मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे...
ईश्वर सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है।प्रकृति में विद्यमान हर जीव,हर गतिविधि उसकी उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।हमारे वैज्ञानिक तथाकथित वैज्ञानिक तर्क व बुद्धि से हर प्राकृतिक क्रिया का कारण तो खोज लेते हैं लेकिन उस कारण के लिए उत्तरदायी शक्ति के विषय में कुछ भी नहीं कह पाते।हम ये तो जान गये कि हायड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक अणु मिलकर पानी बनता है लेकिन ये दोनों गैस किसने बनाये?पेड़ पौधों की हरियाली क्लोरोफिल से आती है लेकिन क्लोरोफिल कहाँ से?ऐसे असंख्य प्रश्न हैं जो हमारे आस-पास बिखरे पड़े हैं और जब हम निरुत्तर हो जाते हैं तो हमारी पिपासा हमें मंदिरों, तीर्थों तक ले जाती है।वहाँ जिस भी रूप में उस परम शक्ति का आसन हो,उसके दर्शन से हम तृप्त हो जाते हैं।उस मूर्त रूप के दर्शन का आकर्षण ही हमें बार-बार वहाँ ले जाता है।
ऐसा ही एक तीर्थ है माता वैष्णो देवी का भवन जो जम्मू कश्मीर के त्रिकुट पर्वत पर स्थित है।समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग पाँच हजार फीट है।सम्पूर्ण देश में, विशेषतः उत्तर भारत में माता वैष्णो देवी की बहुत मान्यता है।शाक्त सम्प्रदाय में वैष्णो देवी को महाकाली, लक्ष्मी तथा सरस्वती का संयुक्त रूप माना जाता है।
वर्ष १९९१ के मई महीने की बात है।मेरी बड़ी बहन मुंबई से चंडीगढ़ आयी थी।हम तीनों बहनों और मेरे पति ने माता के दर्शन का कार्यक्रम बनाया।बड़ी बहन पहली बार जा रही थी जबकि हम तीनों के लिए यह दूसरा अवसर था।मंदिरों तथा धार्मिक स्थलों की यात्रा में रुचि होने के कारण वह जाने के लिए अति उत्साहित थी।यूँ भी यह मान्यता है कि माता के बुलावे पर ही दर्शन का शुभ संयोग बनता है,इसलिए उसे अपना मुंबई से चंडीगढ़ आना सार्थक लग रहा था।
चार मई की रात को हम चंडीगढ़ से कटरा की बस में बैठे और पाँच मई की सुबह हम कटरा पहुँच गये।तब कटरा से माता के दरबार तक जाने का एक ही पैदल मार्ग था।खच्चर और पालकी पर सवार यात्रियों के लिए भी वही मार्ग था।तब हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध नहीं थी।कटरा से दरबार तक लगभग तेरह किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी होती है।अब तो वहाँ सुविधाओं की दृष्टि से क्रांतिकारी परिवर्तन हो चुका है लेकिन तब रास्ता अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण होता था।
कटरा में श्रद्धालुओं की भीड़ थी।वहीं पर स्नान आदि करके माता का चढ़ावा लेकर हमनें अपनी पैदल यात्रा आरम्भ की।बाणगंगा पहुँचने पर कुछ देर रुककर आराम किया।अब तक गर्मी अपने जौहर दिखा रही थी।दर्शन करके लौट रहे श्रद्धालुओं से ऊपर के मौसम का हाल जानने की कोशिश करते तो वे चढ़ाई शुरू कर रहे यात्रियों का 'जय माता दी' के उद्घोष के साथ उत्साहवर्धन करते।उनके माथे पर टीका सुशोभित होता, सिर पर लाल चुनरी बंधी हुई होती और मुख पर माँ के दर्शन से मिले सन्तोष की कांति होती।उन्हें देखकर पैरों में गति आ जाती।
भवन तक चढ़ाई चढ़ने में तब लगभग पाँच-छह घन्टे लग जाते थे।माता के कुछ परम भक्त पूरा रास्ता साष्टांग प्रणाम करते-करते जाते दिखाई दिये।वे या तो मनौती माँगने जा रहे होते या मनौती पूरी होने पर कृतज्ञता ज्ञापित करने जा रहे थे।आते-जाते श्रद्धालु बिना जान पहचान के भी एक दूसरे का 'जय माता दी' कहकर अभिवादन कर रहे थे।पूरा वातावरण मानो माता के प्रति भक्ति भाव से ओतप्रोत था।
