माइक्रोवेव
वह मनोहर साहब से मिलने के लिये सचमुच आतुर थी।आख़िर कोई तो मिला जो उनके प्रोजेक्ट में पैसा लगाने को तैयार हुआ।उस दिन जब रौशन ने आकर बताया कि मनोहर साहब तैयार हो गए हैं तो उसकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह वही रही। वह खुशी से उछ्ली नहीं, 'अच्छी बात है ' कहकर काम में लगी रही। तैयार तो सभी हो जाते हैं, लगाएंगे सच में तो मानें।
शहर की उन्नति, विकास, इतिहास, भूगोल, चरित्र, लोककला और भविष्य की संभावनाओं को लेकर वृत्तचित्रों की श्रृंखला बनाने का प्रोजेक्ट था। कुछ निजी कम्पनियों ने इसमें रुचि तो ली, किन्तु कम्पनी के नियमानुसार वे स्पॉन्सर कर सकते थे,निर्माण नहीं। उन्होंने रौशन को भरोसा दिलाया था कि वे स्पॉन्सरशिप के तौर पर अच्छी रक़म दे सकते हैं, अलबत्ता निर्माण का खर्च रौशन को ही करना होगा।
रौशन की मनोहर साहब से इसी संदर्भ में मुलाक़ात होती रही। एकता ने कहा रौशन से, 'तुम ज़्यादा उतावले मत होना उनके सामने , जैसे तुम्हें ही ज़रूरत है ! '
रौशन हँसा , 'हमें नहीं है ज़रूरत तो किसे है ? '
' तुम ये न समझो कि वो तुम्हारी ज़रूरत के लिए लगायेंगे । वो लगायेंगे अपने लिये, वसूल करेंगे सूद समेत !'
रौशन को उसकी बात सही भी लगी। पर उसने सोचा, एकता कुछ भी कह सकती है क्योंकि उसे थोड़े ही बात करनी होती है लोगों से! उनसे डील तो मैं करता हूँ! ये क्या जाने कितना पटाना पड़ता है !
फिर भी एकता की राय को वह टाल नहीं सकता था । उसने मनोहर साहब से दोबारा बात नहीं की। चौथे दिन स्वयं उनका फोन आ गया।
' क्या हुआ रौशन मियाँ, प्रोजेक्ट पर काम रुक गया क्या ? '
उनका फोन पाकर रौशन का मन बल्लियों उछला, लेकिन एकता की बात को ध्यान में रखते हुए उसने स्वयं पर नियंत्रण रखकर कहा,' रुक कैसे सकता है मनोहर साहब , मेरी तो दाल-रोटी यही है। किसी भी हाल में करना तो है ही !'
' तो ठीक है, कब मिलते हैं? मैं तैयार हूँ। कब चेक दूँ बोलो? या कॅश चाहिए?'
अब तो रौशन की आवाज़ खनके बिना न रह सकी।
' कल सुबह ही आता हूँ। "
उसने तुरंत एकता को बता दिया। एकता सधी रही, वह कभी भी तीव्र प्रतिक्रिया नहीं देती।
' वे तैयार हैं, सेंट-परसेंट !! ' रौशन ने ज़ोर देकर कहा।
' ठीक है, मिलकर पहले बात तो करो...शर्तें वगैरह क्या रखेंगे ? '
सब तय हो गया । पैसा मनोहर साहब का, काम की ज़िम्मेदारी रौशन की। फिफ्टी-फिफ्टी की पार्टनरशिप। आते सोमवार चेक मिला तब एकता को यक़ीन हुआ।
' तुम तो नेगेटिव सोचती हो।'
' इसे नेगेटिव नहीं, न्यूट्रल कहते हैं।'
' ठीक है, ठीक है...अब अपना प्रोजेक्ट वन टू थ्री अप !!! ' रौशन ने विमान उड़ाने के अंदाज़ में कहा।
' इतनी आसानी से पैसे नहीं मिलते मेरी जान, लोगों को पटाना पड़ता है। और लोग भी शातिर होते हैं, कोई पप्पू नहीं जो सुनते ही हाँ कर देंगे ! ये मनोहर साहब को ही लो , पिछले चार महीनों से पीछे लगा हूँ। वो तो चाहते ही थे, उनकी पत्नी ज़रा हिचक रही थीं शायद। अब भी तैयार नहीं थीं। '
' फिर भी मनोहर साहब ने दे दिये ? '
' सब हमारी तरह होते हैं क्या, जोरू के ग़ुलाम ? '
'ओह रियली !! '
एक दिन उनका फोन आया, वे घर आ रहे हैं। आकर्षक व्यक्तित्त्व और बातों के धनी मालूम हुए। उसे देखते ही बोले,' ओके, तो आप हैं मिसेज़ रौशन जिनसे इनकी दुनिया रौशन रहती है !'
