशानी, ठण्डा पियो तो परेशानी। दाँत के डाक्टर के पास जाइए, वो ड्रिल करेगा, निकाल देगा या आप उसे भरवाएंगे....साथ मोटी फीस भी देंगे, याने दाँत भरेंंगे और जेब खाली करेंगे...
पीछे से एक ठहाका आया। दवा बेचने वाले को जैसे अपनी वाक्पटुता की प्रशंसा मिल गयी। उसके स्वर में उत्साह बढ़ गया।
"इसीलिए हमारे हकीम साहब ने ये दवा बनाई है। कीमत सिर्फ दस रुपये! दस रुपये! दस रुपये! रात को सोते समय दाँत पर हल्की-सी दवा लगाइए, सुबह तक कीड़ा बाहर और आपका दाँत आपके पास...
" सुबह तक दाँत बाहर और कीड़ा आपके पास..." किसी ने टिप्पणी की। बस में सामूहिक ठहाका लगा। वह बेचने वाला यकायक बौख़लाकर उससे लड़ने लगा, "हमारी रोजी का मजाक उड़ाता है! "
"डेंटिस्ट से कहो दुकानें बंद करले...दस रुपये में दाँत ठीक करेंगे,मिट्टी है या गोबर क्या जाने! "
देखते ही देखते अच्छी-ख़ासी तू-तू मैं-मैं शुरु हो गयी। कंडक्टर ने दोनों को मुश्किल से अलग किया। तब तक बस जी टी रोड़ पर पहुँच चुकी थी।
"हमारी रोजी को गाली देता है, भैण..."
"चल माफ कर यार, " कंडक्टर ने लगभग जबरदस्ती ही उसे नीचे उतारा। वह उतरने के बाद भी बोले जा रहा था। बस बायपास पर रुकी थी। कुछ लोग चढ़े, बस चल पड़ी। दाँतों की दवाई पर मज़ाक अब भी चलता रहा। उसका ध्यान टिप्पणी करने वाले व्यक्ति पर ही था। वह अब भी दवा को मिट्टी और गोबर कहे जा रहा था।
तभी किसी ने कहा, एक्सक्यूज़ मी!
एक लड़की थी। "आप प्लीज़ अपना बॅग नीचे रखेंगे। "उसने कुछ कहे बिना बॅग नीचे रख दिया। वह लड़की बैठ गयी।
वह लड़की अकेली ही चढ़ी थी शायद। वह खिड़की की तरफ मुँह मोड़कर बैठ गया। बाहर बादल घिरने लगे थे। उसने हाथ जॅकेट की जेब में डाल दिए। उसे ऐसा लगा कि वह लड़की भी बाहर ही देख रही है। जॅकेट में हाथ डालने से उसकी कुहनियाँ मुड़ गयी थी। वह लड़की थोड़ी-सी सरकी,हालाँकि साथ बैठे पुरुष के कारण सिमटी-सकुचायी हरग़िज़ नहीं थी। उसके सरकने के बावजूद उसकी कुहनी उस लड़की को यदा-कदा छू जाती। 'साॅरी', वह हल्के-से बुदबुदाकर रह जाता। इतनी धीमीं आवाज़ में कि उस लड़की को उसका आभास भी ना हो। जब यह क्रिया दो-तीन बार हो गयी तो उसने हारकर हाथ जेब से बाहर निकाल कर अगली सीट के डण्डे पर रख दिए।
कंडक्टर पास आया तो उस लड़की ने टिकट लिया, "पिपली", बहुत हल्का स्वर था। वह टिकट को हाथ में मसलती रही। वह खिड़की के बाहर देखते हुए भी कनखियों से उसकी सारी हरक़तें देख रहा था।
