दो पंछी दो तिनके

 

" दो पंछी दो तिनके कहो लेके चले हैं कहाँ,ये बनाएंगे इक आशियाँ......."बरसों पहले ये गीत आया था।तब भी और इतने सालों बाद आज भी ये गीत मन में एक पुलक जगाता है।जीवन की रुमानियत, साँझापन, ताउम्र किसी के साथ रहकर सुख की बयार और दुःखों के झंझावात झेलने के अनुभवों की गुदगुदाहट का अनुभव होता है।शायद इसीलिए नीड़, बसेरा, घरौंदा, घोंसला,आशियाना जैसे शब्द स्निग्ध-सी अनुभूति दे जाते हैं।घोंसला बनाने की पंछियों की कार्यकुशलता यूँ भी विस्मयकारी और प्रेरणास्पद है।

    नये घर में आने के बाद मैं भी इस स्निग्ध अनुभव को जीने लगी।कमरों की सजावट को तो अलबत्ता इस उत्साह का साक्षी होना ही था,मेरे लिए सबसे सुखकर अनुभव था अपनी बालकनी को फूलों और पौधों से भरना।मिट्टी से कई मीटर ऊपर रहकर स्वयं को मिट्टी से जुड़े रहने की प्रतीति देना,ठीक वैसे ही जैसे आकाश से दूर होते हुए भी बालकनी में खड़े होकर स्वयं को उसके क़रीब समझना।वहाँ से पक्षियों का कलरव भी सुनती और आकाश में उनके निर्बाध आलोड़न का दूरस्थ आनन्द भी लेती।उन्हें आकर्षित करने के लिए रंग-बिरंगे फूलों से भरे गमलों के बीच मैंने उनके लिए दाना-पानी रख दिया।कुछ दिनों तक तो कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।फिर किसी दूरदर्शी को पौधों के झुरमुट में भोजन दिख गया।डरते-डरते ही एक गौरैया का जोड़ा आया और कुछ देर बाद ही वे निडरता से उस दावतखाने के एकाधिकारी बन गये।अगले दिन परिवार के शेष सदस्यों को भी न्यौता मिल गया।फिर तो जैसे बालकनी की मुंडेर,गमले, खिड़की के दरवाज़े,सभी कुछ उनके अधिकार क्षेत्र की परिधि में था।

    एक दिन एक नया पाहुना आया,अकेला ही।कुछ हिचकते-झिझकते भोज की तश्तरी को चुगा।ये थी एक बुलबुल।पर बुलबुल को भोजन से अधिक आनंद यहाँ-वहाँ फुदकने में आता।उसका ध्यान जैसे बगिया की सुंदरता में रमा था।एक था गुल और एक थी बुलबुल...क्या मेरी बालकनी के चमन में प्रेम कहानी पनप रही है....

    कुछ दिनों में मुझे मेरी शंका का समाधान भी मिल गया। जब उसके साथ उसका जोड़ीदार भी आया तब पता चला वह बुलबुल का ब्याहा जोड़ा था।जो डारि-डारि फुदककर आनंदित हो रहा था वह नर-बुलबुल नये नीड़ के निर्माण के लिए उचित और सुरक्षित ठौर तलाशने की ड्यूटी पर तैनात था।उन्हें मेरी बगिया का कोई कोना भा गया था।नवदम्पत्ति लगातार चर्चा में जुटे थे, पत्नी के तर्क का पति भी ताबड़तोड़ उत्तर दे रहा था।मुझे जिज्ञासा थी कि आखिर कौन सा कोना उन्हें आशियाने के लिए उपयुक्त लग रहा होगा!वहाँ न कोई टहनी थी न कोई खोह....ऐसा तो नहीं कि मैं अपनी कपोलकल्पना में यह सोचे बैठी हूँ कि उनकी चर्चा का विषय घोंसला है और मान लिया है भी तो मेरी बालकनी की बगिया में ही है!

