किसी दिन
" मैं आ गया अम्मी..." इसी आवाज़ के अहसास के साथ सुबह रईसा की आँख खुली।आज फिर वह उसके सपने में आया था।उसे लगा हल्की-सी मुस्कान से उसके होंठ फैले हुए हैं।उसने आईना नहीं देखा, पर उसे लगा जैसे होंठों के किनारे थोड़े से खिसक गये हैं।ऐसा महसूस होते ही पल भर में होंठ सिकुड़कर वापस अपनी जगह पर आ गये।उनके सिकुड़ते ही लगा जैसे वे दोबारा सीलबंद हो गये हों।
वह जब भी सपने में उसे देखती है, उसे ऐसा ही महसूस होता है।उसके वापस लौट आने की उम्मीद फिर बंध जाती है।उसकी वापसी के ख़याल से ही, उम्र से ढल चुकी छाती में वह दोबारा कसाव महसूस करती।उसे लगता है अगर सचमुच उसके सामने आ गया तो उसकी सूखी छाती से दोबारा दूध की धार बह निकलेगी।ऐसा सोचते ही बरबस उसका हाथ छाती पर पहुँच जाता।ऐसा जाने कब से हो रहा है...उसे याद भी नहीं।पहले,जब तक वह था,तारीख जानने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी।उसका चेहरा देखकर सवेरा होता और उसके काम से लौटते ही वह समझ जाती, शाम हो गयी।वक़्त का पहिया जैसे उसी के इर्दगिर्द घूमता था।अब, जब वह नहीं है तो समय जानकर भी क्या करना है उसे!न जाने तो ही बेहतर।एक-एक दिन,सुबह-शाम का हिसाब रखती तो...घड़ियों का हिसाब उसका मन जानता है...अब तो वह उसकी गिनती भी भूल गयी है।
रईसा ने उठकर खिड़की के आगे खड़ी चारपाई खिसकायी और खिड़की खोल दी।खिड़की खोलते ही दरवाज़े की लकड़ी का एक गला हुआ टुकड़ा उसके पैरों के पास गिर गया।गुज़रते वक़्त का हिसाब तो ये बिखरते टुकड़े भी दे जाते हैं उसे।साल दर साल गिरती बर्फ़ और बारिश से भीग कर जर्जर होते खिड़की-दरवाज़ों के टुकड़े गिरकर बीतते वक़्त का अहसास कराते रहते हैं।खिड़की की सलाखों पर ज़ंग के निशान उभर आये हैं जिन्हें वह छूती भी नहीं।बर्फ़ से वे नम और ठंडी जान पड़ती हैं।ज़ंग के खुरदरेपन के साथ उसकी ठंडी छुअन उसे घिनौनी लगती है।किसी दिन खिड़की खोलते ही वे सलाखें भी उसपर गिर पड़ेंगी।
खिड़की खुलने पर धूप का एक टुकड़ा अंधेरे कमरे में कूद गया।हवा थोड़ी सर्द महसूस हुई।दूर पहाड़ियों पर बर्फ़ गिर गयी हो शायद।कुछेक दिनों में यहाँ भी बर्फ़ गिर जायेगी।तब रईसा कई महीने यह खिड़की भी नहीं खोलेगी।खिड़की के आगे चारपाई रखकर उसपर पुराना गद्दा टाँग देगी ताकि बर्फ़ानी हवा का अहसास भी रिसकर अंदर न आ पाये।तब तो उसके घर में अंधेरा ही रहता है।रौशनी करनी भी किसके लिए है उसने!घर के बाकी कमरों में ताले पड़े हैं।उनकी चाभियाँ कहाँ पड़ी हैं अब तो यह भी ठीक-ठीक याद नहीं।ऊपर वाली मंज़िल पर चढ़े बरसों हो गये।उसके कमरे में जाने की हिम्मत वह दोबारा जुटा नहीं पायी।कई बार ख़याल आया कि सीलन और सर्दी से कमरे में घुटन हो चुकी होगी।बू आने लग पड़ी होगी उसके बिस्तर और खूँटी पर टँगे कपड़ों से।कौन से धुले हैं, कौन से नहीं ख़ुदा जाने!बिस्तर पर बिछी चादर पर एक सिलवट भी नहीं होगी।उसे बिस्तर पर तन के बिछी चादर पसंद थी।उस दिन उसके जाने के बाद उसने धुली चादर खींच-खींचकर तानकर बिछायी थी।सारा कमरा झाड़-पोंछकर वह नीचे चली आयी थी।दोबारा उसने वो ज़ीने नहीं चढ़े।शायद हफ़्ते भर बाद फ़रज़ाना ने ताला लगाकर चाभी उसे पकड़ा दी थी।
दुमंज़िला मकान की यह रसोई ही अब उसका घर है।वह यहीं खाती है, सोती है और नमाज़ भी यहीं पढ़ लेती है। फ़रज़ाना इसे उसकी दरगाह कहती है, क्योंकि रसोई की दीवारें किसी दरगाह की सी नीले रंग से पुती हुई हैं।