वे सोफ़े पर बैठ गए। रौशन बाथरूम में था। उसने पानी दिया, चाय-कॉफी पूछी।
' कुछ नहीं, मैं बीच में कुछ नहीं खाता। सुबह एक कप कॉफी लेता हूँ फिर खाना ही खाता हूँ। आप नौकरी करती हैं ? '
उन बातों के बीच अचानक दाग़ा गया यह प्रश्न उसे अटपटा लगा। उसे लगा वे बात तो उससे कर रहे हैं , पर उनकी आँखें घर का आर्थिक स्तर आँक रही हैं।
’ जी नहीं।'
' कुछ और ? '
' कुछ नहीं। '
'अच्छा, घर पर ही रहती हैं ? घर का काम-काज रहता ही है।रौशन साहब का ख़्याल रखती हैं !' उन्होंने ठहाका लगाया। वे स्वयं ही प्रश्नोत्तर करते से लगे। तभी रौशन आ गया।
' कुछ दिया नहीं इन्हें ? क्या लेंगे साहब ? '
' मैंने पूछा पर...'
' अरे, कुछ नहीं ,' वे बीच में ही बोले , 'आपको पता तो है मैं सीधे खाना ही खाता हूँ। सुबह तीन-चार घंटे के लिए निकल जाता हूँ, इसी तरह मेल-मुलाक़ात करता हुआ। आज तो पार्वती ने सुबह ग्लास भर जूस ही पिला दिया।'
उनकी पत्नी होगी, एकता ने सोचा। उन्होंने नाम के साथ कोई परिचय नहीं दिया। वे चले गये तो रौशन ने पूछा,'कैसे लगे ? '
' पूछ तो ऐसे रहे हो जैसे लड़की का रिश्ता करवाना हो तुमने ! ' वह हँसी।
' भई तुम्हारी राय ज़रूरी है, फेस रीडिंग करती हो ना ! '
पर एकता ने कोई राय नहीं दी।
' पार्वती पत्नी है उनकी ? '
" नहीं, नौकरानी ।"
'और पत्नी ? '
' उनका नाम मुझे क्या पता !'
' तुम मिले नहीं कभी ? '
' एकाध बार ही, वे घर पर कम रहती हैं। सोशल वर्कर हैं।'
सच ही है , सोशल वर्कर बनने के लिए घर से बाहर रहना पड़ता है। घर बैठकर सोशल वर्क थोड़े ही होता है ! तभी तो वह नहीं बन पायी, उसे तो घर से प्यार है। पापा कहते थे ,' चैरिटी बेगिन्स एट होम '....पर उसने किसी सोशल वर्कर का घर नहीं देखा जहां चैरिटी होती हो या कम से कम शुरू हुई हो। उनका सारा काम घर से बाहर समाज के लिये ही होता है। मनोहर साहब की पत्नी महिलाओं के उत्थान सम्बन्धी किसी संस्था की उपाध्यक्ष हैं।
प्रोजेक्ट में उनका पैसा क्या लगा , उनकी बातचीत का प्रमुख विषय प्रोजेक्ट और मनोहर साहब ही हो गये। रौशन उन्हें काफी मानने लगा , पैसा तो हमारे नाम पर ही लगाया वरना इस ज़माने में कौन यक़ीन करता है ! बेशक दुगना-तिगुना कमाने की ख़्वाहिश ही ऐसा करवा सकी उनसे ,पर लाखों रुपये दाँव पर तो उन्होंने लगाये ही हैं !
