मुझे जाने दो


कल्पना कीजिये कि दुनिया में कोई ऐसा हो जो आपको स्वयं से अधिक चाहता है, जिसके लिए उसका अस्तित्त्व ही आपसे है।आप उसकी दिनचर्या और जीवन के केन्द्रबिन्दु हैं।वह आपके दुःख में दुःखी है और आपके सुख में सुखी।आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा, आपकी आर्थिक स्थिति, आपका शारीरिक सौष्ठव, आपकी सुंदरता, इन सबसे उसे कोई मतलब नहीं...न ही आपके रंग,जात या धर्म से।उसे केवल आपका साथ चाहिये, फिर चाहे आप महल में रहें, झोपड़ी में या सड़क पर...पकवान खिलायें या सूखी रोटी...वह सदैव आपके साथ है, बिना शर्त !

यह कल्पना उसी क्षण वास्तविकता में बदल सकती है जब आप अपने लिये एक पालतू कुत्ता ले आयें।कुत्ता पालने की इच्छा का उल्लेख करते ही सामने वाला व्यक्ति कुत्ता पालने से होने वाली असुविधाओं की सूची प्रस्तुत कर देगा, यानि उसे सुबह शाम घुमाना पड़ेगा चाहे आपकी तबियत करे या ना करे...घर पर हर समय किसी को रहना ही पड़ेगा...कहीं यात्रा पर जाना पड़े तो उनकी वजह से कार्यक्रम रद्द तक करना पड़ सकता है...और सबसे बड़ा तर्क कि दुनिया में मोह माया के झमेले पहले क्या कम हैं जो जानबूझकर मोह पालें ! पर इन तथाकथित कठिनाइयों की सूची लम्बी है या उपरोक्त विशेषताओं की...

उसका रंग तले हुए काजू सरीखा था, कहीं हलका तो कहीं गहरा भूरा।यह महज संयोग ही था कि उसका नाम भी वही था - काजू ,जो उसे उसके घर आने से पहले ही मिल गया था,उसे देखने या उसके होने की जानकारी मिलने से भी पहले।तब मेरी पाँच वर्ष की बिटिया यही कहा करती कि हमारे घर काजू आने वाला है।वह आया भी उसकी ज़िद से ही था।दरअसल होश सम्भालने के पहले से उसने अपने आसपास पॉमी को पाया था।हमारे जीवन में वात्सल्य और ममता लाने का श्रेय पॉमी को ही जाता है।इस भाव विशेष से अनभिज्ञ लोगों को यह बात हास्यास्पद लग सकती है लेकिन वास्तव में माँ बनने से पहले मेरा परिचय ' पॉमी की मम्मी ' और पॉमी का परिचय मेरे ' चौपाये बच्चे ' की तरह होता था।साढ़े छह साल की अल्पायु में वह हमें छोड़ गया।बिटिया तब ढाई साल की ही थी इसलिए किसी नये चौपाये को लाने का विचार नहीं किया।लेकिन बिटिया का मन पॉमी के बिना न लगता और उसके हठ के चलते काजू के आगमन का सुखद संयोग बन गया।

जुलाई की एक उमस भरी शाम को ठंडी हवा के झोंके की तरह वह आया।उसे लेकर आये व्यक्ति ने जादूगर की तरह अपनी चौड़ी बन्द हथेली को मेज़ पर खोला और वह हमारे सामने था...मुश्किल से चार इंच की काँपती हुई नन्ही-सी काया नये परिवेश को चीन्हने के प्रयास में टुकुर-टुकुर ताक रही थी।वह जर्मन डैशंड प्रजाति का पिल्ला था।

