नीलाम्बरा



श्वेता  ने वरुण के आने की सारी तैयारी कर ली।दो साल से ऊपर हो गया है मिले।बेशक फोन पर दोनों की अकसर बात हो जाती है लेकिन मिलने का अवसर कम ही निकाल पाते हैं।दोनों का जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि भोपाल और दिल्ली की दूरी उसी से पट गई लगती है जो दोनों ही तय नहीं कर पाते।वरुण डॉक्टर है तो उसे क्लीनिक से फुरसत नहीं मिल पाती होगी लेकिन वह तो बिना कुछ किये ही पति और बच्चों की व्यस्तता से व्यस्त रहती है।कहने को वे चचेरे भाई-बहन हैं लेकिन अपने-अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान होने के कारण दोनों का बचपन सगे भाई-बहन की तरह बीता।वरुण और उसकी पत्नी निशा ने सदा ही श्वेता को सगी बड़ी बहन का मान दिया है।तभी तो अपने बेटे की शादी का आमंत्रण पत्र देने दोनों विशेष रूप से आ रहे हैं।

दोपहर तक दोनों पहुँच गये।"

लगता है अब हमारी मुलाकात शादी ब्याह पर ही होगी!" वरुण उसके पैर छूने के लिए झुका तो श्वेता ने कहा।पिछली बार श्वेता के बेटे की शादी पर वे दोनों भोपाल आये थे।

"क्या करूँ दीदी,क्लीनिक से निकल ही नहीं पाता..."

"और इनके चक्कर में मैं भी नहीं निकल पाती।" निशा ने पैर छूते हुए बात पूरी की।

"अब बहू आ ही रही है, उसे घर सौंपकर निकल आना तुम।" उसने निशा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा।

"आजकल की बहू अपना करियर संभाले या घर,उसने तो कह देना है कि अपने बुड्ढे को आप ही सम्भालो!" निशा ने मज़ाक किया तो सारे खिलखिलाकर हँस दिये।

"क्या नाम है?"श्वेता ने पूछा।

"अवनी,इकोनॉमिक्स की लेक्चरर है...," निशा कहते हुए वरुण की ओर मुड़ी,"पहले दीदी और जीजाजी को कार्ड दो आप।"

वरुण ने मिठाई के डिब्बे के साथ कार्ड निकाला और दोनों हाथों से उसके पति को देकर कहा,"चार-पाँच दिन पहले ही आना होगा आपको, आप ही के बेटे की शादी है जीजाजी।"

"ज़रूर, क्यों नहीं!" उसके पति ने कार्ड लेते हुए कहा।

"रिंग सेरेमनी भी तीन दिन पहले ही करेंगे।चट मंगनी पट ब्याह!" निशा हँसते हुए बोली।

"दिखाओ तो," श्वेता ने कहा तो उसके पति ने कार्ड उसे पकड़ा दिया और वह खोलने लगी।

"अपनी पसंद से कर रहा है ना,कहाँ के हैं समधी?" उसके पति ने जानना चाहा।

"दिल्ली के ही हैं।सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं,नीलाम्बर माथुर..."

कार्ड निकालता श्वेता का हाथ एकबारगी काँप गया...क्या ठीक सुना उसने...नीलाम्बर...

"वाइफ भी वकील है,हाई कोर्ट में।बस दो बेटियाँ हैं,बड़ी बेटी लन्दन में रहती है,अवनी  पीएचडी कर रही है इको में," वरुण बता रहा था और वह उस नाम से हुई ऊहापोह से  जूझ रही थी।

"अच्छा है, पढ़े-लिखे लोग हैं,ज़ात-पात कौन देखता है आजकल," उसके पति ने कहा।

"सही कह रहे हैं आप,वो पुराने ज़माने की बातें रह गई हैं," वरुण बोला।

लेकिन कुछ बातें जो श्वेता उसी पुराने ज़माने में छोड़ आयी थी एक नाम के साथ ही जैसे उसके पास आकर खड़ी हो गयी और वह चाह कर भी उसे स्वयं से दूर छिटक नहीं पा रही।