अब रौशन को घर लौटने में देर हो ही जाती। ख़ासकर काम तेज़ होने के साथ उसकी व्यस्तता बढ़ती गयी। मनोहर साहब ने अपने बेटे को साथ लगा दिया। वे उसके नाम पर ही काम कर रहे थे। एक ही तो बेटा है उनका, दो बड़ी बेटियां ब्याही हुई हैं।
शाम को फोन आ जाता रौशन का , देर से आने की बात होती या प्रोजेक्ट पर किसी मुद्दे की बात।
' कितने बजे तक आओगे ? ' वह समय ज़रूर पूछती। रौशन भी समय यूँ बताता मानो ठीक उसी वक़्त आ जायेगा।
' दस साढ़े दस तक आ जाऊँगा।'
वह गिन लेती ,यानि ग्यारह तो बजेंगे ही। फिर भी वह साढ़े दस फोन कर देती,' कितनी देर है अभी ? ’
' तुम खाना खा लो प्लीज़ ,मैं घर पर ही खाऊंगा। '
वह खाकर उसके लिये रख देती। रात जब वह लौटता वह जाग रही होती। रौशन के नहाने तक खाना गरम कर देती, रोटी सेक देती।
' कैसा रहा दिन ? क्या हुआ... ' पूछे बिना दिन पूरा कहाँ होता ! खाते-खाते रौशन सिलसिलेवार उस दिन का सारा घटनाक्रम बता देता।
' उनके घर भी गए थे क्या ? '
'हाँ, वहीं बुला लिया था उन्होंने,आज पत्नी भी थी उनकी। प्रोजेक्ट पर बहुत बातें हुईं आज...तुमसे मिलने को काफी बेताब हैं।'
एक दिन उनका बेटा पुष्कर भी आया । रौशन ने मिलवाया , ' ये हैं मेरी कमांडेंट...'
' हैलो आंटी ! ' उसका संबोधन उसे बुरा नहीं पर अजीब ज़रूर लगा । तेईस-चौबीस साल का वह लड़का उसे इतना छोटा नहीं लगा और स्वयं उसके सामने इतनी बड़ी नहीं लगी कि उसे आंटी कहता ! वह ढीला-ढाला सा युवक लगा, नीची जीन्स पहनकर सुस्त चाल वाला।
'आपसे डरते हैं अंकल। ' वह हँसा।
' तुम क्या डरते हो मुझसे ? '
' ये तो पगला है ,पता है क्या कहता है जब तुम फोन करती हो ? बस घर से फोन आ गया, अब अंकल जाएंगे, छेड़ता है मुझे !
' आहाहा...अपनी ऐसी इमेज बना रखी है तुमनें ? मानो फोन की घण्टी बजते ही निकल पड़ते हो ! '
' पूछ लो ! '
' सही है आंटी '..….बात हँसी में टल गई। रौशन पुष्कर के साथ वापस चला गया। वह लम्बी-सी गाड़ी में आया था। पिता के पास अलग बड़ी गाड़ी थी।
' एक गाड़ी वाइफ के पास भी है। रईस हैं वैसे ! ' रौशन को वो शहर के सबसे बड़े रईस लगने ही थे।
' मैंने सुना है आप बहुत अच्छी कुक हैं। रौशन मियाँ बहुत तारीफ़ करते हैं आपके खाने की। कभी खाते नहीं बाहर,बहुत कहते हैं हम पर मानते ही नहीं।' एक दिन वे बोले।
' मैं खा ही नहीं सकता बाहर, खाना घर का ही अच्छा !' रौशन नें जवाब दिया।
वे ठहाका लगाकर बोले,' क्यों नहीं मियाँ क्यों नहीं ! हर कोई हमारी तरह बाज़ार का शौक़ीन थोड़े ही होता है !' उन्होंने आँख मारकर फिर ठहाका लगाया, रौशन मुस्कुराया और एकता ने ध्यान हटा लिया।
ऐसे ही एक दिन फिर आये वे। रौशन के साथ कागज़ात देखते रहे।
'आपका कहना बहुत मानते हैं आपके मियाँ।' वे बोले।
' ऐसा क्यों लगा आपको ? ' उसने पूछा।
'और क्या? उस दिन बड़े मज़े में बैठे थे,आपका फोन आते ही बोले अब तो जाना है और उठकर चल भी दिये ! '
वे दो दिन पहले की बात कर रहे थे। उस रात वह देर तक इंतज़ार करती रही ,फिर फोन किया था।
' ओह, पर उस दिन देर भी काफ़ी हो गयी थी। मैं सोचती रही जाने कहाँ रह गए।'
' ससुरा हमें कोई नहीं पूछता इस तरह !' वे हँसे।
'अच्छा, मैडम से कहूँगा आपको फोन कर दिया करेंगी ।' रौशन ने कहा।
' उन्हें याद भी तो आनी चाहिए हमारी ! ' वे ठहाका लगाकर हँसे।
' याद आ जाये तो ?' एकता बोली।
' तो कौन सा हम फ़ौरन उठ पड़ेंगे ?' एक और ठहाका लगा।
एकता ठहाकों के बीच अनसुने स्वर ढूँढती रही। वे जाने के लिए उठे।