" थोड़ा घबराया हुआ है जी,पटियाला से मोटरसाइकिल पर आ रहा है ना, हवा लगी है तेज," उसे  लाने वाले व्यक्ति ने बताया तो हम अवाक रह गये।वह व्यक्ति उस नन्हीं जान को हथेली में पकड़कर पटियाला से चण्डीगढ़ मोटरसाइकिल पर लाया था...!चौबीस दिन के उस नन्हे शिशु के लिए माँ के वियोग का संत्रास क्या कम रहा होगा जो धड़धड़ाती मोटरसाइकिल पर हवा के थपेड़ों ने कसर पूरी कर दी।उसकी कल्पना से ही हमारा जी कसमसाया...मेरी छोटी बहन ने उसे उठाकर अपनी गोद में रखकर सहलाया तो उसकी सहमी हुई काया कुछ सम्भली।बहन ने दुलारते हुए उसकी रेकी की तो सहज होकर निवृत्त होते हुए उसकी भयनिवृत्ति भी हो गयी।किंतु अपनी पहली यात्रा की धड़धड़ाहट की छाप उसके ह्रदय पर ऐसी पड़ी कि बड़े होने के बाद भी मोटरसाइकिल की आवाज़ उसे डरा देती और वह हमारी गोद में सिमट जाता।

उसके लिए हम सुंदर-सा बिछौना लेकर आये लेकिन नन्हें काजू के लिए वह बहुत ऊँचा और विशाल था।हमनें उसे उठाकर बिछौने पर लिटाया तो उसकी नन्ही देह में विशाल व्यूह में खो जाने की-सी कसमसाहट हुई।हमनें टाइम-पीस को चादर में लपेटकर उसके पास रख दिया ताकि उसकी टिकटिक से उसे माँ की धड़कन की भ्रामक अनुभूति हो...लेकिन उस स्वर में माँ की ऊष्मा कहाँ से आती ! फलतः पहली रात जो वह मुझसे सटकर सोया तो कभी विलग हुआ ही नहीं।काजू के थोड़ा बड़ा होने पर वह बिछौना उसका  क्रीड़ास्थल बन गया।अपनी नव-अर्जित शक्ति के प्रदर्शन में उस बिछौने को झिंझोड़कर उसके क्षत विक्षत अंश अंत्येष्टि स्वरूप घर भर में बिखेर दिये।

उसके साल भर के होने से पहले बहन के विवाह का सुखद संयोग बन गया जिसके लिए दिल्ली जाना था।किसी ने सुझाया कि काजू को रखने के लिए हॉस्टल की सुविधा है जहाँ सभी श्वान-शिशु मज़े में रहते हैं।लोग मजबूरी में ही क्यों न हो अपने छोटे बच्चों को हॉस्टल में डाल देते हैं, लेकिन मैं तो उस तथाकथित सुविधा को देखने के बाद काजू को वहाँ छोड़कर जाने का साहस ही न कर सकी।हमारे घर पर काम करने वाली सहायिका को भी उससे मोह हो गया था,वह काजू के लिए दिल्ली तक चलने को तैयार हो गयी।इस तरह काजू अपनी मौसी के विवाह के अलबम का भाग बन सका।मौसी उसके लिए रोज कॉफी-बाइट लेकर आती थी।उसके ब्याह के बाद भी नियत समय पर काजू दरवाज़े से बाहर ताकते हुए उसकी बाट जोहता।

एक बार शिमला जाते हुए विवशता में तीन दिन के लिए हमें काजू को उसके डॉक्टर के ही पास छोड़कर जाना पड़ा।शिमला में किसी भी कुत्ते को देखकर उसकी याद आ जाती।जब लौटते हुए हम उसे लेने गये तब शायद उसे अंदर के कमरे में रखा हुआ था।उसका नाम पुकारने के बावजूद जब कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो मैं अंदर गयी।वह एक कोने में बंधा हुआ था और उसकी आतुर आँखें आवाज़ की दिशा में टिकी हुई थी।मुझे देखकर भी उसके गले से स्वर नहीं निकला मानो उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हम उसे वास्तव में लेने आ गये हैं ! मेरे दिल में यह सोचकर ही हूक उठी कि मेरे बच्चे ने तीन दिन इसी आशंका में व्याकुल होकर काटे होंगे कि कहीं हमनें उसे छोड़ तो नहीं दिया ! मेरे छूते ही उसकी खुशी का पारावार नहीं रहा और उसे गोद में संभालना ही कठिन हो गया।उसी पल यह तय हो गया कि अब के बाद उसे कभी छोड़कर नहीं जाऊँगी।