बस तब तक दिल्ली की परिधि से बाहर आ चुकी थी। कंडक्टर भी सब की टिकट काटकर अगली सीट पर बैैठकर ड्रायवर से बतियाने लगा। धीरे-धीरे सभी यात्री उस बस से और उसकी चाल से रवां हो गए। वह लड़की भी आराम से टेककर बैठ गयी। बस के हिचकोलों से या ब्रेक लगते ही उसका कंधा या पैर टकरा जाते, परंतु वह बिल्कुल परेशान या असहज नहीं लगी। उसने भी सहज होकर पीठ टिका ली, पर हाथ अगली सीट पर ही टिके रहे।
"आपको शनि की पीड़ा है? "
उसने चौंककर देखा। वह लड़की उसी से पूछ रही थी। वह जवाब में कुछ बोल न सका, बस सिर हिला कर हामीं भर दी। वह हैरान हो रहा था। यह लड़की कैसे जानती है? उससेे रहा नहीं गया, "आपको कैसे पता चला? "
"आपने ये जो पहना है! " उसका इशारा उंगली में पड़े लोहे के छल्ले की ओर था जो उसने कई बरसों से डाल रखा था।
"आपकी राशि कुंभ है ना? " वह सचमुच हैरान रह गया। उस लड़की ने उसके उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की।
"आप उतार ही दें ,अब आपको इससे फायदा कम और नुकसान ज्यादा होगा। अब ज़रुरत है ही नहीं। "
उसने कुछ पूछा नहीं, पर अपनी आँखों में प्रश्नवाचक भाव छिपा नहीं सका। उस लड़की के स्वर और बोलने के अंदाज़ में आत्मीयता ही थी शायद, क्योंकि दूसरे ही क्षण उसने हथेलियाँ अगली सीट से हटाकर पीठ पीछे आराम से टिका ली।
"आपने कैसे जाना कि मेरी राशि क्या है, और मैंने ये छल्ला क्यों डाला है! " उस लड़की के होंठों पर दबी-सी मुस्कान उभरी।
" मैं भी आप ही की राशि की हूँ। "
उसका जी चाहा वह नाम पूछ ले, पर वह चुप रहा।
"मैंने भी डाला था यह छल्ला...घोड़े की नाल की कील से बनवाया था, और आपने? "
"नाव की कील से। "
इस बार उसकी मुस्कान और फैल गयी, लगभग हँसी तक।
"कीलों के छल्ले बनाकर किस्मत की कीलें उखाड़ने की कोशिश की हमनें...मेरा मतलब मैंने।"
इस बार वह मुस्कुराए बिना नहीं रह सका,
"जी नहीं, ठीक कहा आपने...हमनें, मैं भी शामिल हूँ ही।"
"वैसे कुछ फ़र्क पड़ा आपको इससे?" उस लड़की ने पूछा। उसे इस सवाल का जवाब तुरंत नहीं मिला।उसने सोचने में थोड़ा वक्त लगाया कि कितने सालों में कितने ख़्वाब देखे, कितनी कोशिशें की और कितनी नाक़ामियाँ मिलीं। उसने सिर्फ नहीं में सिर हिला दिया।
"तो उतार दीजिये ना!" इस बार तो उसके स्वर में पूरा आग्रह था। कुछ सोचते-सोचते उस छल्ले को उसने निकाल दिया। वह लड़की चुप हो गयी और वह सोचता रहा कि किसी अपरिचित लड़की के कहने पर उसने सचमुच ही उतार दिया छल्ले को!