' एक बात है रौशन मियाँ, साले अगले जनम में हम भी लव मैरिज करेंगे।'
एकता अचानक ये सुनकर हतप्रभ रह गई । वे फिर बोले, ' और कुछ करें न करें ये तो ज़रूर करना है।इस जनम में सबकुछ किया यही नहीं किया।'
वे ठहाका लगाते निकल गये। उनके जाने के बाद भी देर तक उनके शब्द एकता के कानों में गूँजते रहे। उसे कहाँ मालूम कि उसका रौशन को यूँ फोन करना और फोन सुनकर रौशन का आना अपने में इतने गहरे अर्थ संजोता है। उसके लिये तो था ही दूसरों के लिये भी।
प्रोजेक्ट की तैयारी अंतिम पड़ाव पर पहुँच गयी। एक दिन रौशन ने उसे कहा कि वह मनोहर साहब की पत्नी को मिलने चली जाये। वे मिलने की इच्छुक हैं और प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले तो मिल आना चाहिए। उन्होंने ही उस दिन दोपहर चार बजे का समय तय कर दिया।
रौशन पुष्कर के साथ उसी की गाड़ी में लेने आ गया। लेकिन वह रास्ते में ही कहीं उतर गया और वह पुष्कर के साथ उसके घर चली गयी।
आलीशान बंगला, बाग़-बाग़ीचा,एक पेडिग्री कुत्ता, नौकर-चाकर...कुल मिलाकर उच्च स्तरीय जीवन शैली। पुष्कर ने दरवाज़े की घण्टी बजायी तो दरवाज़ा नौकरानी ने ही खोला ।
" ममा कहाँ है?" पुष्कर का सवाल था।
" गेम पर गयीं हैं। कहकर गयीं हैं कि बुलवा लेना आये तो।"
" ठीक है ", कहकर पुष्कर उसे बड़े-से सजीले ड्रॉइंग रूम में ले गया। कमरे में मनोहर साहब की विदेश यात्राओं के प्रतीक सजे हुए थे। घर काफी सुसज्जित था। उसे बिठाकर पुष्कर ' एक्सक्यूज मी ' कहकर चला गया। उसे किसी बड़े होटल की रिसेप्शन लॉबी याद आ गयी।
उसे बहुत अजीब लगा। खुद बुलाकर उनका घर से गायब होने उसे अटपटा और अपमानजनक लगा। और वे गयी कहाँ हैं, गेम पर,यानी ताश खेलने। वही रईस औरतों का पसंदीदा शौक ! सिर्फ ताश नहीं,पैसा लगाकर एक जुआ। पुष्कर कुछ देर में आ गया।
" क्या लेंगी आंटी ? "
" कुछ नहीं।" वह औपचारिक बनी रही।
" ममा आ रही हैं, फ़्रेंड्स के पास गयी हैं कार्ड्स खेलने।"
उसे लगा यह कहते हुए वह ज़रा भी हिचकिचाया नहीं। उसने कोई बहाना नहीं बनाया, बेहिचक कितनी सहजता से कह दिया, कार्ड्स खेलने, जैसे सत्यनारायण की पूजा में गयी हो।
थोड़ी देर बाद गाड़ी रुकने की आवाज़ आयी और पार्वती ने घण्टी बजने से पहले ही दरवाज़ा खोल दिया। वे अंदर आयीं। चेहरा सख़्त-सा लगा। कोई मुस्कुराहट नहीं, किसी से पहली बार मिलने पर होने वाली औपचारिक मुस्कान तक नहीं। बल्कि बोलते समय उनके दाँत भिंचे रहते जिससे शब्द किसी सपाट सतह से सरकते हुए-से लगते। शब्दों की गोलाई और उनके आकार का अनुभव ही न होता।
" आइये, आप आ गयीं ! "
उनके इस वाक्य का वह कोई अर्थ नहीं निकाल पायी। उनके अंदर आते ही उनके शरीर से निकलने वाली तरंगों को एकता की तरंगों ने पटक दिया। उसका जी चाहा तुरंत उठ कर चल दे , लेकिन औपचारिकतावश बैठी रही।
' नमस्ते, कैसी हैं आप ? आपसे मिलना रह गया था...मनोहर साहब और पुष्कर से तो मुलाक़ात होती रहती है। '
' हाँ,मैं बिज़ी रहती हूँ। '
हुँह,हमें तो जैसे कोई काम ही नहीं होता ! निट्ठल्ले की तरह ख़ुद ताश खेलने जाती है ! उसने मन में सोचा।
थोड़ी देर बाद नौकरानी चाय की ट्रे लेकर आयी, साथ में कुछ बिस्किट मिठाई वगैरह भी।
' लीजिए '
' नहीं, मेरा व्रत है आज। ' मन ही मन उसने सोचा, कितना अच्छा हुआ वह व्रत वाले दिन आ गई वहाँ कुछ खाने का मन नहीं हुआ।
' अरे तो क्या खिलाऊँ आपको ? '
' कुछ नहीं, बस आपसे मिलने आयी हूँ ।' वह मुस्कुराते हुए बोली।
' क्या ख़्याल है आपका प्रोजेक्ट के बारे में ?'
