तस्मै समिधाय नमः ( भाग : २....सुचरिता )
तस्मै समिधाय नमः (भाग : २...सुचरिता)
हमारे परिवार में सनातन पद्धति के स्थान पर आर्य समाज पद्धति से हवन करने की परंपरा रही है।जब कभी भूल से भी हवन करने वाली लकड़ी कह देते तो शास्त्री जी तुरंत टोक देते, " यह साधारण लकड़ी नहीं है, समिधा है, विशेष है।" अलबत्ता उसकी विशेषता यही थी कि वह चूल्हा जलाने केे लिए नहीं पूजन के लिए इस्तेमाल हो रही थी। भला पेट-पूजा से बड़ी कौन-सी पूजा हो सकती है! पर तब उनसे शास्त्रार्थ करने की न बुद्धि थी न साहस। तब यही समझ आया कि जिस विशेषता से वेे शास्त्री कहलाते हैं, उसी विशेषता से वह समिधा कहलाती है।
अभी हाल में कहीं पढ़ा कि समिधा का धर्म हवन की आहुतियों को इष्ट तक पहुँचाना है।हवन की सार्थकता घृत एवं सामग्री से है और समिधा उसे समर्पित करने का माध्यम मात्र!! जलती समिधा है किंतु सुगंध और पवित्रता घी तथा सामग्री से आती है! अर्थात इदन्नमम के उच्चारण के साथ अग्नि को समर्पित होने वाली समिधा वास्तव में किसी की नहीं। रोचक बात तो यह है कि यद्यपि अकेली समिधा अग्नि प्रज्ज्वलित कर सकती तथापि उसका अस्तित्त्व कारण न होकर माध्यम मात्र है।
जीवन- रुपी इस यज्ञ में भी समिधा के मौन समर्पण के उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री केे होने की कहावत उसी समिधा की कहानी कहती है। मैं आपका परिचय चार ऐसी "समिधाओं" से कराना चाहती हूँ, जिन्होंने घी और सामग्री की अनुपस्थिति में स्वयं को समर्पित करके जीवन-यज्ञ संपन्न किया है। उनका परिचय चार नामों से करुंंगी। यथा,सुजाता, सुचरिता, सुलक्षणा और सुमेधा।
सुजाता से आपका परिचय पिछले अंक में हो चुका है।
आज बात सुचरिता की....
सच्चरित्रता किसी शिक्षा, सामाजिक स्तर या वर्ग की मोहताज नहीं होती,यह एक जन्मजात उदात्त गुण है। इसका उदाहरण है सुचरिता, जिसका जन्म एक अत्यंत निर्धन दलित परिवार में हुआ। तीन बहनों और एक भाई के परिवार में वह दूसरी है। पिता खेतिहर मजदूरी करते और कटाई के मौसम में माँ भी वही काम करती। बड़ी बहन बिल्कुल नहीं पढ़ी लेकिन सुचरिता को स्कूल जाना अच्छा लगता। पढ़ाई में रुचि होने और अच्छी होने के बावजूद उसे सातवीं कक्षा तक ही पढ़ने का अवसर मिला। इस बीच उसे स्कूल में खो-खो की टीम में खेलने का अवसर भी मिला।उसे पढ़ाई के साथ खेलने के अवसर छूटने का अफसोस भी था। गरीबी ने उसे भी खेतों में मजदूरी करने पर मजबूर किया। सोलह बरस की होते ही उसकी शादी कर दी गयी जो उसके समुदाय में आम बात थी। पति तीसरी तक ही पढ़ा था और उसके पास कोई स्थायी रोजगार भी नहीं था। यही मजबूरी उन दोनों को महानगरी मुम्बई ले आयी।