"आप कहाँ जा रहे हैं? " वह ज्यादा देर चुप नहीं रह सकी।
"चण्डीगढ़"
"मैंने कुरुक्षेत्र जाना है।"
उसने सिर हिला दिया जैसे कहना हो, मैं जानता हूँ।
"आप वहीं रहते हैं या दिल्ली? "
"चण्डीगढ़ ही रहता हूँ, दिल्ली नौकरी के सिलसिले में गया था।"
"मिली? "
"नहीं"
"आय एम साॅरी '... उसे उसकी सहानुभूति बुरी नहीं लगी। उसे लगा वह सिर्फ उस लड़की के सवालों का जवाब दे रहा है और वह लड़की सवाल पूछ-पूछकर ही शायद बातचीत का सिलसिला जारी रखना चाहती थी।
" आप कुरुक्षेत्र रहती हैं ? "
"ऊहुँ, फरीदाबाद। कुरुक्षेत्र मेरा मायका है।"
वह चौंक गया। वह शादी-शुदा हो सकती ऐसा तो लगा ही नहीं उसे, न उसकी उम्र से न रख-रखाव से।
"अच्छा तो आप मायके जा रही हैं! " उसने अपनी हैरानी छिपाते हुए मुस्कुराकर कहा।
"हाँ ", उसके स्वर में मायके जाने वाला वो उत्साह नहीं था जो उसने अपनी पत्नी में अकसर देखा था।
बस पानीपत के गंदियाले बस अड्डे के पास खड़ी थी।कई लोग बस में चढ़े और बस लगभग ठसाठस भर गयी। वह लड़की स्वयं को दूसरों के भार से बचाती हुई उसकी तरफ झुक गयी।
" आप इस तरफ बैठ जाइए।" उसने अपनी खिड़की की जगह उसे देते हुए कहा। वह लड़की बिना किसी आपत्ति के सरक गयी। उसके किनारे बैठते ही भीड़ का भार भी उस तरफ से छँट गया। बस सरकने लगी।
अगली सीट पर एक नौजवान आकर बैठ गया। उसने साथ वाले व्यक्ति को बेहद गंभीरता से देखा। पहले से बैठा व्यक्ति हलचल से बेख़बर होकर लगातार खिड़की से बाहर झाँक रहा था। वह रत्ती भर भी नहीं खिसका तो उस नौजवान ने उसे घूरते हुए लगभग धक्का ही दे दिया। मूक रहकर भी उनमें मानों ठन गयी थी।
उसने अब भी छल्ले को पकड़ रखा था। वह कभी उसे छोटी उँगली में डाल लेता तो कभी कलाई में बँधी मौली में फँसाकर घुमाता रहता। लड़की की निगाह यदा-कदा उस पर पड़ जाती। लेकिन उसे लग रहा था कि वह लगातार देख रही है और उसके दिमाग़ में छल्ला ही घूम रहा था। यह सच भी था, क्योंकि थोड़ी देर में वह फिर बोल पड़ी।
"आपने कितने बरस पहना इसे? "
"ठीक से याद नहीं...फिर भी काफी साल! अब तक तो उँगलियों को भी आदत पड़ चुकी है इसकी। "
"आपको भी तकलीफें सहने की आदत पड़ गयी क्या? कुंभ राशि को बहुत तकलीफें दी है शनि ने। अगर इसका कुछ असर होता है तो ईश्वर जाने इसके बिना क्या हाल हुआ होता! सच पूछिए तो मुझे नहीं लगता इसका कोई असर होता है, क्योंकि जो मैंने सहा है....
वह चुप हो गयी। उसे लगा वह कुछ कहते-कहते रुक गयी। पर वह पूछने का साहस नहीं कर सका। कहीं कुछ बहुत व्यक्तिगत हुआ तो! तभी वह बोली।
"आपको अजीब नहीं लग रहा मैं इस तरह अकेले मायके जा रही हूँ, बिना किसी सामान के। "
"अजीब? नहीं...पर हाँ...शायद, आमतौर पर शादी के बाद लड़कियाँ अकेली मायके नहीं जाती, मतलब कोई अकेले भेजता नहीं उन्हें। "
"ठीक कह रहे हैं आप। लेकिन दरअसल...मैं घर छोड़कर आ रही हूँ।"
"जी? "
"पता नहीं मम्मी पापा क्या कहेंगे। मैंने तो बताया भी नहीं उन्हें। "
"आप बता देती तो ठीक था न, शायद वो लेने ही आ जाते।"
"इतना तो सोचने का वक्त भी नहीं मिला। और लेने आते? वह कुछ देेर चुप रही।
"नहीं, कोई नहीं आता लेने...उल्टा मुझसे कहा जाता कि वहीं निभाओ जैसा भी हो, वही घर है तुम्हारा,आप जानते नहीं हिंदुस्तानी माँ-बाप को?"