अनुमानतः आधा रास्ता पार करने पर हम पहुँचे अर्ध-कुँवारी जहाँ गर्भजून गुफा है।कहा जाता है कि माता ने इस गुफा में नौ महीने तक तप किया था।इस गुफा का आकार माँ के गर्भ के समान ही है इसीलिए इसे गर्भजून कहा जाता है।उस गुफा का मार्ग बेहद संकरा है।अंदर घना अंधेरा होता है और लोगों की भीड़ के कारण साँस लेने में थोड़ी दिक्कत होती है,किंतु आस्था की शक्ति और भक्ति की प्रेरणा उन परिस्थितियों पर विजयी रहती है।गुफा से बाहर आते ही श्रद्धालुओं में नयी ऊर्जा और स्फूर्ति का संचरण हो जाता है।आधी चढ़ाई पूरी कर लेने का सन्तोष भी होता है।हम भी उसी उत्साह से आगे बढ़कर साँझी छत पहुँच गये।यहाँ से भवन की दूरी मात्र ढाई कि.मी. रह जाती है।दूर से भवन के दर्शन चलते रहने की प्रेरणा देते हैं।
भवन पहुँच कर हम भी दर्शनार्थियों की पँक्ति में खड़े हो गये।अब दर्शन की पूरी प्रक्रिया बहुत सुनियोजित तरीके से चलती है लेकिन तब केवल टोकन लेकर पँक्ति में खड़े हो जाते थे जहाँ से पंडित जी कुछ लोगों का समूह बनाकर दर्शन के लिए भेजते थे।उस समूह के वापस आने तक अगले को प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।भीड़ के कारण पँक्ति लम्बी थी लेकिन अंततः हमारी बारी आ गई।जिस गुफा में माता की पिंडियाँ स्थापित हैं वह भी संकरी है और तब वहाँ तक एक प्रवाहमान जलधारा में पैर डालकर गुज़रना होता था।पंडित श्रद्धालुओं को बिना रुके आगे बढ़ते रहने को कह रहे थे।मुख्य दर्शन के समय भी वे क्षण भर भी ठहरने न देकर लगातार आगे बढ़ाते रहे।दरस के जिस क्षण के लिए इतनी यात्रा और प्रतीक्षा की,उसकी अनुभूति का सन्तोष होता उससे पहले ही हम आगे बढ़ते-बढ़ते हाथ जोड़ते हुए बाहर भी निकल गए।
बाहर निकलते ही बड़ी बहन ने असन्तोष प्रकट करते हुए कहा कि उसे तो दर्शन किये जाने जैसा अनुभव बिलकुल नहीं लगा।उसका तो जैसे सारा उत्साह ही चला गया।लेकिन अब किया ही क्या जा सकता था!शाम ढल चुकी थी और रात भर हमें उतरायी करनी थी।उससे पहले थोड़ा आराम करने के उद्देश्य से हम यात्रियों के आराम के लिए बने हॉल की ओर बढ़े।दाखिल होते ही चारों तरफ लोगों की भीड़ नज़र आयी।सुस्ताने के लिए बनाये गए तख्त भरे हुए थे।हमारी तरह आराम के लिए तरसते कई लोग अंदर आते, पूरे हॉल का चक्कर लगाते हुए जगह न पाकर बाहर निकल जाते।हम भी उन्हीं की तरह निराश होकर निकलने ही लगे कि बहन को भीड़ के बीच खाली तख्त दिख गया।उस तख्त के पास खड़े होकर भी कुछ लोग बैठने के लिए जगह तलाश रहे थे लेकिन उन्हें वह दिखाई नहीं दिया।बिना अधिक सोचे हम चारों वहाँ बैठ गये।
जब तन को तनिक आराम मिला हमनें वापसी की तैयारी कर ली।बड़ी बहन मुरझाए स्वर में कहती रही कि जितना समय चढ़ने और उतरने में लगा उसका सौंवा अंश भी दर्शन में नहीं लगा।तन थका हुआ था, उसपर गर्मी भी थी।हम शिथिल कदमों से चलते रहे।चढ़ाई करते लोगों का जोश देखकर बहन कहे बिना नहीं रह सकी कि पंडित अपनी पंडिताई में श्रद्धालुओं की भावना का बिलकुल सम्मान नहीं करते,आँख भर दर्शन भी नहीं करने देते।
पहाड़ पर चढ़ते हुए जितना परिश्रम करना पड़ता है उतना ही उतरते हुए पैरों पर शरीर का संतुलन बनाए रखने के लिए करना पड़ता है।वापसी में साँझी छत तक पहुँचने में देर नहीं लगी।थोड़ा और उतरने के बाद आराम करने की इच्छा हुई लेकिन कोई जगह नहीं मिली।तभी कुटिया के आकार का एक पड़ाव नज़र आया।चारों ओर से खुला,पक्की छत और बैठने के लिए सीमेंट की बेंचें।वहाँ कुछ युवा लड़के लड़कियाँ मौज-मस्ती कर रहे थे।हम भी वहाँ चले गये।हमारे बैठते ही अचानक बारिश शुरू हो गई।मौजी युवाओं की टोली भीग जाने की परवाह किए बिना बाहर निकल गई।हमनें तो शुक्र मनाया कि हमें सही वक़्त पर सिर छुपाने की जगह मिल गई।बौछारें काफी तेज थीं लेकिन हमारे साथ कोई बैठने नहीं आया।गर्मी में चढ़ते-उतरते श्रद्धालुओं को सम्भवतः बारिश में भीगना भा रहा था,अलबत्ता हम स्वयं को भीगने से बचाकर रिमझिम का आनंद ले रहे थे।