लगभग सैंतीस साल पहले...तब उसके पिता राधावल्लभ शुक्ला का बनारस से चंडीगढ़ तबादला हुआ था।उसने एम ए करने के लिए पंजाब विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में दाखिला लिया।विभाग में बहुत सीमित सीटें होने के बावजूद उसे प्रवेश मिल गया क्योंकि पढ़ाई के मामले में वह हमेशा आगे रही है और बीए में उसे बहुत अच्छा स्थान मिला था।इकलौती बेटी होने के कारण माता-पिता की लाडली भी थी।विशेषतः शुक्ला जी, जिन्हें आदर से लोग पंडितजी बुलाते थे,बेटी पर जान छिड़कते थे।

विश्वविद्यालय का परिसर और वातावरण दोनों ही श्वेता को बहुत पसंद आया।बनारस की तुलना में यहाँ स्वच्छंदता थी।तब विश्वविद्यालय के लॉ ऑडिटोरियम में हर शनिवार हिंदी फिल्म दिखायी जाती थी जिसका इंतज़ार श्वेता और उसकी परम सखी दिव्या बेसब्री से करती।घर पर भी पता होता था कि शनिवार को वह फिल्म के बाद शाम को लौटती है।

उस शनिवार "पत्थर के सनम" दिखायी जानी थी।फिल्म के दौरान इतनी भीड़ थी कि वह और दिव्या बहुत मुश्किल से अंदर जा सके।दिव्या को किसी तरह एक सीट मिल गई।श्वेता की नज़र चारों तरफ कोई सीट खोज रही थी कि दिव्या के बगल वाली सीट से उठकर एक लड़के ने उसे बैठने के लिए कहा।अंधेरे में उसकी ओर देखे बिना बुदबुदाते हुए 'थैंक्यू' कहकर वह बैठ गई।

सोमवार को वह क्लास के बाद बाहर निकली तो एक लड़के ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए 'हैलो' कहा।श्वेता असमंजस में कुछ समझती कि दिव्या उसके कान में फुसफुसाई 'पत्थर के सनम '! वह पहचानती तब तक वह निकल गया।श्वेता ने मुड़कर देखा तो वह भी मुड़कर उसे देखते हुए मुस्कुराया।

वह लड़का लॉ डिपार्टमेंट के तीसरे वर्ष का छात्र नीलाम्बर माथुर था।उसके बाद वह कई बार दिखा।धीरे-धीरे पहचान हैलो से बढ़कर डिपार्टमेंट के बाहर पार्किंग में खड़े होकर बात करने और फिर स्टूडेंट्स सेंटर में एक साथ कॉफी पीने तक पहुँच गई।शुरू-शुरू में दिव्या साथ होती, बाद में नीलाम्बर के आते ही "आ गये तेरे पत्थर के सनम" कहकर वह उन्हें अकेला छोड़ कर चली जाती।नीलाम्बर के माता-पिता दिल्ली में रहते थे और वह हॉस्टल में।आकर्षक व्यक्तित्व के साथ-साथ वह पढ़ाई में बहुत तेज़ था इसलिए लड़कियों में ख़ासा लोकप्रिय भी।उसके साथ अपने इस सम्बंध पर बनारस के रूढ़िवादी ब्राह्मण  पिता की प्रतिक्रिया के प्रति आशंकित होते हुए भी श्वेता ने उस आकर्षण को रोकने का न प्रयास किया न ही वह रोक सकी।

सीनियर्स के विदाई समारोह का दिन था।श्वेता कार्यक्रम की सूत्रधार थी।सभी लड़कियाँ साड़ी पहने आयीं थी।श्वेता ने माँ की नीली बनारसी साड़ी पहनी।नीलाम्बर विभाग का न होते हुए भी केवल उसे देखने आया।कुछ पल उसे देखता रहा, फिर बोला,"तुम्हारा नाम श्वेता किसने रख दिया,नीला होना चाहिये था...पता भी है इस रँग में कितना निखर रही हो! सही में नीलाम्बरा लग रही हो !माँ ने इस तरह देख लिया तो कल ही बहू बना लेगी।"

वह लजा गई लेकिन अगले ही क्षण आशंका से बोली," और तुम्हें कोई दामाद बनाने को तैयार न हुआ तो?"