मुम्बई आकर उसके पति को एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूर का काम मिल गया। नयी गृहस्थी के नाम पर उसके पास कुछ नहीं था। ब्याह हुए मुश्किल से तीन-चार महीने हुए थे और सुचरिता के लिए सबकुछ नया था, घर भी और बाहर भी। पति काम पर जाता तो वह उस कमरे में बंद रहती। पति से उसका संवाद भी कम ही हो पाता क्योंकि वह सुबह जाता तो देर शाम ही लौटता। उसके लिए सुचरिता का एक पत्नी के तौर पर यही काम था कि उसके लिए रोटी बनाये और उसकी शारिरिक इच्छापूर्ति करे। जब सुचरिता ने कहा कि उसे अकेले डर लगता है तो क्यों न वह भी काम पर साथ चले, उसके पति ने कमरे को ताला लगाकर जाना शुरू कर दिया।सारा दिन वह अकेले पगला जाती। एक दिन उसने यह बात कह क्या दी,पति ने उसपर हाथ उठा लिया। धीरे-धीरे यह नियम बन गया कि सुचरिता ने अपने मन की कही नहीं कि पति पिटाई कर देता। उसे बचाने वाला भी कोई नहीं। फिर तो पति ने रोज़ाना पीना भी शुरू कर दिया। अब शाम की जगह रात को लौटने लगा। सुचरिता इस इंतज़ार में रहती कि पति चार पैसे कमा कर लाये तो वह चूल्हा जलाये और सारे दिन के भूखे पेट में कुछ डाले लेकिन पति महाशय को मानों उससे कोई सरोकार ही न था। वह तो धुत्त होकर आता ,दिन भर की भूखी बैठी पत्नी से जबर्दस्ती कर अपनी भूख मिटाता और निढ़ाल पड़ जाता। सुचरिता पानी के साथ आँसू पीकर रह जाती।
उसने हिम्मत करके पति से कह दिया कि यदि वह ताला लगाकर गया तो वह आत्महत्या कर लेगी।पति ने ताला लगाना छोड़ दिया, लेकिन सुचरिता वहाँ जानती ही किसे थी! वह दहलीज़ पर बैठी बाहर ताकती रहती। ऐसे ही एक दिन उसने दो अपिरिचित आँखों को अपनी ओर ताकते हुए पाया। शुरू में तो उसने उस तरफ ध्यान नहीं दिया, किन्तु फिर उसे यह नियमित प्रतीत होने लगा। वह बाहर निकलते भी डरती, हालाँकि उन नज़रों में आपत्तिजनक कुछ नहीं था। वह एक नवयुवक था, पहनावे और शक़्ल-सूरत से भी ठीक था। सुचरिता ने दरवाज़े पर बैठना बन्द कर दिया तो दो दिनों बाद वह युवक उसके दरवाज़े पर खड़ा था...." तुम इस आदमी के साथ क्यों रहती हो जिसे तुम्हारी क़दर नहीं। मुझे पता है तुम्हें पेटभर खाना भी नहीं मिलता और उससे पिटती भी हो। मुझे तुम अच्छी लगती हो,मैं जबर्दस्ती नही कहूँगा, पर तुम चाहो तो मैं तुमसे शादी करके अपने साथ रख सकता हूँ। मैं सुखी रखूंगा तुम्हें, उस शराबी की फिकर मत करना,उससे मैं निपट लूंगा।"
इतना कह कर वह लौट गया, लेकिन सुचरिता की नींद उड़ गई। आस-पास सबको पता था उसकी हालत का,अब तो घर बाहर दोनों जगह उसे असुरक्षित लगता। सौभाग्यवश चंद दिनों में उसके पति को दूसरा काम मिल गया और वे वहाँ से दूसरी जगह चले गये। तब तक उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि सुचरिता के तन पर एक ही साड़ी रह गई। वह रोज रात को बारी-बारी से एक दिन पेटिकोट और दूसरे दिन साड़ी धोती और सुबह वही पहनती। तभी वह गर्भवती हो गई और उसका पति उसे मायके छोड़ आया। उसे बेटी हुई और डेढ़ साल के भीतर बेटा। दोनों बार वह माँ के पास ही गई। उन्होंने भी जैसे तैसे निपटाया। लेकिन सुचरिता को मातृत्त्व की गम्भीरता और ज़िम्मेदारी का अहसास हो गया, इसलिए दूसरी प्रसूति के समय उसने स्वयं डॉक्टर से कहकर नसबंदी करवा ली। इसकी जानकारी उसके पति को कभी नहीं मिली।