' बहुत अच्छा है ' ,एकता हँसी।
' आप तो सुना है अपने हसबंड के साथ पूरा काम करती हैं। मेरे पास तो टाइम ही नहीं है। '
' हाँ, मैं यही एक काम करती हूँ,रौशन को सपोर्ट करने का।'
' ह्म्म...' उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की शायद, लेकिन मुस्कुराहट दांतों की भींच में कहीं दब गयी। वे उसे जाँचती हुई सी लगी।
फिर बोलीं, ' मुझे तो बहुत देर से बताया इन्होंने। मुझे पसंद नहीं कि आप अपना काम छोड़कर आउट ऑफ वे किसी नये प्रोजेक्ट को करें। नये काम का क्या भरोसा...वैसे आपको क्या लगता है, प्रॉफिट होगा ?'
' आख़िर प्रॉफिट की उम्मीद से ही कोई काम किया जाता है मिसेज़ मनोहर... जिसे उम्मीद ही नहीं होगी वह करेगा ही क्यों ? ' उसे स्वयं का लहजा किसी एग्जेक्यूटिव की तरह लगा।
' वैसे अपने पण्डित जी को भी दिखाया था हमनें, वे तो कह रहे हैं कम से कम तेईस गुना फायदा होगा। ' वे उस कल्पना से भी न मुस्करायीं, पर एकता हँसे बिना नहीं रह सकी।
' लो, फिर भी आप मुझे पूछ रही हैं ! हमनें तो किसी को नहीं पूछा। हमें तो जो सही लगता है बस कर लेते हैं !'
जवाब में वे क्षण भर देखती रही बस। एकता उठने लगी, 'अच्छा, अब मैं चलूँ ? मुझे पुष्कर ने ही छोड़ना है और अभी इसे काफी काम हैं... है न ?' उसने पुष्कर को देखा, वह ढीली-सी हँसी हँसा।
वह उठकर आ गयी। उसे लगा सच ही कहते हैं मनोहर साहब, उनका तो वाक़ई लवमैरिज करने का मन करता होगा !
रौशन व्यस्त होता गया। एक दिन एकता की तबियत अचानक ख़राब हो गयी। उसका मन रौशन के साथ रहने को हुआ पर उसे याद आया कि आज तो बहुत ज़रूरी मीटिंग है। किसी कम्पनी के उच्च अधिकारियों के साथ किसी बैठक की बात बतायी थी रौशन ने। ऐसे में उसे बुलाना न ठीक होता न मुमकिन। पर रोज़ की तरह आज भी वह देर रात आये तो? तब तक क्या होगा! सोचकर एकता और घबरा गई। पर कुछ सोचने से पहले ही रौशन का फोन आ गया।
' क्या बात है, आवाज़ ढीली क्यों है ?' जब तबियत का पता चला तो बोला,' आ रहा हूँ आधे घंटे में।'
और सचमुच वह आ गया, साथ में पुष्कर भी। एकता को लगा वह देखकर, दवा देकर चला जायेगा। पर एकता की हालत देखकर उससे रहा न गया।
'पुष्कर, मुझे डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा।'
' लेकिन अंकल मीटिंग...?'
'उसका तय तो नहीं हुआ अभी?मैं कुछ करता हूँ।' कहकर रौशन ने फोन घुमाने शुरू किये और मीटिंग परसों तक टाल दी। वह उसे डॉक्टर के पास ले गया और फिर घर पर ही रहा। एकता सोचने लगी,सचमुच रौशन उसका कितना ध्यान रखता है ! फिर उसे मनोहर साहब की बात याद आयी लवमैरिज वाली।
'तुम्हारी मीटिंग ज़रूरी थी न ?' उसने पूछा तो रौशन बोला, 'तुमसे ज़्यादा नहीं।'
अब तो एकता को भी रौशन का हाथ बंटाना पड़ता। वह भी उसके साथ जाती, तैयारी करवाती। उसे तो जैसे काम का एक-एक ब्यौरा पता होता। पुष्कर इस बात से हैरान हो जाता।
" रौशन अंकल कुछ नहीं छुपाते आपसे। है ना आंटी ? "
" मतलब?"
" आपको तो इतने डीटेल्स पता हैं। ममा को तो पता ही नहीं है कि हम असल में कर क्या रहे हैं !"