वह निरुत्तर था। उसे लगा उसने यों ही बोल दिया, कुछ न बोलता तो बेहतर था।
"मेरे साथ जो हुआ वो पहली बार नहीं हुआ। घर पर सबको पता है कि मुझे वहाँ प्राॅब्लेम है, लेकिन एक बार शादी कर दी तो...मैं चार सालों से बरदाश्त कर रही हूँ। मम्मी पापा ने अच्छी-ख़ासी शादी की थी। कोई कसर नहीं छोड़ी थी उन्होंने। ससुराल भी अच्छा खाता-पीता परिवार है, फिर भी जैसे जन्म-जन्मांतर के भूखे हैं। पहली ही रात माँगें रखनी शुरु कर दी थी। अभी रस्में पूरी भी नहीं हुई थी...पहली रात को ही कार की माँग रख दी थी। पति ने साफ कह दिया कि मैं पापा को फोन कर दू़ँ नहीं तो वो मुझे घर भेज देंगे।"
वह बोले जा रही थी। उसके भीतर जैसे कुछ उबल रहा था जिसे वह निकाल देना चाहती थी।
"आपने फोन किया? " पता नहीं मस्तिष्क में कौंधते शब्द कैसे उसके होंठों पर उतर आये।
" हाँ,वही तो एक भूल कर दी मैंने ! पहले ही दिन मना कर दिया होता तो ...क्या पता क्या होता! शायद बचती ही नहीं ,जो कल रात हुआ वो चार साल पहले हो गया होता।"
उसके मस्तिष्क में दो प्रश्न एक साथ आये, एक ये कि फोन करने पर पिता ने क्या किया और दूसरा ये कि कल रात क्या हुआ ?
"तो क्या आपके पति को कार मिल गयी? "
एक भूल मैंने की थी फोन करके, दूसरी मेरे पापा ने की। किश्तों पर कार ख़रीदकर दामाद का पेट भरा...आज तक पापा किश्तें भर रहे हैं। हमें लगा था कार के बाद उनकी हसरतें ख़त्म हो जाएंगी, पर नहीं छोटी-बड़ी हज़ार ख़्वाहिशें थी उनकी जिन्हें पूरा करने का मैं एक ज़रिया थी। "
उसका चेहरा उदास हो गया था। उसने बाहर देखा,शाम का धुंधलका छाने लगा था। लोग ठण्ड से और सिकुड़े लग रहे थे। उसे अब तक आस-पास की सवारियों का ध्यान ही नहीं आया था। बस एकाध स्थान पर रुकी भी थी, पर कौन चढ़ा कौन उतरा, उसे पता नहीं। उसका ध्यान सामने वाली सीट पर गया। उस नौजवान ने या तो सीट बदल ली थी या कहीं उतर चुका था क्योंकि वहाँ एक ग्रामीण महिला बैठी थी। उसकी निगाह साथ वाली लड़की पर गयी, वह हथेली को धीरे-धीरे कुरेद रही थी।
"आपके मायके वालों ने कुछ किया नहीं? "
"बेटी की खुशी के लिए सबकुछ करते रहे,कभी खुशी से कभी मजबूरी से...शायद मजबूरी ही ज़्यादा थी। "
वह चुप हो गयी। वह फिर बाहर देखने लगा। मन में अजीब-अजीब विचार आते रहे। वह उस लड़की को जानता नहीं पहचानता नहीं, फिर भी वह उसे कितनी बातें बता रही थी।
"आपको बेवजह परेशान किया ना? देखियेे कितनी बातें बता दी अपने बारे में...वरना आपको क्या लेना-देना हो सकता है मेरी बातों से? पता है, मेरे मम्मी-पापा को भी नहीं पता कि मेरे साथ क्या-क्या होता रहा है! "
"कल कुछ हुआ था क्या? "
वह चौंक गयी, "आप कैसे जानते हैं ? "
"आप ही तो कह रहीं थी थोड़ी देर पहले। "
"ओह! ", वह आश्वस्त लगी। " आप भी सोचते होंगे कितनी अजीब लड़की है जो बोले जा रही है। मैं भी नहीं जानती मैं क्यों बता रही हूँ आपको ये सब,सच कहूँ मुझे अच्छा लग रहा है आपसे बात करके। "