मुम्बई लौटकर परिवार के पालन पोषण की विकराल समस्या थी। पति तो शराबी घोषित हो चुका था। माँ बनते ही सुचरिता ने ठान लिया कि वह बच्चों के साथ अपने जीवन की पुनरावृत्ति हरगिज़ नहीं होने देगी। उसके लिए उसे जिससे भी भिड़ना पड़े वह तैयार थी। पहला निशाना बने उसके सास-ससुर जो यह मानते थे कि पति की इस अवस्था के लिए वह ज़िम्मेदार है। सुचरिता अपने बच्चों के लिए काम करने को तैयार थी लेकिन उसके पति की इसमें भी मानों नाक कटती थी। न वह खुद सक्षम था ना पत्नी को काम करने देता।उसपर ससुराल वाले बहू से पति का कहा मानने की अपेक्षा रखते। सुचरिता ने उनसे कह दिया कि या तो वे उसके परिवार की ज़िम्मेदारी लें अन्यथा उसे रोकने का उन्हें कोई अधिकार नहीं।
उसकी रिश्ते की एक बहन ने उसे एक दो घरों में बर्तन धोने और साफ-सफाई का काम दिलवा दिया। अपने अच्छे व्यवहार से सुचरिता ने सबका दिल जीत लिया। काम बढ़ता गया और उसे छह घरों का काम मिल गया।इसके साथ ही उसका हौसला और हिम्मत भी बढ़ गयी।बच्चे भी जैसे माँ के संस्कारों से ओतप्रोत थे। सुचरिता ने बेटी को समझाया कि उसे अपनी मर्यादा और चरित्र की रक्षा हर कीमत पर करनी है, बेटे को भी सिखाया कि उसे भी अपने आप को चरित्रवान बनाना होगा ताकि वह अपने पिता की तरह किसी लड़की की ज़िंदगी खराब करने का कारण न बने। वह पैसे बचाकर उनकी ज़रूरत पूरी करती और बच्चे इस बात के लिए उसकी क़दर भी करते। लेकिन ये इतना सरल नहीं था, पति कुंठित होकर जब तब उस पर हाथ उठा लेता। हद तो तब हो गयी जब एक बार अपनी बस्ती के सार्वजनिक गणपति समारोह के दौरान उसके पति ने उसे मण्डप में ही इस बात पर जमकर पीटा कि वह बिना उसे पूछे कैसे चली आयी! कोई उसका बचाव करने यह कहकर नहीं आया कि यह पति-पत्नी के बीच का मामला है। वह दिन निर्णायक साबित हुआ क्योंकि सुचरिता समझ गई कि बच्चों के लिए उसे कोई फैसला करना ही पड़ेगा।
उसकी बेटी सत्रह बरस की होने को थी,वह दसवीं में और बेटा आठवीं में था। शराबी पिता के व्यवहार से बेटी को मनोवैज्ञानिक परेशानी होने लगी तब सुचरिता ने उसे पिता से दूर करने की ठानी। उपाय एक ही था, उसका विवाह। संयोग से गाँव में उसे एक बढ़िया रिश्ता मिल भी गया। लड़का बारहवीं पास था और किसी सेठ के यहाँ ड्राइवर था। उसके पति ने बेशर्मी से अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। सुचरिता ने अपनी बचत और कुछ अपने काम वाले घरों की मदद से बेटी के हाथ पीले कर दिये। जिन घरों में वह काम करती थी उन्होंने उसकी बहुत मदद की। पति को उसने मण्डप में पैर न रखने की धमकी भी दे डाली। ससुराल वाले पहले ही छोड़ चुके थे,पर अब सुचरिता को किसी की परवाह नहीं थी।
इससे पहले कि सुचरिता चैन की साँस ले पाती गाँव से शहर लौटते हुए उसका बेटा एक सड़क दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल हो गया। उसके इलाज के लिए सुचरिता को गांव के ही सामन्तों से कर्ज लेना पड़ा। डेढ़ महीने तक अस्पताल में संघर्ष के बाद बेटा तो घर आ गया लेकिन सुचरिता पर सवा लाख का कर्ज़ चढ़ गया। इन विषम परिस्थितियों में उसने एक और बड़ा निर्णय लिया। अपने गाँव की पंचायत में उसने पति से अलग होने की अर्जी दे दी। उसके समुदाय में इस किस्म के मामले पंचायत के स्तर पर ही निपटाने की रवायत है क्योंकि कोर्ट कचहरी के चक्कर और खर्च कोई भी नहीं उठा सकता। पंचायत ने उसके पति को उससे दूर रहने के निर्देश दे दिये।