अचानक हमारी निगाह पड़ाव के साथ बने बिजली के खम्बे के पास पड़ती बौछारों पर पड़ी।खम्बे पर लगे बल्ब के प्रकाश के नीचे बारिश की बौछारें दोनों तरफ से तिरछी पड़ती हुई एक दूसरे को काट रहीं थी।यह बहुत विस्मित करने वाली बात थी क्योंकि एक ही स्थान पर परस्पर विपरीत दिशा में वर्षा कैसे हो सकती है!मेरी छोटी बहन भूगोल की छात्रा थी,हमनें उससे जानना चाहा लेकिन उसके लिए भी यह अभूतपूर्व था।
लगभग आधे घंटे बाद बारिश रुकी।हम भी कूच करने के लिए उठ गये।बाहर निकले तो पल भर को हम चारों ठिठक गये...हमनें एक दूसरे को देखा...रास्ते पर बरसात का नामोनिशान नहीं था!!सड़क सूखी पड़ी थी, न तो वर्षा के हो चुकने का कोई निशान था और न ही होने के कोई आसार नजर आ रहे थे!!यह किसी चमत्कार से कम नहीं था...हम समझ नहीं पा रहे थे कि जो हम चारों ने अनुभव किया वह सच था या जो हम अब देख रहे हैं वो सच है!!!सड़क किनारे बने चबूतरे पर कोई चादर ओढ़े सोया हुआ था।मैंने धीरे से उसकी चादर को छुआ,वह बिलकुल सूखी थी और उसका एक छोर ज़मीन पर लटका हुआ लहरा रहा था।हमें चमत्कार के उदाहरण मिलते जा रहे थे और हमारी उत्कंठा बढ़ती जा रही थी।चबूतरे से नीचे पड़ाव के पास कच्ची जगह थी जहाँ कुछ पौधे उगे हुए थे।मैंने उस जगह पर उतरकर मिट्टी उठाकर देखा, मिट्टी बिलकुल सूखी और भुरभुरी थी।हम चारों हतप्रभ थे।सारी बातें अनुभव करने के बावजूद अविश्वसनीय थीं।नीचे से ऊपर आते लोगों से हमनें जानने का प्रयास किया कि क्या निचले इलाकों में बारिश हुई है?उनका उत्तर था कि बारिश का ही तो इंतज़ार है, गर्मी से राहत मिलेगी...
हम चारों रुक कर एक बार फिर बैठ गए।कुछ समझ नहीं आ रहा था।हम चारों के अतिरिक्त सभी उस अनिर्वचनीय अनुभव से वंचित थे!किसी से कहते तो वे शायद हमें मूर्ख समझते लेकिन यह अद्भुत अनुभव हम चारों को एकसाथ हुआ था, और वह न तो भ्रम था और न हो सकता था।हमनें वर्षा की न केवल तिरछी बौछारों पर चर्चा की थी, वरन हम उसके रुकने की प्रतीक्षा में रुके हुए थे।आँखों देखी बात मिथ्या कैसे हो सकती है?तब यह भी याद आया कि हम बारिश होती हुई देख रहे थे और उसमें लोगों को आते जाते हुए भी, लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया कि न कोई भीगा हुआ दिख रहा था और न ही कोई बारिश से बचते।उस अलौकिक अनुभव को स्वीकार करते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो गए!
"मैं कह रही थी ना कि इतनी दूर यात्रा करने के बाद पल भर का भी दर्शन नहीं मिला, माता ने अपनी उपस्थिति और शक्ति के भरपूर दर्शन करवा दिये!" बड़ी बहन ने कहा।
सच ही तो था, हम उस सर्वभौमिक परम शक्ति को केवल उन तीन पिंडियों तक सीमित समझकर उसके दर्शन से स्वयं को वंचित समझ रहे थे।इस अद्भुत अनुभव के बाद हमें उस शक्ति के और प्रमाणों की आवश्यकता नहीं थी।हम हृदयतल तक सन्तुष्ट होकर घर लौटे।उस दिन के बाद से ईश्वर को मैं अपने चारों तरफ अनुभव करती हूँ।
तभी तो कबीर ने कहा है,"मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे,मैं तो तेरे पास रे..."
© भारती बब्बर
पुरानी कितनी यादें ताज़ी हो गई।आज भी ये पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो गए।उसके बाद मुझे कभी भी मंदिर जाने का उत्साह नहीं रहा क्योंकि मोको कहां ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में।
ReplyDeleteढूंढे rey
बिलकुल सही,महत्त्वपूर्ण पाठ सीखने को मिला उस अनुभव से। धन्यवाद 🙏🏼
Deleteबहुत सुंदर रचना।
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏🏼
ReplyDelete