"कोई बात नहीं, आप कह डालिए, शायद आपको बेहतर लगेगा।" उस लड़की ने हाँ में सिर हिलाया, पर चुप रही।
" कल की बात बता रहीं थी आप! "उसेे जाने क्यों जिज्ञासा हो रही थी।
" मुझे जलाने की कोशिश की थी। "
वह भौंचक्का रह गया! उसके साथ एक युवती बैठी है जो ससुराल से भाग कर आयी है, जो ज़िंदा जलायी जाने वाली थी। यानि अगर ससुराल वाले सफल हो गये होते तो वह लड़की उसके बगल में बैठी होने की बजाय अख़बार के तीसरे-चौथे पन्ने के किसी कोने में ख़बर बनकर छपी होती। उसने पढ़ी भी होती या नहीं क्या पता! पढ़ी भी होती तो 'पता नहीं क्या होगा इस देश का' या ' कब सुधरेंगे ये भूखे-नंगे हैवान! ' ऐसा कोई जुमला उछालकर अख़बार मोड़कर रख देता, और वह लड़की उसके विस्मृति के सिंधु के पार विलीन हो गयी होती।
परंतु वह तो बिल्कुल उसके बगल में बैठी है! उस लड़की ने लम्बी-सी साँस ली तो उसे लगा उसने हिचकी ली है। यकायक उसका ध्यान टूटा।
"पता नहीं मुझे कैसे शक हो गया! गैस की बू तो बहुत देर से आ रही थी मुझे। उन्होंने तो धकेल ही दिया था रसोई में...बस बच गयी मैं... पता नहीं कैसे... मुझे अंदर धकेल कर खुद गार्डन में बैठ गये... मैं भाग गयी, किसी को पता नहीं चला मैं कब निकली... पड़ोसियों का जंगला फाँदकर भाग आयी... "
उसकी हिचकियाँ बंध गयी थी, पर स्वर बहुत दबा हुआ था। उसकी कहानी सुनकर वह स्वयं पसीना-पसीना हो गया ! वह कल की भागी हुई है और आज इस वक्त बस में बैठी है, तो वह इतनी देर कहाँ रही,टिकट के पैसे कहाँ से आए... कितने सवाल थे, पर वह पूछने का साहस नहीं कर पा रहा था। उस लड़की ने आँखें पोंछ ली, खुद को संभाल लिया।वह खुद ही जैसे उसकी जिज्ञासा शान्त कर देना चाहती थी।
"कल रात किसी तरह अपनी एक सहेली के यहाँ पहुँची, उसी ने कुछ पैसे दिये और बस में बिठाया।रात भर उसके घर ही रही।"
उसे उस लड़की के बारे में सोचकर इतना अजीब लग रहा था कि वह रात को जल सकती थी। कल्पना में कितनी ही आकृतियाँ घूम गयी उसकी, जलती हुई,चीखती हुई, जान की भीख माँगती हुई... ज़्यादातर शायद फिल्मी तस्वीरें ही थी क्यों कि उसने सचमुच किसी को जलते हुए कभी नहीं देखा। जलकर बच गये लोगों को अवश्य देखा है। उनकी वीभत्स आकृति उसे दयनीय भी लगती हैं और डरावनी भी। उसका मन द्रवित हो गया। उसे उस लड़की पर बहुत दया आयी और ममता भी। वह जहाँ जा रही है, पता नहीं वहाँ भी क्या हो उसके साथ! माँ-बाप जानते नहीं आगत क्या है, जानती वह लड़की भी नहीं। वह सचमुच परेशान हो गया ।
उसने लड़की की तरफ देखा ही नहीं। खिड़की के बाहर देखने जैसा कुछ था ही नहीं। बाहर अंधेरा घिरने लगा था और खिड़की के शीशे ठण्ड के कारण बंद कर दिये थे। वह शीशे पर आ रहे प्रतिबिंब देखने लगा।
"कितने बजे हैं? " उस लड़की के स्वर से उसकी तंद्रा टूटी।
"चार", वह उसकी ओर देखे बिना बोला।
" साॅरी, मैंने आपको परेशान किया। "
वह शर्मिंदा हो गया कि उस लड़की से वह दिलासे के दो शब्द नहीं बोल सका।
"नहीं, नहीं मैं सोच रहा था कि...