मुम्बई लौटकर सुचरिता का लक्ष्य कर्ज़ उतारना था। उसके लिए यह किसी भगीरथ कार्य से कम नहीं था। परंतु वह अपने बेटे को जिस प्रकार मौत के मुँह से छीन कर लायी थी, उसके बाद उसे अपने ईश्वर पर सीमातीत विश्वास हो चुका था। बेटी का विवाह कर चुकने के बाद उसका अगला लक्ष्य बेटे को ग्रेजुएट बनाना हो गया। उसके समुदाय और गाँव में दसवीं से अधिक कोई नहीं पढ़ा। पर सुचरिता से पूछो तो खिलखिलाकर कहती,वो बैठा है ऊपर, मेरा शंकर!वह अपनी खिलखिलाहट के लिए जानी जाती। जीवन जितना जटिल होता उतनी वह खिलखिलाती। खो-खो खेलने के अनुभव को जीवन से जोड़कर कहती, 'ज़िन्दगी मेरी पीठ पर धप्पा मारकर खो कहती है तो मैं वही धप्पा अपने शंकर की पीठ पर मारकर खो बोल देती हूँ, सम्भाल अब...खो जिसकी पीठ पर है वो जाने,मैं टेन्शन क्यों लूँ!' उसका यह विश्वास उसमें साहस भर देता।
दसवीं तक मराठी माध्यम से पढ़कर भी उसके बेटे ने बिना किसी ट्यूशन के अंग्रेजी माध्यम में छप्पन प्रतिशत अंकों के साथ बीकॉम कर लिया। उस दिन सुचरिता सातवें आसमान पर थी,पूरे गाँव में उसकी इज़्ज़त कई गुना बढ़ गई। उसका आधे से ज़्यादा कर्ज़ उतर चुका है। उसके पति ने इसमें तो कोई हिस्सेदारी नहीं निभाई पर उससे दोबारा जुड़ने के कई असफल प्रयास किये। सुचरिता ने अपना क़द इतना ऊँचा कर लिया था कि वह सफल न हो सका। बच्चों के लिए भी केवल माँ का स्थान ईश्वर तुल्य बन गया जिसकी हिम्मत और साहस से उनका जीवन सँवर गया।
सुचरिता आज भी काम करती है क्योंकि उसका भगीरथ कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है। बचा हुआ कर्ज़ तो उतर ही जायेगा। आजकल वह बेटे की सरकारी नौकरी लगने की प्रतीक्षा में है। उसे विश्वास है कि आरक्षण के नियमों के तहत ये हो भी जाएगा। सुचरिता ने खो-खो का धप्पा एक बार फिर शंकर की पीठ पर दे दिया है...
© भारती बब्बर
Strong story depicting the society.👍
ReplyDeleteThanks a lot 🙏
Deleteऐसी हकीकत हमारे आस पास छोटे मोटे काम करने वाली कई महिलाओं की होती हैं। आपकी कहानीया यथार्थ के बहुत करीब होती हैं।
ReplyDeleteबहुत आभार🙏
DeleteBhut khub Bharati
ReplyDeleteबहुत आभार🙏
Deleteबहुत ख़ूब👏👏👏
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏
DeleteBharti di, aapki kahani pad ankhe nam ho gayi...na jane humare samaj me kitni aisi Sucharita hain..humare ghar ek Sulaxna nam ki maid rahi hai... uski apni kahani se bahut milti julti hai aapki Sucharita ki kahani.
ReplyDeleteधन्यवाद नीलम🙏 हमारे समाज के एक वर्ग विशेष में ऐसे चरित्र और ऐसी परिस्थितियाँ प्रायः मिलते हैं।
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