"कभी अपनी दरगाह से बाहर भी निकला कर...या वहीं दफन होना है?" कहकर वह रईसा को टोकती रहती है।
पहले इस घर में कितनी रौनक थी!कहने को तो रईसा और वो,दो ही जन रहे हैं हमेशा।लेकिन उसके दोस्तों के आने-जाने से घर में रौनक लगी रहती थी।जाने क्यों उसके जाने के बाद उसका कोई दोस्त भी कभी उसकी पूछताछ करने नहीं आया।पहले कोई न भी हो तो वह अकेला काफी था रौनक के लिए।उसकी बातें, उसकी ख़ामोशी, उसकी चहलकदमी, उसकी आहट...उसका मौजूद रहना ही काफी था।वह ऊपर कमरे में होता तो उसके पैरों की आहट लकड़ी के फ़र्श से नीचे रईसा सुनती रहती।उसे तसल्ली रहती कि वह उसके आसपास है।
उसका जन्म भी कितनी मुसीबतों में हुआ था।रईसा की उम्र ही क्या थी तब...शायद मुश्किल से अठारह या उन्नीस।खुद की उम्र के बारे में रईसा को बस इतना पता है कि उसकी पैदाइश के वक़्त मुल्क़ का बँटवारा हुआ था।कश्मीर में जंग चल रही थी और पाकिस्तान ने मुज़फ़्फ़राबाद पर कब्ज़ा कर लिया था।वह न तो मुज़फ़्फ़राबाद गयी है और न पाकिस्तान।उसकी दुनिया यहीं श्रीनगर में ही रही है।अम्मी उसे पैदा करते ही अल्लाह को प्यारी हो गयी।उसकी एक ख़ाला ने ही उसे पाला था और जंग के दौरान ही उसे राजौरी से यहाँ ले आयी थी।उसके अब्बा उसे ख़ाला के सुपुर्द करके सरहद पार चले गये।तब से उसने अपने वालिद या उनकी तरफ के रिश्तेदार के बाबत कुछ नहीं सुना।ख़ाला बताती थी कि उस वक़्त श्रीनगर ही सबसे महफूज़ जगह थी।ख़ाला ने जी जान से उसे पाला और सोलह की होते-होते मंसूर अली नाम के शख़्स के साथ उसका निकाह कर दिया।
निकाह के बाद वह जिस घर में गयी वहाँ सारे आराम थे,सिर्फ घरवाले का सुख नहीं था।छह महीने बाद भी वह पेट से न हुई तो उसे ताने मिलने लगे।घर में सास-ससुर के अलावा दादी सास भी थी जो हर वक़्त जली-कटी सुनाती रहती।
"किस नामुराद को ले आया है...पूरे जहान में यही बद मिली थी तुझे?साल होने को आया,अभी तक बेऔलाद बैठी है!"
रईसा को कुछ समझ नहीं आता था।उसका शौहर भी उसपर हर तरह की ज़्यादती करता।रईसा ख़ाला को याद करके रोती रहती।करीब डेढ़-दो साल बाद मंसूर अली उसे ख़ाला के घर छोड़ गया और फिर कभी लेने नहीं आया।उसने पता नहीं क्या कहा था ख़ाला से,रईसा ने तलाक़ लफ़्ज़ सुना था लेकिन उसका मतलब बहुत बाद में समझ आया था।ख़ाला ने कुछ नहीं कहा, उसे कलेजे से लगाया और एक हिचकी ली थी।फिर "या ख़ुदाया, रहम करना मेरी बच्ची पर..." कहकर उसका माथा चूम लिया था।
ख़ुदा ने रहम ही तो किया था उसपर!ढाई महीने ही हुए थे उसे लौटे।एक दिन वह सुबह देर तक सोती रही।जब नींद खुली तो दिन चढ़ आया था।ख़ाला भी अभी तक सो रही थी।उसने सोचा कि आज वह उठायेगी ख़ाला को।उसने बकरियाँ खोल दी, मुर्गियों का बाड़ा खोला और कहवा बना लायी।
"ख़ाला उठो,सुबह हो गयी," कहती हुई वह पास बैठ गयी।ख़ाला सो रही थी, बहुत गहरी नींद में।उसने रज़ाई हटाकर उसे हिलाया।ख़ाला की गर्दन सिरहाने से लुढ़क गयी।तभी कहवे का कटोरा रईसा के हाथ से छूटकर गिर पड़ा।गर्म कहवा ख़ाला पर गिरा लेकिन ख़ाला ने उफ़ भी नहीं की,ना ही आँख खोली।रईसा दौड़कर पड़ोस वाली निख़त फूफी को बुला लायी।उसने ख़ाला को देखा और रज़ाई ओढ़ाकर छाती पीटने लगी।ख़ाला चली गयी...