     पर मेरा अनुमान सही था।न कोई आवेदन न कोई अनुमति ,न रजिस्ट्रेशन और न ही कोई बयाना...अगली सुबह मेरी बालकनी में आशियाना बनना शुरू हो गया।बालकनी की छत के नीचे बोगनवेलिया की बेल चढ़ाने के लिए लटकायी  चौकोर जाली की सींखचों पर निर्माण कार्य आरंभ हुआ।पति चोंच में एक-एक तिनका लेकर आता और पत्नी अपनी सधी हुई चोंच से उस तिनके को सींखचे पर लपेट देती।यूँ तो पक्षी हर समय दाना चुगते नज़र आते हैं पर नीड़ के निर्माण में यह पक्षी-युगल ऐसा रमा हुआ था कि उन्हें नीचे रखे दाने से भरे कटोरदान में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी।उधर गौरैया सहकुटुम्ब सहपरिवार उसका आनंद ले रही थी।

      कुछ ही दिनों में तिनका-तिनका जोड़कर उनका बसेरा बनकर तैयार हो गया।कमाल तो इस बात का था कि लोहे की लटकती सींक पर तिनकों को इतनी सुगढ़ता से बुना था कि हवा के झोंके से वह सींक डोलती लेकिन एक तिनका भी यहाँ-वहाँ नहीं होता।बुलबुल के प्रणय का मज़बूत जोड़ ही सम्भवतः उसे थामे हुए था। ऊँचाई पर बने अपने घरौंदे से बगीचे के विहंगम दृश्य का आनंद लेती उनकी चहचहाहट  मेरे घर को भी भर देती।

       फिर एक दिन पत्नी ने गृहस्थी का पारिवारिक दायित्त्व सम्भालते हुए आसान ग्रहण किया।जब उसका नीड़ से निकलना बंद हो गया और अन्न-जल की व्यवस्था और सुरक्षा के लिए पहरेदार की भूमिका में पति ने कमर कस ली तब निश्चित हो गया कि मेरी बालकनी में बुलबुलें चहकने वाली हैं।जल्द ही बालकनी में बच्चों की चहक भरी किलकारियाँ गूंजने लगी।सद्य-प्रसूता और नवजात शिशुओं की क्षुधा निवारण हेतु घर के मुखिये की आवाजाही अचानक बढ़ गयी।उनका निवास हमारी पहुँच से इतना दूर और ऊँचाई पर था कि उन्हें देख पाना सम्भव नहीं था।अकुलाहट के सामूहिक स्वर से अनुमानतः तीन शिशु थे।कुछ दिनों बाद शिशुओं का स्वर और अधिक आक्रांत हो गया और मादा बुलबुल भी अब नर के साथ बाह्य गतिविधियों में व्यस्त रहने लगी।

      जल्द ही बच्चों के प्रशिक्षण का समय भी आ गया।माँ फुदककर दिखाती कि परों को इस तरह फैलाकर पहला कदम लेना है।उनकी भाषा न समझने के बावजूद यह समझना कठिन नहीं था कि उस कल्लोल में माँ-शिशुओं की अकुलाहट, आशंका और उत्साह के स्वरों का संयोजन था।देखते ही देखते तीनों शिशुओं ने आकाश के अबाध प्राँगण में अपने-अपने हिस्से का विस्तार पा लिया।उनके साथ ही अभिभावक युगल भी अपने कर्त्तव्य की पूर्ति होते ही नीड़ को छोड़ असीमित क्षितिज के अपने परिसर में लौट गये।उनकी मोहमुक्त प्रवृत्ति ने मुझे आत्मविश्लेषण पर बाध्य किया।इतनी मेहनत और तल्लीनता से बनाये घरौंदे को त्यागते समय क्या एक बार भी नहीं सोचा होगा?घर बनाने और बसाने में खाना, पीना, उड़ना सब भूल जी-जान लगाने के बाद क्षण भर में उन सबसे वैराग्य !