" उनके पास अपने काफी काम हैं।" एकता ने कहा।
" पापा बताते ही नहीं हैं। उनको तो तब पता चला जब पापा ने चेक दिया।"
"कमाल है," रौशन बोला, " मैं तो समझता था उन्हें पता है।''
" नहीं अंकल,पापा को बिल्कुल आदत नहीं है, मुझे बताया था, ममा को नहीं।"
वह भी थोड़ा हैरान हुई। पुष्कर हँसा जा रहा था।
" हमारे पापा तो कमाल के हैं। पता है आंटी, जब हम स्पेन में थे ,पापा ने पूरा मकान, कार सबकुछ बेच दिया था और ममा वहीं थीं। सब निपटा कर पापा स्पेन आये तब ममा को पता चला।"
"ये तो हद ही हो गई ! " वह हैरान हुए बिना नहीं रह सकी,
"तुम्हारी ममा ने कुछ कहा नहीं ?"
" डिप्रेशन हो गया था , पर पापा ने कहा ,जब रहना वहीं है तो क्या करना है यहाँ रखकर? ममा कर भी क्या सकती थी? पता है आंटी, मैं सोचता हूँ, फादर हों तो पापा जैसे और हसबंड हों तो अंकल जैसे, दोनों आइडियल हैं।"
"थैंक्यू यार," रौशन ने अपने हिस्से की तारीफ़ के बदले में कहा।
" कुछ भी फाइनल होते ही अंकल आपको बताते हैं सबसे पहले, हैं ना ? हमारे साथ बात करते हुए भी कितनी बार आपका नाम लेते हैं।"
" कल हवन रखा है इनके घर पर ही। प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले कुछ पूजा-पाठ कर ही लें। हम तो ऐसे ही हैं फक्कड़, लेकिन मिसेज़ मनोहर को बहुत यक़ीन है।" रौशन ने बताया।
एकता ने भी सोचा, ठीक ही है। मतलब पूजा होने से ही है कहीं भी हो, प्रोजेक्ट हमारा हुआ तो क्या बराबर के हक़दार तो वो भी हैं। यूँ भी पूजा का सारा तामझाम वहीं हो तो ठीक है। खुद वह आराम से तैयार होकर जायेगी, ठाठ से लौट आयेगी। कुछ करने की ज़िम्मेदारी नहीं !
अगले दिन वह पहुँची तो हवन की तैयारी जैसा कुछ भी नज़र नहीं आया। मिसेज़ मनोहर भी दिखाई नहीं दी।
" आइये,आइये," मनोहर साहब हमेशा की तरह हँसते हुए बोले।
" मैडम नहीं हैं ?" रौशन ने पूछा।
" आती ही होंगी। वो वीकली मीटिंग होती है ना वेलफेयर सोसाइटी की,पहुँच जायेंगी जब तक शुरू होगा।"
एकता ने स्वयं को उनके स्थान पर रखा। हवन उसके घर होता तो? उसे फुरसत ही न होती। आने वालों में कोई मेहमान न हो तो भी यदि घर पर कोई समारोह है, चार जनें इकट्ठा होंगे ,स्वयं को व्यस्त रखने के लिए यही काफी है!कितनी तैयारियां होती हैं, प्रसाद के लिए हलवा बनाये, सामान जुटाए,सामग्री, समिधा, तश्तरियां, कटोरियाँ, धूप, चन्दन,रौली,मौली,हार,बैठने का इंतज़ाम.... कितने काम!!
यहाँ कुछ नहीं। एकता गुदगुदे सोफे पर पीठ टिकाये एक चमकीली पत्रिका पलटती रही। पूजा जिसके घर है वही जाने। आखिर वो कर भी क्या सकती है ! मनोहर साहब एक कमरे से दूसरे कमरे में पार्वती, पार्वती पुकारते हुए गुज़रते दिखते। घर में एक-दूसरे से अधिक उसी का नाम लेते हैं शायद !
" पण्डित जी कहाँ हैं भई?"
लो अभी पण्डित का भी नहीं पता ! " मैं जाता हूँ" कहकर पुष्कर उन्हें लिवाने चला गया। पूजा की तैयारी अभी भी नहीं दिखी,न घर की मालकिन !