उसके बाद रईसा ने भी चारपाई पकड़ ली।निख़त फूफी की बहू फ़रज़ाना उसके पास रहती।फूफी अपने मुँहबोले भाई हक़ीम उसमानुल्लाह को बुला लायी।रईसा भी उन्हें मामूजान कहकर बुलाती थी।उन्होंने रईसा की नब्ज़ पकड़ी,फिर फूफी की तरफ देखकर बोले," तीसरा महीना लगता है।"
फूफी ने हाथ दुआ में उठाये फिर आँखें पोंछती हुई बोली,
" या अल्लाह!तू कब क्या लेकर क्या दे दे...जिस बिला पर छोड़ गया वह तुझे, वो तो तू साथ लेकर आयी थी...तेरी ख़ाला को पता चल जाता तो यूँ ग़म में आँखें न मूँदती बेचारी..."
तब वह उसके पेट में था।
रईसा की दुनिया उस दिन बदल गयी।ख़ाला का ग़म भुलाने के लिए एक नया बहाना दे दिया मानो अल्लाह ने उसे।अपने भीतर वह जो कुछ महसूस करती उसका अहसास उसे गुदगुदाता रहता।फ़रज़ाना ने एक बार दोबारा निक़ाह कर लेने की बात भी की थी उससे।लेकिन निक़ाह का ख़याल भी उसे ग़लीज़ लगता।निक़ाह के नाम पर उसे मंसूर अली और उसके घरवाले याद आ जाते और वह तड़प जाती।उसने फैसला कर लिया था कि वह अपने बच्चे को पालेगी।ख़ाला का घर उसी का तो था, कोई वारिस तो था ही नहीं बेवा ख़ाला का।दुमंज़िला मकान महल था उसका और वह शहज़ादी!छह महीने बाद रईसा का बेटा हुआ।उस दिन उसे वाक़ई लगा था कि वह शहज़ादी है और अल्लाह ने उसे नायाब हीरे से नवाज़ा है।अल्लाह की बख्शीश ही था वह।रईसा ने उसका नाम रखा जहाँगीर अली।
बेटा होने के बाद रईसा की ज़िंदगी आसान हो गयी हो ऐसा नहीं था।लेकिन अब उसे जीने का मक़सद मिल गया।उसके लिए वह हर मुसीबत से जूझने के लिए तैयार थी।गुज़र-बसर के लिए उसने मकान का एक हिस्सा एक नेकदिल मौलवी साहब को किराये पर दे दिया।किराया आ जाता, उसका खर्च चल जाता।उसी मौलवी साहब ने जहाँगीर को लिखना-पढ़ना सिखाया और दीन का इल्म भी दिया।वे जहाँगीर को अपना चहेता शागिर्द मानते थे।हज पर जाने से पहले वे उसे मेवे की तिजारत करने वाले एक सेठ के यहाँ नौकरी भी दिला गये।
उन्हीं दिनों उसने कश्मीर के बदलते हालात की खबरें सुनी थी।उसके लिए ये बातें बेमानी थी।फिर भी उसने सुना था इसलिए जहाँगीर को पूछ लिया।
"तुम फ़िक्र क्यों करती हो अम्मी,उनसे क्या लेना?तुम घर में महफूज़ हो," उसने ऐसा कहकर उसे चुप कर दिया लेकिन रईसा का जी घबराता।वह अल्लाह से दुआ माँगकर शुक्र अदा करती कि उसे नेक बेटे की नियामत मिली है और वह इज़्ज़त से दो वक़्त की रोटी कमा रहा है।उसकी दुनिया उसपर शुरू होकर उसीपर ख़त्म होती है।वह तो उसकी दुल्हन लाने के ख़्वाब भी देखने लगी थी।लेकिन उसके जहाँगीर को कोई नूरजहाँ पसंद आती तो ना!वह तो दिन-रात नौकरी में ही लगा रहता।अपने मालिक का भी वह चहेता मुलाज़िम था।कभी-कभार वह उसे अलग रकम देकर और काम भी करवाया करता।जहाँगीर सारी कमाई अपनी अम्मी के सुपुर्द कर देता।रईसा को कभी उसकी फ़िक्र नहीं हुई।सारा दिन कहीं रहे,कुछ करे।तसल्ली थी कि रात का पर्दा गिरते ही वह उसके पास लौट आता है।
"अच्छा अम्मी," सुबह निकलते हुए हमेशा के लफ्ज़ थे उसके।
"ख़ैरियत से जल्दी लौट आना बेटा," जवाब में उसके भी हमेशा यही लफ्ज़ रहे हैं।दोनों को ही इन जुमलों की आदत पड़ गयी थी।