" मैं बच कैसे गयी! "
"सचमुच आपकी किस्मत अच्छी थी, आपने समझदारी से काम लिया, नहीं तो...
" ये तो घर जाकर ही पता चलेगा कि किस्मत कैसी थी। कहीं उन्होंने भी नहीं रखा तो...लगेगा बची ही क्यों? "
"कैसी बातें कर रही हैं आप! भला माँ-बाप नहीं रखेंगे? "
उसकी आँखें डबडबा गयी,"क्या पता!" उसका गला रुंध गया।
"आप चिंता न करें, माँ-बाप ऐसा नहीं करते बच्चे के साथ। जो होगा अच्छा ही होगा। जब वो आपकी बात सुनेंगे तो...
" सुन लेंगे? " उसने बीच में ही काटकर सवाल किया।
" हाँ, क्यों नहीं ? "
"मेरी दो बहनें और हैं शादी के लायक, एक की बात चल रही है। " उसके पूछे बिना ही उसे उसकी जिज्ञासा का उत्तर मिल गया। वह कुछ देर चुप रहने के बाद कुछ संभली हुई लगी। उसके भीतर का उद्वेग कभी तीव्र होता दिखता, कभी वह स्वयं को समझाती हुई लगती।
"आप भगवान को मानते हैं? " उसने हामी भरी।
"तो मेरे लिए प्रार्थना कीजिएगा,करेंगे? "
"हाँ-हाँ क्यों नहीं! आप बिल्कुल फिक्र न करें।जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है। सब ठीक हो जाएगा। "
"अच्छा होने के लिए ही तो छल्ला पहना था...पर जो कुछ हुआ वो...आपने उतार दिया ना, अच्छा किया। मैं भी प्रार्थना करुंगी आपके लिए, आपको जल्दी ही अच्छी नौकरी मिल जाएगी।"
वह मुस्कुराया। तभी कंडक्टर उठा, "पिपली कुरछेत्तर वाले हैं जी कोई? "
उस लड़की ने दुपट्टा संभाला। सामान तो कुछ था ही नहीं उसके पास। सुनार के यहाँ से मिलने वाला एक बटुआ था जो उसने मुट्ठी में भींच रखा था। शायद सहेली ने ही उसमें रुपये डालकर दिया था।
"अच्छा नमस्ते। " उसकी आँखें छलछला गयी थी, होेंठों पर दर्द और आशंका भरी मुस्कान थी।
"एक बात कहूँ, दिल बहुत हलका हो गया आपसे बात करके। किसी को नहीं बताया था मैंने, अपनी उस सहेली को भी नहीं। "
वह खड़ी हो गयी। कुछ यात्री आगे बढ़ गये। उस लड़की ने एक बार फिर उसकी तरफ देखा। वह ममता से मुस्कुराया और हल्के-से उसकी पीठ थपथपा दी। वह थोड़ी आश्वस्त लगी। स्वयं को संभालती हुई वह आगे निकलकर उतर गयी। उतरते-उतरते भी वह पीछे मुड़कर देखना नहीं भूली। तभी बस आगे बढ़ गयी। उसने देखा कंडक्टर उसे ही देख रहा था।
चण्डीगढ़ पहुँचने तक वह उसी के बारे में सोचता रहा। कल्पना में उसने उसका पिपली से कुरुक्षेत्र और घर तक का पूरा सफर तय किया। माँ-बाप से मुलाकात का पूरा स्केच भी खींच दिया। माँ ने रोते-रोते गले से लगा लिया होगा, पिता चिंतातुर बैठ गये होंगे... बहनें शायद रो रही होंगी... पता नहीं क्या होगा! उसने छल्ले को जेब में रख लिया।
घर पहुँचने पर हाथ-मुँह धोकर भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ तो अनायास उस लड़की का चेहरा बीच में आ गया...मेरे लिए प्रार्थना कीजिएगा, करेंगे? और उसके मुुँह से अस्फुट शब्द निकले, ईश्वर, उसका साथ देना, उसकी रक्षा करना भगवान!