       सींखचों पर टँगा तिनकों का उनका आशियाना मेरी बालकनी में शो-पीस की तरह महीनों सजा रहा।इस बीच बारिश की फुहारों और तेज़ हवा के झोंकों से बालकनी झड़ते सूखे पत्तों और मिट्टी के गीले कणों से अस्तव्यस्त होकर गन्दला भी गयी,लेकिन लोहे की छड़ पर बने उस सुगठित एवं अगम्य दुर्ग का एक भी तिनका अपने स्थान से नहीं हिला।

       इस बीच गौरैया ने बालकनी को निर्भयता से अपना क्रीड़ा और क्रिया स्थल बना लिया था।हमारी उपस्थिति से भी उसमें कोई व्यवधान न पड़ता।उस आशियाने पर भी उनका दृष्टिपात हो चुका था।एक दिन एक गौरैया बहुत देर तक उसके आसपास इठलाती मण्डलाती रही।फिर चुपके-से जैसे किसी को पता न चले, उसने अपनी चोंच से उसे भेद दिया और एक तिनका खींच कर उड़ा ले गयी।कुछ पलों बाद लौटी और एक और तिनका निकाल कर ले उड़ी।हमें अभेद्य और अगम्य लगने वाले उस दुर्ग को उस नन्हीं गौरैया ने मानो सहजता से भेद दिया।यह समझने में देर नहीं लगी कि दिन भर मेरी बालकनी में उछलती, कूदती और चुगती गौरैया कहीं और आशियाना बनाने में व्यस्त हो गयी थी। बने-बनाये लेकिन परित्यक्त आशियाने में रहना न उनका स्वभाव है न रूचि।जिस तरह मैंने उस आशियाने को तिनका-तिनका बनते देखा था, उसी प्रकार उसके हर तिनके को किसी और के आशियाने का हिस्सा बनने के लिए निकलते देखने लगी।

       फिर वो हुआ जो अप्रत्याशित था...वो बुलबुल एक दिन लौट आयी,लेकिन आशियाने को बसाने नहीं...उसे उजाड़ने!जिस घर को तिनका-तिनका जोड़कर बसाया था, उसे स्वयं ही विच्छिन्न करके समाप्त करने!जिस गति से उन्होंने उस घोंसले का नामोनिशान मिटा दिया, उससे यह बात स्पष्टतः प्रमाणित हो गयी कि रचना का विघटन उसके संगठन से कहीं सरल है।

        शिशुओं के उड़ जाने के बाद पक्षियों को घोंसला छोड़कर जाने का स्वभाव सर्वविदित है, लेकिन उसे किसी रूप में किसी और के काम आता देखकर विघटित करके समाप्त करने का यह उदाहरण मेरे लिए बिलकुल नया था।वह बुलबुल एक-एक तिनका निकालकर जाने कहाँ ले गयी कि उस घोंसले का कोई अवशेष नहीं बचा।पता नहीं गौरैया उसे अकस्मात विलुप्त हुआ देखकर हतप्रभ हुई या नहीं, किन्तु मैं तो अवश्य हो रही थी।जिस तरह तेज़ी से बुलबुल ने उसे विघटित किया उससे ये तो स्पष्ट हो गया कि उसे दोबारा आबाद करने की कोई योजना नहीं थी।यूँ भी पक्षी हर बार नये नीड़ का निर्माण करते हैं।तो क्या उसे निर्वासित करने के बाद भी मोहवश बुलबुल उसपर पहरा दे रही थी?छोड़ दिये जाने के बाद उसका क्या औचित्य?क्या उसने गौरैया को तिनके निकालते देख लिया था?पक्षियों और मनुष्यों का साथ तो युगों से है,उनके सान्निध्य में रहते हुए हम मनुष्य तो उन्मुक्त और निर्लिप्त रहना सीख न सके,कहीं ऐसा तो नहीं कि पक्षी हमारी सोहबत में स्वार्थी और कृतघ्न होने लगे हैं!


© भारती बब्बर

      

     

Comments

  1. Di, humare ghar ke bahar Wale bulbul ke jode ka vritant mei Kai varshon se likhne ki soch rahi hun....aaj aapka vritant pad kar akasmat vo samay yad aa gaya. Bahut acha laga pad kar..likhte rahiye. 👏👏

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    1. धन्यवाद नीलम 🙏🏼 तुम भी लिख डालो।

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  2. मेरे लिए भी ये नयी जानकारी है l कभी किसी पक्षी को अपना घोंसला तोड़ते नहीं देखा l अच्छा लिखा है भारती l

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  3. शब्दों का जाल केवल तुम ही इतना अच्छा बना सकती हो। हमेशा की तरह कमाल।

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    1. धन्यवाद भाग्यश्री 🙏🏼

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  4. भारती, तुमने तिनकों की तरह शब्दों को जो बुना है, अप्रतिम!!!

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