सुबह की भूमिका

 सुबह चाय की चुस्कियों के साथ खिड़की के पास बैठकर बाहर झाँकने का अपना ही आनन्द है । मुझे लगता है सुबह के समय जीवन का वास्तविक स्वरूप उजागर होता है , अपने भीतर भी और अपने आसपास भी । दिनचर्या की शुरुआत होती है इसलिए एक उमंग तो होती ही है , हर सुबह नये दिन की नयी भूमिका लिखी जाती है । पर किसी जीवन की हर सुबह एक जैसी हो तो ? हर रोज एक नियम, एक ही लकीर , भूमिका भी वही और दिन का उपसंहार भी वही ... बीच में संघर्ष की कहानी , कभी छोटी कभी बड़ी । ऐसी बहुत जीवनियाँ हैं हमारे आसपास ।

सामने की चार मंज़िला इमारत में सुबह-सुबह बहुत चहल-पहल रहती है । निचली मंज़िल पर मैकडॉनल्ड्स के पारदर्शी द्वार पर " ओपन " की तख़्ती लटकाकर एक सरीखी पोशाक वाले लड़के-लड़कियों के चेहरे खिले हुए हैं । तथाकथित आधुनिक फ़ैशन के फटेहाल पश्चिमी परिधान में खिलखिलाते युवाओं का जमघट शुरू हो चुका है । बगल वाले प्रॉपर्टी डीलर ने भी दुकान चमका ली है । चमक उसके चेहरे पर भी है जो फोन पर उसकी ऊँची आवाज़ से बिखर रही है । आर्चीज़ की दुकान का शटर उठते ही शोकेस महँगी वस्तुओं की चमक से जगमगा उठा । बुद्ध की हज़ारों की क़ीमत वाली मूर्तियाँ , सेरेमिक के चमकदार विदेशी पुतले , बेशक़ीमती सजावटी सामान , स्टफ्ड टॉयज और भी बहुत कुछ ।

उसी इमारत की सीढ़ियों से एक आकृति बाहर आयी । साड़ी की चुन्नटें उठाकर खोंसी हुई । उस उठान से उजागर होते , उम्र और संघर्षों से जूझते दो घुटने ... टेढ़े होकर एक दूसरे से परस्पर दूरी बनाये । बालों के गंगा-जमुनी संगम में गंगा की धवलता का वर्चस्व , हाथों में बाल्टी ,  झाड़ू और पोछा । चाल में नौका का डोलन कमर और पीठ की पीड़ा बता रहा है । स्पष्ट है कि सरकारी नौकरी से निवृत्ति की उम्र बहुत पीछे छूट गयी है । क्या भूमिका लिखी होगी ज़िंदगी की इस सुबह ने आज के पन्ने पर ? हर रोज दिन-प्रतिदिन उन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति .... मजबूरी ... संघर्ष ... और उपसंहार से पहले एक जीवट व्यक्तित्त्व का चरित्र चित्रण ... उम्र के इस पड़ाव पर भी आर्थिक संघर्ष ।

एक और भूमिका ... चढ़ते सूरज के साथ बढ़ते कदम । दिन के आह्वान के समय ही चाल में शिथिलता संघर्ष की लंबी गाथा कह रही है । मैला कुर्ता-पायजामा , कन्धे पर पॉलिश और मरम्मत के साजो सामान से भरा बक्सा । दूसरे कन्धे पर लोहे का भारी तिकोना यन्त्र । दोनों कन्धे यूँ झुके हुए मानो एक दूसरे से भारीपन की स्पर्धा में हो । एक हाथ में विविध रँगों का चर्म-संग्रह ।धूल-धूसरित पैरों में बरसों से घिसी चप्पलें .... जूते चप्पल बनाने के शिल्प में पारंगत शिल्पकार के चरण स्वयं किसी आरामदायक सतह के प्यासे हों ।

कई सुबहें अपनी भूमिका में उपसंहार के मौन शब्द लिये आती हैं .....


© भारती बब्बर


Comments

  1. Such a pleasant read. Beautiful

    ReplyDelete
  2. अति सुन्दर प्रस्तुति, भारती।। सही में, सुबह की चाय की चुस्कियां, विभिन्न गतिविधियां और मौन चिंतन।।।

    ReplyDelete
  3. Bhut Sundar 👏👏👏👏👏

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

चींटियाँ

स्मृतियों के शँख

मेरी आई