चंडीगढ़ छोड़कर मुम्बई जाने की बारी आयी तो तलाश हुई उस विमान सेवा की जिसमें पालतू को ले जाने की सुविधा उपलब्ध हो।दुर्भाग्यवश हमारा देश इस मामले में पश्चिमी देशों से पिछड़ा हुआ है।किसी तरह एक विमान सेवा मिली।पता चला कि उसकी गिनती सामान में होगी इसलिये उसकी टिकट नहीं लगेगी बल्कि पिंजरे समेत तोलकर कुल वज़न का किराया लगेगा, और उसे साथ न बिठाकर विमान में सामान के साथ रखा जायेगा।यानि एक जीते-जागते प्राणी और आपके थैलों में कोई भेद नहीं ! हमें आश्वस्त किया गया कि सामान कक्ष में उसके लिए अतिरिक्त ऑक्सिजन की सुविधा होगी।विमान के शोर-शराबे और उस परिवेश से उसे बचाने के लिए काजू को नीम-बेहोशी का इंजेक्शन दिया जाना अनिवार्य होगा।विचक्षण स्थिति थी,लेकिन कोई उपाय भी नहीं।विदेशों में कितनी सुखद व्यवस्था है, आपका पालतू आपके पारिवारिक सदस्य की तरह बस,रेलगाड़ी या विमान में आपके साथ यात्रा कर सकता है।अलबत्ता पॉमी को मैंने अपने साथ राजकीय परिवहन की बसों में खूब सैर करवायी है।तब एक बच्चे की तरह आधी टिकट लेकर कुत्तों को राजकीय परिवहन की बसों में ले जाने की अनुमति थी।उसीके चलते पॉमी मेरे साथ रानीखेत,नैनीताल,शिमला,हरिद्वार,ऋषिकेश,मसूरी,डलहौजी,चंबा,दिल्ली आदि जगह घूम आया था।लेकिन काजू के समय तक यह सुविधा हटा दी गयी।

मुंबई पहुँचने तक यह धुकधुकी लगी रही कि जाने बेचारे पर क्या गुज़र रही होगी।मुंबई विमान तल पर अपना सामान लेने के लिए प्रतीक्षारत यात्रियों ने जब कन्वेयर बेल्ट पर सबसे पहले जालीदार पिंजरे में बैठे नन्हे काजू को आते देखा तो बच्चे ही क्या बड़े भी खुशी और दुलार से ताली बजाने लगे।स्वागत की उसी ऊष्मा एवं ऊर्जा ने नीम-बेहोशी से काजू की अर्द्ध-उन्मीलित आँखों को यकायक पूरा खोल दिया ! उस पहले अनुभव के बाद काजू को और दो बार  विमान यात्रा करनी पड़ी,लेकिन तब तक हम दोनों एक प्रकार से आश्वस्त हो गये थे।

जब काजू लगभग साल भर का था तब एक दिन अचानक उसका शरीर ऐंठ गया।उसकी असहाय आँखों में एक पीड़ादायक मूक आग्रह था।डॉक्टर के अनुसार उसकी यह समस्या अनुवांशिक थी।उस परिस्थिति में उसे स्नेह और सान्त्वना से सहलाना ही उसे पुनः सामान्य स्थिति में लौटाता था।