खाना खाते हुए पत्नी ने उसका हाथ देखा तो छल्ले की जगह पर सफेद पड़ी चमड़ी का निशान बना देखकर पूछा, "वो कील वाली अँगूठी कहाँ गयी? "
"उतार दी "
"अब कैसे उतार दी ? मैं कहती थी तब!"
तश्तरी रखने के लिए रसोई में गया तो दीवार के किनारे हल्दी की रेखा देखकर पत्नी से पूछा, "ये इतनी हल्दी क्यों गिरा रखी है?"
"गिरायी नहीं है, डाली है। चींटियाँ बहुत हो गयी हैं। रोज झाड़ती हूँ पता नहीं कहाँ से आ जाती हैं। पूरी लाईन बना रखी है ऊपर तक! "
"तो हल्दी से क्या होगा? "
"जहाँ जा रही हैं वहीं डाल दी है। जा ही नहीं पाएंंगी, नो एंट्री है। " पत्नी हँसते हुए बोली तो वह सिहर गया।
"अरे नहीं,ऐसा मत करो,जाने दो उन्हें। तुम्हारा क्या लेती हैं, शायद घर हो उनका वहाँ, वापस जा रही होंगी। घर की ड्योढ़ी पर ही हल्दी डाल दोगी तो...
उसने क्षण भर खड़े होकर देखा। चींटियाँ सचमुच हल्दी के किनारे तक आकर लौट जातीं या इधर-उधर बिखर जातीं। इतना लंबा सफर तय करने के बाद उन्हें क्या पता आगे क्या हो... कहीं लौटना पड़े या भटक जाएं...
उसने कपड़े से हल्दी पोंछ डाली। चींटियाँ फिर उस मुहाने तक आयीं और विलीन हो गयीं कहीं भीतर...
© भारती बब्बर
( सविनय आग्रह है कि कृपया अपनी टिप्पणी के साथ नाम अवश्य लिख दें, ताकि आपके परिचय से अवगत रहूँ 🙏)
वाकई आपकी कहानी की पटकथा, भाषा शैली लाजवाब है । मैं आपकी इस कहानी को पढ़कर आपकी फैन हो गई । आप हर पुरस्कार के योग्य हैं भारती जी । -- डॉक्टर सबीहा रहमानी 🤲🙏🤲
ReplyDeleteबहुत आभार सबीहा जी 🙏
Deleteचींटियों को इतने बारीक इस दृष्टिकोण से देखने की कला के लिए एक सुबुद्ध माहिर नजर चाहिये। जो आपके पास है। समाज में ऐसे बेहद दुखद उदाहरण मिल ही जाते हैं जिनका डर, शादी-ब्याह करते समय बेटी और उसके माता पिता की चिंता का कारण हैं।बहुत बहुत
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏परिचय से वंचित हूँ 😒
DeletePrema Bisht
ReplyDeleteHello di bahot sunder katha Aapke likhne ka andaj hamesha prashansaniye hota hai aur samaj ka ek aaina hota hai yuvti ki marmsparshi katha sunkar bahot dukh hota hai Aaj bhi hamare samaj main dahej ke lobhi baithe hai aur kahin na kahin iske jimmedar sayam larki wale hote hai ... thankyou di
बहुत आभार प्यारी प्रेमा 🙏
Deleteइस कहानी की लेखिका को मेरा सलाम,इतनी सुंदर,और दिल छूने वाली कहानी सिर्फ मेरी दोस्त"भारती बब्बर" ही लिख सकती है।👌👌👌👌👌🌹🌹🌹🌹
ReplyDeleteललिता विम्मी
भिवानी, हरियाणा
अब तुम्हारा आभार किन शब्दों में व्यक्त करूँ दोस्त...मेरी हर रचना को तुम बड़े ही आत्मीयता से सराहती हो...🙏
Delete🙏🙏मैं ललित सिराड़ी ईश्वर को साक्षी रख कर कहता हूँ कि यद्यपि में सौभाग्य से प्रतिभा धनी इस लेखिका का शिक्षक रहा हूँ पर मुझे कभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ था कि मैं भविष्य में लगभग 45-46 साल बाद मैं उसकी intenational ख्याति प्राप्त कहानी पढ़ने का जिसे पुरस्कृत भी किया गया हो अप्रत्याशित रूप seपढ़ कर गौरवान्वित होऊंगा।
ReplyDeleteयह तो हमारा परम सौभाग्य रहा है सर जो आप गुरू के रूप में मिले। आपके आशीर्वचन प्रेरणा और ऊर्जा के स्रोत हैं। 🙏
Deleteमेरी बात तो पूरी नहीं हुई, क्यों कि मुझे मोबाइल में यह सब करना नहीं आता और अब इस उम्र में। In short कहानी superb है भू बहुत बधाई एवं स्नेसिक्त शुभकामनायें। इस समय इतना ही। यशश्वी भव।