"घबराओ मत,एक बार मिलने तो दो,बनारस के पंडितों में होड़ लग जायेगी अपनी लड़की देने के लिए!"वह हँसते हुए बोला। 

एक शनिवार नीलाम्बर फिल्म की टिकट ले आया।श्वेता उसके साथ बाहर जाने में झिझक रही थी।

"शनिवार को फिल्म देखती तो हो यूनिवर्सिटी में!"कहकर नीलाम्बर ने उसे मना लिया।थिएटर में नीलाम्बर के साथ फिल्म देखने जाना एक रूमानी अनुभव तो था लेकिन श्वेता सारा समय सतर्क रही कि कोई परिचित मिल ही न जाये।जब यह प्रायः होने लगा तो श्वेता भी बेझिझक जाने लगी।

ऐसे ही एक बार वे "एक दूजे के लिए" फिल्म देखने गये।फिल्म देखकर  वे बाहर निकल रहे थे कि उसकी नज़र उनके पड़ोस में रहने वाली मिश्रा आंटी पर पड़ी।वह तभी समझ गयी कि अब माँ तक यह ख़बर पहुँच ही जायेगी और पहुँची भी।माँ को उसने सच बता दिया कि वे एक दूसरे को पसंद करते हैं।जब खबर पिताजी तक पहुँची तो मानो घर में भूचाल आ गया।पंडित जी कहलाने वाले शुक्ला जी यह बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि उनकी इकलौती बेटी विजातीय लड़के से प्रेम करे,विवाह का तो प्रश्न ही नहीं था।

"अंग्रेज़ी पढ़कर अंग्रेज़ समझने लगी अपने आप को?अपनी तो नहीं माँ बाप की,परिवार की मर्यादा का भी ध्यान नहीं रहा?" शायद पहली बार वे अपनी बेटी पर गरजे।

"लेकिन पिताजी,वो ब्राह्मण नहीं तो क्या,अच्छे घर का है..." जाने कैसे वह बोलने का साहस कर गयी।

"अंग्रेज़ी की चार किताबें पढ़कर ज़्यादा ही सयानी हो गई हो,और मुँहजोर भी!" उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।पत्नी ने उन्हें किसी तरह शांत किया लेकिन शुक्ला जी ने उसी दिन से उसके लिए सजातीय वर की तलाश शुरू कर दी।

उस घटना के बाद कई दिन तक घर में स्तब्धता छायी रही।शुक्ला जी चिंता और तनाव में चुप रहे और माँ-बेटी उनकी चुप्पी से डरे-सहमे।श्वेता कई दिन विश्वविद्यालय नहीं जा सकी।आखिर एक दिन दिव्या ही उसकी खोज-खबर लेने आ गयी।उससे बात नीलाम्बर तक भी पहुँच गई लेकिन आपसी बातचीत का कोई ज़रिया नहीं था।पिताजी के डर से माँ भी कठोर हो गई क्योंकि वे जानती थी कि पंडित जी का इस रिश्ते के लिए तैयार होना मुश्किल नहीं असम्भव है।माँ ने दिव्या को यही बात बता दी और दिव्या ने ही शायद नीलाम्बर को।स्वयं वह भी पिताजी की इच्छा के विरूद्ध कुछ करने की कल्पना नहीं कर सकती थी।उसका विश्वविद्यालय जाना अनियमित हो गया।जाती भी तो जल्द से जल्द लौट आती।नीलाम्बर से मिलने का वह साहस जुटा ही नहीं सकी।अपने जीवन के स्वप्नमय चित्रों को विवशता की आग में झोंककर श्वेता ने माता-पिता की इच्छा के आगे समर्पण कर दिया।छह महीने के भीतर उसका विवाह भोपाल के एक प्रतिष्ठित परिवार के शशांक त्रिपाठी से हो गया और एम ए की शेष पढ़ाई उसने पत्राचार से पूरी की।दिव्या से उसे पता चला कि नीलाम्बर ने लॉ में शीर्ष स्थान प्राप्त किया लेकिन उसके बाद उसका कुछ पता नहीं लगा और आज इतने सालों बाद...