काजू एक प्रकार से हर बात के लिए मुझ पर निर्भर था।अपनी कजरारी आँखों से वह क्षण भर भी मुझे एकटक देखता तो मैं उसका आशय समझ जाती।घरवाले हैरानी से पूछते कि मैं उसका आग्रह कैसे समझ जाती हूँ ! यह मैं भी नहीं बता सकती लेकिन हर बार मैं जान जाती थी कि कब बाहर जाने का आग्रह है और कब कुछ खाने का।धीरे-धीरे जाने कैसे काजू ने स्वयं ही घर के शौचालय में निवृत्त होना सीख लिया।वह अपना काम कर चुकने के बाद मेरे पास आकर मुझे देखता और मैं तत्काल समझकर उसकी और शौचालय की सफाई कर देती।घर पर मैं और काजू ही रहते इसलिए हमारा अधिकांश समय एक दूसरे के साथ बीतता। यह तो हर कोई समझ सकता था कि उसका सोना-जागना, खाना-पीना, घूमना-फिरना, नहाना-धोना सबकुछ मुझपर निर्भर है लेकिन यह समझने में मुझे भी देर लगी कि मेरा क्या-क्या काजू पर निर्भर है...उसका गेंद के साथ खेलना, जब मैं सब्ज़ी काटने बैठूँ तो साथ बैठकर गाजर, मटर या गोभी खाना...आ गया मिल्खा...कहते ही वह घर भर में इतनी फ़ुर्ती से दौड़ने लगता मानों सच में मिल्खा सिंह की आत्मा उसमें आ गयी हो ! फिर उस मैराथन की इतिश्री पानी का बर्तन खाली करके सुस्ताने पर होती।

उसके जीवन में मेरा स्थान यह था कि मेरे घर से बाहर जाने पर वह बैठकर खिड़की से झाँकता रहता, न कुछ खाता न पीता।शेष सदस्यों का घर से जाना-आना नियम था लेकिन मेरा घर से निकलना उसे असुरक्षित कर देता।उस निःस्वार्थ आसक्ति का अनुभव लिया जा सकता है लेकिन शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

मानव की आयु के सात वर्ष कुत्तों की आयु का औसतन एक वर्ष होता है।काजू के आचरण में आयु के साथ-साथ गाम्भीर्य आने लगा,किंतु उसके प्रति हमारे आचरण पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।वह बेशक अब घर की चीज़ें नहीं कुतरता या न अकारण उछलता लेकिन हमारे लिए नन्हा शिशु ही बना रहा।उसकी त्वचा का रंग बढ़ती उम्र के साथ फीका पड़ने लगा,आँखें भीगी-सी रहने लगी,मिल्खा की तरह दौड़ना कम हो गया।फिर एक दिन वह यकायक शिथिल-सा हो गया।कुत्तों के व्यवहार में आकस्मिक बदलाव उनकी अस्वस्थता का पहला संकेत है ,यह जानते हुए मैं उसे तत्काल डॉक्टर के पास ले गयी।वह तेरह फरवरी का दिन था...काजू को दिल का दौरा पड़ा था।उसने खाना-पीना छोड़ दिया।उसकी निरीह आँखें मुझे देखती रहती और मैं उसे सहलाती रहती।उस रात उसने बेचैनी से घर का चक्कर लगाया फिर मेरी गोद में चढ़कर बैठ गया।वह बिस्तर पर सोने वाली अपनी नियत जगह पर चढ़ने की कोशिश करने लगा।उसे उठाकर मैंने वहाँ बिठा दिया।कुछ देर टुकुर टुकुर ताकने के बाद अचानक एक हूक के साथ वह लेट गया और आँखें मूँद ली...उसकी नन्हीं देह निष्प्राण हो गयी...काजू चला गया...चौदह तारीख चढ़ चुकी थी।वह दिन दुनिया भर के लोग अपने चाहने वालों के लिए वेलेंटाइन-डे के तौर पर मनाते हैं, मुझे चाहने वाला मुझे उसी दिन छोड़ गया...