"मैं आ गया अम्मी," लौटकर दरवाज़े पर ही यह कहते हुए अंदर आता।बचपन से उसकी यह आदत थी,जो बड़े होने के बाद भी रही।
"अल्हम्दुलिल्लाह," कहकर वह शुकराना अदा किया करती।
शाम होने से पहले उसने धूप से चादरें निकाली और ऊपर जाकर उसके बिस्तर पर तानकर बिछायी।कमरा झाड़ा और नीचे आ गयी।जहाँगीर के लौटने से पहले वह खाना बना लेती।यूँ भी सर्दी धीरे-धीरे बढ़ रही थी।बर्फ़बारी में एक-दो महीने थे पर हवा सिहरा जाती थी।वह दहलीज़ पर बैठी थी।सूरज डूबकर वक़्त हो चला था।अंधेरा घिर गया था पर वह आया नहीं।रईसा काफी देर तक बैठी रही।शाम रात में तबदील हो गयी तो उसका जी घबराने लगा।उसने फ़रज़ाना की बेटी सबाह को आवाज़ लगायी तो वे दोनों ही आ गयी।रात देर तक उसके पास रहकर तसल्ली देते रहे कि कहीं काम में फँस गया होगा,आ जायेगा।लेकिन जब बहुत रात बीत गयी तो रईसा की धड़कनें बढ़ गयी।वह टकटकी लगाये दरवाज़े की तरफ देखती रही, पर उस दिन कोई आहट नहीं हुई।
अगले दिन दोपहर तक वह नहीं लौटा तो रईसा पास के पुलिस थाने पहुँच गयी।हवलदार ने न जाने उससे कितने और क्या-क्या सवाल पूछे।रईसा को कुछ पता होता तो बताती।उसे तो उसके सेठ का नाम भी नहीं पता।उसने हवलदार के पूछने पर जहाँगीर के दो-चार दोस्तों के नाम बता दिये, पता उनका भी नहीं जानती वह।उस दिन के बाद एक दोस्त भी नहीं आया जिससे कुछ जानकारी मिलती।
"पहले भी देर से आया कभी?" हवलदार ने पूछा।
"कभी नहीं,नेक बच्चा है मेरा..." उसने हाथ जोड़कर कहा।
"तसवीर है नेक बच्चे की?"
रईसा के पास एक जैसी दो तसवीरें थी उसकी।उनमें से एक पुलिस ने रख ली।नाम-पता लिख लिया।
"पता लगते ही ख़ुद बताने आयेंगे, आप तकलीफ़ न करना आने की।ख़ुद वापस पहुँच जाये तो हमें इत्तिला कर देना," हवलदार ने यह कहकर उसे वापस भेज दिया।
कोई नहीं आया...न हवलदार न जहाँगीर...हर लम्हा दिन में तबदील हुआ, दिन हफ़्ते में और हफ़्ते महीनों में।फ़रज़ाना का शौहर उसे बड़े अफसर के पास ले गया।उन्हें किसी ने अंदर जाने नहीं दिया।बहुत देर वे गेट पर ही खड़े रहे।तभी वहाँ अफसर की जीप रुकी।अफसर के उतरते ही अपने सिर का पूच उतारकर रईसा ने उनके कदमों में रख दिया।रहम करके अफसर उसे अंदर ले गया और उसकी पूरी कहानी सुनी।
"ठीक है बीबी, पूरी कोशिश करूँगा।पता मिलते ही बताते हैं।"
रईसा टूट गयी।उसका बेटा उसे यूँ अचानक छोड़कर लापता हो सकता है...उसे यक़ीन नहीं होता।उसकी ज़िंदगी ठहर गयी।उस दिन सूरज ढलने के बाद अंधेरा कभी छँटा ही नहीं...रईसा के घर की रौशनी बुझ गयी।सिर्फ़ रसोई में रौशनी का एक धब्बा टिमटिमाता,बाकी घर अंधेरे में डूबा रहता।उजाले से उसका कोई सरोकार नहीं रहा।
एक दिन उसने गत्ते के डिब्बे में पड़ी जहाँगीर की इकलौती तसवीर निकाली और लेकर लाल चौक पहुँच गयी।लोगों की आवाजाही हमेशा की तरह थी।उस चहल पहल में किसी को रईसा के होने और जहाँगीर के ना होने का अहसास तक नहीं हुआ।रईसा राह चलते लोगों को रोककर पूछती, शायद किसी ने कहीं देखा हो उसे...पर जिन लोगों का रईसा के ज़िंदा होने से सरोकार नहीं था,उन्हें जहाँगीर के लापता होने से क्या होता!