ReplyDeleteआपकी प्रतिक्रिया से ह्रदय गदगद हो गया सर 🙏। यह जो चार दशकों के बाद पुनः संपर्क हुआ, उसमें आपके व्यक्तित्व के बिलकुल दूसरे पहलू से परिचय हुआ है। आप स्वस्थ रहें सर, आपका आशीर्वाद मिलता रहे सर 🙏
ReplyDeleteAnonymous
ReplyDeleteThe poignancy of the story of woman fleeing a place of dread and trembling to assess what reception will she get at home of her parents has been so beautifully delienieted and articulated in the story by you.
ReplyDeleteHuman situations turns miserable and helpless so many times.
I remember a half page advertisement of Delhi police in a national newspaper many years ago.
It was meant to make society more empathic towards the plight of woman in such direful situations.
In the ad a lone young woman is on midst of a dark partly lit street of city draped in a saree.Her face full of dread ,anguish and desperation.The total imagery of surroundings reveal effectively that she has left her house or had been made to leave the house.
At the bottom the caption read.
"The home for a woman can be a more dreaded place than the dark deserted streets of the town."
Your excellent story so readily brought that ad to my mind seen so many years ago..
By juxtaposing the existence of ants with the story, the story gains a philosophical tenor and puts one on a pensive thinking mode. If a story can do it, it is simply an excellent writing.
Well , when a deep feeling or situation is expressed by way of literary or any other art ,.it for a while makes the mind to transcend its limited boundaries and reach something bigger than life and its predicaments bad or good
That is why good stories fascinate thinking, refined minds.
Congratulations for writing the excellent story and thanks for sharing it .
Kcjosshi
Thank you so very much KC. 🙏 You are so articulate in your analysis that I am honestly groping for words to respond to it , writing the story was much easier 😊. I admire your words as much as you do my writing.
Deleteअति सरल, सहज एवं सुंदर शब्द। आपका अतुलनीय लेखन प्रारंभ से अंत तक बांधे रखता है। आप और अधिक ख्याति प्राप्त करें यही शुभकामना है।
ReplyDeleteप्रभात शाह
बहुत बहुत आभार प्रभात 🙏मित्रों की प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ ऊर्जा देती है।
Deleteबेहतरीन जिसतरह तुमने आपे पात्रों को कहानी में पिरोया है l सफर के छोटे छोटे अनुभव जैसे सीट में कोई दूसरा ना आए , खड़की से बाहर ताकना फिर रात को खिड़की की कांच पर पड़ रही पर परछाईं को देखना l बहुत सुंदर लेखन है बधाई
ReplyDeleteH S Rawat
बहुत बहुत आभार हरेंद्र 🙏
Deleteभारती जी आपके बुलंद क़द का अंदाज़ा पहले से था और आज इस अंतरराष्ट्रीय पुरुस्कृत कहानी को पढ़ कर आपकी लाजवाब बौद्धिक और रचनात्मकता का एहसास हुआ । कथ्य, शिल्प, पात्र, भाषा शैली सभी कुछ लाजवाब है । इस कहानी की विस्तृत समीक्षा करुंगी यदि मेरा बदकाल मुझे वक्त देगा ।🤲🙏🤲 डॉक्टर सबीहा रहमानी
ReplyDeleteआपका ह्रदय से आभार सबीहा जी। एक लेखिका के प्रति दूसरी लेखिका की समीक्षा अमूल्य है। 🙏
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