अपने विवाहित जीवन में श्वेता को  कोई कमीं या शिकायत नहीं मिली।शशांक त्रिपाठी सुशिक्षित और सुलझे हुए व्यक्ति हैं।उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय रहा है।आज वह दो विवाहित बच्चों की माँ है।शशांक के साथ रहते हुए पिछले चौंतीस सालों में नीलाम्बर को श्वेता ने याद बेशक न किया हो लेकिन अपने पहले प्रणय के अनुभव को भूल गयी हो ऐसा भी नहीं।अब यही प्रश्न वह नीलाम्बर के संदर्भ में स्वयं से पूछ रही है, क्या उसे वह याद होगी या भूल गया होगा...  कहते हैं पहला प्यार कोई नहीं भूलता...उम्र के इस पड़ाव पर ऐसा द्वंद्व...वरुण की बहन की हैसियत से तो आमना-सामना होगा ही...कैसी दुविधा में डाल दिया ईश्वर! 

बरसों बाद उसे दिव्या की याद आयी।उस रिश्ते की  साक्षी वही रही है और उसने श्वेता की बात नीलाम्बर तक पहुँचाने की कोशिश भी की थी।लेकिन उस घटना के बाद श्वेता पर उसके माता-पिता का पहरा इतना बढ़ गया कि श्वेता और दिव्या आगे बढ़ने का साहस नहीं कर सके।आज उसके माता-पिता होते तो...शायद वह विवाह में जाने का साहस भी न कर पाती!अब जायेगी तो क्या होगा...उसी सवाल ने उसे फिर घेर लिया।वरुण के सामने तो उसने नीलाम्बर के नाम के साथ कोई परिचय प्रकट नहीं किया, लेकिन कहीं नीलाम्बर ने कर दिया तो...नहीं,वह भी नहीं कर सकता...पत्नी, बेटियाँ...उन सबके सामने नहीं कर सकेगा...क्या पता भूल ही चुका हो उसे,लड़के प्यार-व्यार को उतनी गम्भीरता से लेते भी नहीं जितनी लड़कियाँ लिया करती हैं...अपने प्रश्नों का उत्तर भी वह स्वयं देती रही।सारे शहर में वरुण के बेटे को भी यही लड़की मिलनी थी !

वरुण और निशा ने बार-बार आग्रह किया कि वे चार-पाँच दिन पहले पहुँच जायें।

"दीदी,निशा को आपने ही बताना-समझाना है,इसे कुछ नहीं पता," वरुण ने कहा।

"हमारे लिए तो आप ही बड़े हो दीदी," निशा ने उसका समर्थन करते हुए कहा।

नीलाम्बर के साथ पहली बार फिल्म देखने के लिए जाते समय जो अनुभूति हुई थी कुछ-कुछ वैसी ही उसे शादी में जाते समय होती रही।नीलाम्बर के साथ अपने सम्बन्ध किसी को पता न लग जाये, इसे लेकर उसे जितनी अकुलाहट अब हुई उतनी तो तब भी नहीं हुई जब वह उस रिश्ते में थी!सगाई की रस्म भी शादी से तीन दिन पहले ही हुई।श्वेता परिवार में सबसे बड़ी होने का दायित्त्व संभालते हुए भी अंदर ही अंदर किसी नवविवाहिता की तरह व्याकुल होती रही।दिव्या होती तो उस व्याकुलता को वह उसके साथ बाँट लेती ।

समारोह का इंतज़ाम एक बैंक्वेट हॉल में किया गया जहाँ दोनों पक्ष के लोग पहुँच गये।जब तक ये लोग पहुँचते वधू पक्ष के सदस्य पहुँचकर उनके स्वागत के लिए द्वार पर उपस्थित दिखे। रेशमी कुर्ते पायजामे में सर पर साफा बाँधे नीलाम्बर को वह दूर से ही पहचान गई।वह अपनी पत्नी के साथ आगे बढ़ा और तुरंत वरुण के गले लग गया।उसकी पत्नी का व्यक्तित्व भी आकर्षक लगा।वह निशा से मिलने के लिए आगे बढ़ी।नीलाम्बर को देखते ही श्वेता के सामने उसे हैलो कहकर गुज़रते लड़के की तसवीर कौंध गयी।कहीं आज भी उसने पहचान कर उसी अंदाज़ में हैलो कह दिया तो...