काजू के जाने के बाद मुझे उसकी कमी बेहद खलने लगी।जब घर पर अकेली होती तब उसके साथ बतियाना याद आता,सब्ज़ी काटते हुए उसका गाजर के लिए हठ करना याद आता तो आँखें भीग जाती।सबसे अधिक कष्टदायक था रात सोते समय उसे अपने आसपास न पाना।जुलाई की उस उमस भरी रात से फरवरी की इस शीतल रात तक लगभग ग्यारह वर्ष वह मेरे पास ही सोया था।कभी स्वप्न में उसे देखती, कभी नींद से अचानक जाग जाती...उसकी स्मृति मुझे उद्विग्न करने लगी।एक स्वप्न मुझे बार-बार आता कि काजू खिड़की के पास बैठा बाहर ताक रहा है।मैं यही समझती रही कि यह उसकी आदत थी इसीलिए मैं स्वप्न में भी वही देखती हूँ।फिर एक रात देखा कि काजू खिड़की के पास बैठा निर्निमेष बाहर देख रहा है...बाहर भारी बर्फ़बारी हो रही है...मेरे बार-बार पुकारने पर भी वह प्रतिक्रिया नहीं दे रहा...धीरे-धीरे बाहर की बर्फ़ की परत काजू के ऊपर चढ़ने लगी और वह वहीं जमने लगा...उसकी भूरी देह पर हल्की सफ़ेदी आने लगी पर वह अंदर बैठने के लिए विवश है जबकि मुक्ति के लिए उसकी आँखें लालायित हैं...उस बेचैनी ने मुझे सोने नहीं दिया।मेरे पति मुझसे अक्सर कहते रहते कि काजू को याद करते हुए मैं तो परेशान हो ही रही हूँ, उसकी आत्मा की मुक्ति में भी बाधा डाल रही हूँ।उस रात के सपने से मुझे भी यह अनुभूति हुई मानो काजू कह रहा है...मुझे जाने दो...

उस दिन मैंने अपनी प्रार्थना में ईश्वर से काजू की दिवंगत आत्मा के लिए शांति की कामना के साथ उसे अपने सांसारिक मोह के बंधन से ऋणमुक्त करने का आग्रह भी किया।काजू से मैंने सीख लिया कि प्रेम का वास्तविक अर्थ बन्धन नहीं मुक्त करने में है...



©  भारती बब्बर










Comments

  1. बहुत मार्मिक l शब्दों का चयन और छोटी छोटी घटनाओं का विवरण बहुत सुन्दर l
    उत्कृष्ट लेखन l बधाई

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  2. बहुत आभार हरेंद्र 🙏

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  3. भारती जी, हमने देखा है काजू को I
    बहोत ही प्यारासा टँकर जैसा लंबा काजू ऑर उसकी वो काली प्यारी आँखे I
    आजकी यह कथा पढने से उसकी यादें ताजा हो गई I
    धन्यवाद !

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    1. बहुत आभार भावना 🙏

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  4. Di, bahut hi marmik aur utkrisht rachna hai..aisa lag raha hai jaise hum ne swayam Kaju ke jeevan ko dekha hai.
    (Neelam Khatri)

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    1. बहुत आभार नीलम 🙏🏼

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  5. Aj tumne kaju ki yaad dila de kuch vakt hamne bhi uske sath bitaya ha tum jo bhi likhti ho dil ko chhoo jata ha god bless you

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    1. हार्दिक आभार आपका 🙏

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  6. बहुत ही मार्मिक लिखा है।पढ़कर काजू की बहुत याद आई।वो कैसे मेरे नाम से भोंकता था कॉफी बाइट खाने के लिए। बहुत प्यारा था।

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    1. यही तो विशेषता होती है इनकी, एक बार जिनके हुए, हमेशा के लिए हो गये! बहुत आभार 🙏

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  7. रोचक और पठनीय। संयोग से श्वान पालने वाली प्रजाति पर मेरा एक लेख है - डाक्टर साहिबा के डाॅगीज बीमार हैं।इसी नाम से व्यंग्य संग्रह भी है। हमारे देश के कई परिवार अपने डाॅगीज के कारण ही रेल की फर्स्ट क्लास की यात्रा कर पाते हैं।

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    1. बहुत आभार सूरज जी 🙏🏼 आपकी रचना भी पढ़ चुकी हूँ।मेरे लिए यह बहुत संवेदनशील विषय है।

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