आख़िर वे पधारीं । वे चुपचाप ही आयीं।
" हाँजी, कैसी हैं ? आपकी तबियत खराब थी ना ? " वे एकता से बोलीं। एकता मुश्किल से मुस्कुरा सकी " अब ठीक हूँ"। उन्होंने उत्तर पर ध्यान दिया नहीं।
" पण्डित जी को बुलाया या नहीं ? " तभी उन्हें लेकर पुष्कर आ गया। उनके आने पर तैयारी शुरू हुई। उन्होंने एक एक वस्तुओं का नाम लेना शुरू किया। शुक्र है टीका,फूल, समिधा, सामग्री जैसी मूल वस्तुएं वे साथ लाये थे।
" प्रसाद भी ले आइये।"
" लाओ भई ! " मनोहर साहब बोले। पार्वती काँच के डोंगे में प्रसाद ले आयी। आचमन के लिए कटोरियाँ माँगी तो वो भी काँच की।
" ये प्रसाद किसी धातु के कटोरे में दीजिए।" पण्डित जी बोले।
"मतलब ?" मिसेज़ मनोहर ने पूछा।
" स्टील, ताम्बा, पीतल कुछ भी हो...काँच का तो..." पण्डित जी कोई कारण तो न बता सके लेकिन हवन में काँच के बर्तन उसे भी अजीब ही लगे। लोटे की जगह भी काँच का एक डिज़ाइनर जग रखा गया।
" अरे पार्वती भई कोई स्टील-वील का कटोरा लाओ," मनोहर साहब बोले। पार्वती प्रश्नवाचक दृष्टि से देखती रही।
"जाओ भई, उसे बताओ," वे पत्नी से बोले। वे उठीं और रसोई में स्टील के बर्तनों की खोज शुरू हुई।
"पार्वती, अपने पास स्टील का बोओल है क्या ?" वे नौकरानी से पूछती दिखी।
"नाहीं मेमसाब, काँच ही का धरा है सारा।"
" क्यों पण्डित जी काँच में पूजा नहीं हो सकती क्या?"
"ऐसी बात नहीं है, पर धातु के बर्तन ही अच्छे लगते हैं, शुध्द माने जाते हैं।"
"आजकल रखता कौन है स्टील के बर्तन ?" वे अब भी ऊपर नीचे अलमारियां खोलकर देख रहीं थीं। " माइक्रोवेव में सिर्फ काँच चलता है इसलिए मेटल रखने की नौबत ही नहीं आती, पकाने के लिए है कुकर,कड़ाही..."
"पण्डित जी माइक्रोवेव का ज़माना है ना ," मनोहर साहब बोले।
"हाँ साहब,गरम पकाकर आजकल लोग कम ही खाते हैं," पण्डित जी विस्मय से बोले," एक बार पकाया और गरम कर कर के खाते रहते हैं ! "
"हाँ सच है, हम ऐसा ही करते हैं। डीप फ्रीज़र में रख देते हैं, चिकन,दालें, सब्ज़ियाँ... निकाला और सीधे माइक्रोवेव में...ताज़ा हो जाता है !" मनोहर साहब ने कहा।
पण्डित जी हँसे," गरम कहिये साहब ,ताज़ा दोबारा कैसे होगा?"
"वही बात है! पर इसके फायदे बड़े हैं पण्डित जी! घर वाली की ज़रूरत नहीं रहती। जब चाहो खुद गरम करके खा लिया," वे ज़ोर से हँसे। "हमारे घर में यही होता है। किसी का एक टाइम तो है नहीं, जिसका जब मन करे,या जब भी बाहर से आये खा सकता है।"
"इसमें खाना पकता नहीं है क्या?" पण्डित जी ने जोत बनाते हुए उत्सुकता से पूछा।
"पकता भी है, पर पकाता कौन है ! उसके लिए हमारी पार्वती जी हैं ना ! वो एक बार सुबह पका कर चली जाती हैं, हम अपने हिसाब से गरम कर लेते हैं। एकदम बढ़िया चीज़ है रौशन मियाँ, आप भी ले ही लो एक। मैडम फ्री हो जाएंगी फिर।"
रौशन हँसा, "मेरी माइक्रोवेव तो यही है। जब चाहता हूँ गरम और ताज़ा खाना मिल जाता है।" उसने बात शायद मज़ाक में नहीं कही , लेकिन सब ज़ोर से हँसे। एकता को समझ नहीं आया कि बेहतर किसे ठहराया गया और तारीफ किसकी हुई,उसकी या माइक्रोवेव की!
" पर अब पूजा का क्या करें?"