एक दिन शाम को फ़रज़ाना अपनी एक रिश्तेदार के साथ आयी।रईसा की कहानी जानकर कहने लगी," मेरी मामूनिजान का भतीजा भी एक दिन लापता हो गया था।कई महीने ग़ायब रहा।रपट भी लिखवायी थी पुलिस में।बहुत तहक़ीक़ात के बाद पता चला कि वह पुलिस की गोली से मारा गया था,थाने में उसकी लाश की तसवीर थी।"
रईसा का दिल बैठ गया।कहीं उसके बेटे को भी...न कटने वाली बेहिसाब रातों में वह सबसे लंबी रात थी।आज तक रईसा ने जहाँगीर का क़ब्र से नाता जोड़ा ही नहीं...दुनिया की कौन सी माँ जोड़ती होगी भला!उसे यक़ीन था कि वह अपने बेटे के कंधे पर ही क़ब्रगाह तक जायेगी...पर कहीं उससे पहले ही वह...
सवेरे उठते ही वह झेलम के पुल पर पहुँच गयी।एक बार ऊपर देखकर अल्लाह को याद किया और कूदने ही लगी थी कि किसी ने लपककर उसे पकड़ लिया।वही लोग दिलासा देकर उसे वापस घर तक छोड़ गये।वह मरना चाहती थी, लेकिन बच जाने से जैसे उसकी उम्मीद फिर जाग गयी।अल्लाह ने उसे इसीलिए बचाया है शायद,वह लौटकर ज़रूर आयेगा...वापस लौटकर वह न मिली उसे तो... ख़ुदा ने उसे बेटे की बख़्शीश दी तो क्या छिन जाने के लिए?परसों ही सुना उसने,कोई बता रहा था, एक लड़का बारह बरस बाद अचानक घर लौटा...रईसा के दिल में उम्मीद की लौ टिमटिमायी...क्या पता जहाँगीर भी उसी तरह यकायक सामने आ जाये...उसे भरोसा है अल्लाह पर।वह ख़ुद को खींचकर दरगाह तक ले जाती है, उसकी सलामती की दुआ में हाथ पसारती है।उसकी आँखें धुंधला गयी हैं।चश्मे से भी साफ़ नहीं देख पाती।रसोई की नीली दीवार से सटकर वह सारा दिन, और कभी-कभी पूरी रात जागकर बिता देती है।सन्नाटे में हल्की सी आहट भी उसे चौंका देती है।आँखें दहलीज़ पर टिकी रहती हैं और कान दरवाज़े पर।उसने एक बार गिनने की कोशिश की कि कितने साल हो गये पर गिन नहीं सकी।फिर अंदाज़ा लगाया कि फ़रज़ाना का पोता नदीम उसके जाने के बाद पैदा हुआ है।अब वह सोलह साल का हो चुका।
उसके मकान पर आहटें ठहरी हुई हैं, हवा थम गयी है।उसे सिर्फ़ उस घड़ी का इंतज़ार है जब दरवाज़े पर किसी दिन आवाज़ आयेगी,मैं आ गया अम्मी....
© भारती बब्बर
Heart touching story really Bharti di you are Awesome 👌👌🙏🙏
ReplyDeleteबहुत आभार प्रेमा 🙏🏼❣️
DeleteAll your characters come alive, Bharati. And what pictures you paint with words! Beautiful writing.
ReplyDeleteThanks for your appreciation Jaya 🙏🏼
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