"माथुर साब,ये हमारी श्वेता दीदी और जीजाजी श्री शशांक त्रिपाठी,"तभी वरुण ने उनकी ओर संकेत करते हुए कहा। 

नीलाम्बर ने शशांक को भी गले लगाया और उसकी पत्नी ने

मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ दिये।उसकी पत्नी ने आगे बढ़कर श्वेता को गले से लगाया।नीलाम्बर ने श्वेता को देखकर हाथ जोड़े लेकिन श्वेता को उसकी आँखों में परिचय की कोई लकीर दिखाई नहीं दी।वह भी औपचारिक अभिवादन में थोड़ा झुक गई।पूरे समारोह में नीलाम्बर वधू के पिता की भूमिका तत्परता से निभाता रहा।श्वेता भी अपने पति के साथ वर पक्ष की मुखिया की तरह बैठी रही।

क्या सचमुच नीलाम्बर ने उसे नहीं पहचाना...सच ही है लड़के प्यार वगैरह को लेकर उतना गम्भीर नहीं होते...यूँ भी उन बातों को बीते अरसा हो चुका...इतने बरसों में स्वयं उसने कब याद किया है उन बातों को!इतने सालों बाद और इस उम्र में उन बातों का न महत्त्व रहा है ना मतलब।अच्छा ही हुआ जो नहीं पहचाना, श्वेता ने सोचा, लेकिन अगले ही पल यह खयाल आया कि क्या उसका नाम सुनकर भी उसे वह याद नहीं आयी?अगर बाद में उसे याद आ गया तो!श्वेता के चेहरे में कोई अधिक बदलाव नहीं आया है, बालों में थोड़ी सफेदी ज़रूर आ गई है।सफेद बालों ने नीलाम्बर को भी रौबदार बना दिया है।

विवाह वाले दिन भी दोनों आमने-सामने आये,औपचारिक अभिवादन किया,लेकिन परस्पर पहचान का सूत्र उस दिन भी नहीं मिला।श्वेता अब थोड़ी सहज हो गई, जिस क्षण के लिए वह चिंतित थी वह तो बीत ही गया।विवाह सम्पन्न हुआ और वधू घर आ गयी।

भोपाल लौटने से पहले निशा ने उसे बड़ी बहन के मान स्वरूप नेग दिया और 'बुआ जी' की चिट लगा एक उपहार ये कहते हुए दिया कि अवनी के मायके से बुआ का मान भी आया है।आकुलता, उत्साह और समाधान के कुछ मिश्रित भाव-संकुल से निपट कर श्वेता घर लौट आयी।   

"वरुण के समधी अच्छे लोग हैं," चाय पीते हुए शशांक ने कहा।

"हम्म ,"श्वेता ने समर्थन करते हुए इतना ही कहा।

"हसबंड-वाइफ दोनों पंजाब यूनिवर्सिटी के लॉ ग्रेजुएट हैं।"

"अच्छा!"सुनकर श्वेता को सचमुच हैरानी हुई।उसे याद आया कि निशा ने नीलाम्बर की पत्नी का नाम भावना बताया था लेकिन उस नाम से परिचय का आभास न तब हुआ था न अब...क्या वह भी उन दिनों वहीं पढ़ रही होगी...श्वेता जानना चाहते हुए भी जान नहीं सकी।वरुण से ही श्वेता का मिलना प्रायः नहीं हो पाता तो उसके समधियों से क्या ही होगा!जाने क्यों यह विचार उसे तसल्ली दे गया।

अनायास ही उसे नीलाम्बर के घर से आये उपहार देखने की उत्सुकता हुई।उपहार खोलते हुए उसका हाथ एकबारगी फिर काँपा,उसमें नीले रंग की साड़ी थी...



© भारती बब्बर











Comments

  1. बहुत अच्छा लिखा है।शायद आजकल की पीढ़ी इससे अपने को मिला न सके।उनके लिए सब चलता है। ऐसे ही लिखती रहो।

    ReplyDelete
    Replies
    1. किसी भी पीढ़ी के लोग जो दिल से किये प्रेम और दिमाग से निभाये रिश्ते के बीच के संतुलन को समझते हैं, इससे अपने को मिला सकेंगे। आभार🙏

      Delete
  2. बहुत सुंदर तरीके से वर्णन किया है भारती। कहानी सजीवता की तरफ है।बहुत बहुत शुभकामनाएं

    ReplyDelete
    Replies
    1. पढ़कर समीक्षा देने और शुभकामनाओं के लिए आपका 🙏

      Delete
  3. Interesting story. Enjoyed a lot.👍

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

चींटियाँ

स्मृतियों के शँख

मेरी आई