"मेमसाब, हम लिवा लायें क्या अपने घर से?" पार्वती ने पूछा।
" नहीं रहने दो," कहकर मिसेज़ मनोहर बैठ गयीं," इन्हीं से काम चला लीजिये पण्डित जी।"
" ठीक है, जैसी यजमान की इच्छा !" पण्डित जी ने कहा और पूजा सम्पन्न हुई।
मुबारकबाद के औपचारिक आदान-प्रदान के बाद वह लौट आयी। प्रोजेक्ट भी शुरू हो गया। एकता अकसर जाती शूटिंग पर रौशन के साथ और मनोहर साहब हर बार मिलते।
" मिसेज़ नहीं आयीं आपकी?" एक बार पूछ ही लिया उसने।
"आजकल ज़रा बिज़ी हैं, परसों नाइजेरिया जा रही हैं, सोसायटी के काम से।"
जाने से पहले वे एक बार आयीं थोड़ी देर के लिये। महीने भर में प्रोजेक्ट का सारा काम खत्म हो गया। मनोहर साहब तेईस गुना फायदे की उम्मीद के कारण बहुत उत्साहित लगे।
प्रोजेक्ट के समाप्ति पर बड़ी कम्पनियों में उसकी काफी चर्चा होने लगी। रौशन ने एक बड़े होटल में सभी सम्बन्धित कम्पनियों के अधिकारियों की बैठक आयोजित की ताकि डील पर बातचीत हो सके। मीटिंग के बाद लंच भी रखा गया। रौशन के साथ वह भी गयी, पुष्कर अकेला ही आया।
"ममा तो कल ही दिल्ली गई हैं, पापा आ जायेंगे।"
मीटिंग शुरू हो गयी ,पर वे नहीं पहुंचे। बीच में रौशन को उनका मेसेज आ गया -- कहीं फँस गया हूँ, काइंडली बेयर।
रौशन अकेले सबकुछ करने में सक्षम था। यथा कार्यक्रम संपन्न हुआ। लंच भी पूरा होने को आया तब वे पधारे।
" कहाँ रह गये?" रौशन चिंतित भी हुआ कि सारा समय साथ रहने वाले मनोहर साहब फैसले वाले दिन ही कैसे ग़ायब हो गए!
"बताता हूँ बाद में।"
सभी अधिकारी विदा हुए तो रौशन ने घेर लिया।
" अरे भई माइक्रोवेव कम्पनी के चक्कर लगा रहा था।"
" नया ले रहे हैं?"
" अरे नहीं, वही पुराना वाला कुछ तकलीफ़ दे रहा था। ठीक कराया मेकेनिक से, पर हुआ नहीं। कम्पनी को फोन किया तो आज आ गये। उनके साथ कम्पनी के दफ्तर जाना पड़ा।माइक्रोवेव ठीक ना होता तो खाने के लाले पड़ जाते साहब!पार्वती देवीजी तो बना कर चली गयीं, मेमसाहब भी नहीं हैं, फाइनली ठीक करवाकर ही आ पाया। और आप बताओ सब हो गया ठीक-ठाक ?"
"हाँ, काफी पॉज़िटिव लग रहा है इनका रिस्पॉन्स।"
"मुझे पता था आप सम्भाल लेंगे मेरी क्या ज़रूरत है? फिर आपकी रौशनी भी तो है आपके साथ!" उन्होंने ठहाका लगाया तो इस बार वह भी हँस पड़ी।
"एक बात कहूँ रौशन मियाँ, आप सचमुच माइक्रोवेव मत लेना,अलबत्ता मैं एक और ढूँढ़ रहा हूँ।"
"दो का क्या कीजिएगा?"
"अभी ढूँढ़ रहा हूँ, मिला नहीं है मुझे वो मॉडल...कोई ऐसा मॉडल मिले जो साली ज़िंदगी को भी और रिश्तों को भी गरम कर सके...ताज़ा तो होंगे नहीं... ताज़ेपन का एहसास तो होगा...बासी खाना भी तो खा ही लेते हैं उस खुशफ़हमी से...क्यों है ना?"
इस बार भी उन्होंने ठहाका लगाया पर साथ कोई नहीं हँसा।पुष्कर अपने पिता को देखता रहा, रौशन ने धीरे-से खिसकर एकता का कन्धा छुआ और मनोहर साहब हँसते-हँसते चश्मा उतारकर आँखें साफ करने लगे...
© भारती बब्बर
सरल और सुंदर कहानी l हरेंद्र सिंह रावत
ReplyDeleteबहुत आभार🙏
Deleteसंबंधों के जटिल ताने-बानों का अति सुंदर चित्रण -बिमल
ReplyDeleteबहुत आभार🙏
ReplyDeleteकहानी नहीं, एहसास है। बहुत सुंदर प्रस्तुति। ✨
ReplyDeleteबहुत आभार आपका🙏
Deleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteबहुत आभार आपका 🙏परिचय भी मिल जाता तो ...
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