तस्मै समिधाय नमः ( भाग :४....सुमेधा )
तस्मै समिधाय नमः ( भाग : ४...सुमेधा )
हमारे परिवार में सनातन पद्धति के स्थान पर आर्य समाज पद्धति से हवन करने की परंपरा रही है।जब कभी भूल से भी हवन करने वाली लकड़ी कह देते तो शास्त्री जी तुरंत टोक देते, " यह साधारण लकड़ी नहीं है, समिधा है, विशेष है।" अलबत्ता उसकी विशेषता यही थी कि वह चूल्हा जलाने केे लिए नहीं पूजन के लिए इस्तेमाल हो रही थी। भला पेट-पूजा से बड़ी कौन-सी पूजा हो सकती है! पर तब उनसे शास्त्रार्थ करने की न बुद्धि थी न साहस। तब यही समझ आया कि जिस विशेषता से वेे शास्त्री कहलाते हैं, उसी विशेषता से वह समिधा कहलाती है।
अभी हाल में कहीं पढ़ा कि समिधा का धर्म हवन की आहुतियों को इष्ट तक पहुँचाना है।हवन की सार्थकता घृत एवं सामग्री से है और समिधा उसे समर्पित करने का माध्यम मात्र!! जलती समिधा है किंतु सुगंध और पवित्रता घी तथा सामग्री से आती है! अर्थात इदन्नमम के उच्चारण के साथ अग्नि को समर्पित होने वाली समिधा वास्तव में किसी की नहीं। रोचक बात तो यह है कि यद्यपि अकेली समिधा अग्नि प्रज्ज्वलित कर सकती तथापि उसका अस्तित्त्व कारण न होकर माध्यम मात्र है।
जीवन- रुपी इस यज्ञ में भी समिधा के मौन समर्पण के उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री केे होने की कहावत उसी समिधा की कहानी कहती है। मैं आपका परिचय चार ऐसी "समिधाओं" से कराना चाहती हूँ, जिन्होंने घी और सामग्री की अनुपस्थिति में स्वयं को समर्पित करके जीवन-यज्ञ संपन्न किया है। उनका परिचय चार नामों से करुंंगी। यथा,सुजाता, सुचरिता, सुलक्षणा और सुमेधा।
सुजाता ,सुचरिता और सुलक्षणा से आपका परिचय पिछले अंकों में हो चुका है।
आज मिलिए सुमेधा से
सुमेधा दो छोटे भाइयों की बड़ी बहन। पिता राज्य सरकार के कर्मचारी और माँ रूढ़िवादी धार्मिक विचारों वाली गृहिणी।एक विडम्बना थी कि रिश्तेदारी की अधिकतर लड़कियाँ अपने वैवाहिक जीवन में असन्तुष्ट थीं और उसके लिए एक ही कारण था,उनके पतियों की शराब पीने की आदत। इसलिए जब सुमेधा के लिए किसी ने एक ऐसे लड़के का रिश्ता सुझाया जो शराब तो दूर लहसुन प्याज़ तक का सेवन नहीं करता और पूजा पाठ में विशेष रुचि रखता है, तो उन्हें तो बेटी का भविष्य सुखी और संतुष्ट लगने लगा। सुमेधा ने समाज शास्त्र में एम. ए.और बी.एड. किया था,और लड़का मामूली बी.ए.। लड़का दिल्ली का था और सुमेधा छोटे शहर में पली बढ़ी।ससुराल वालों की चादरों की थोक की दुकान थी।सुनने में सुमेधा को भी रिश्ता अच्छा लगा क्योंकि उसकी रूचि व्यावसायिक परिवार में विवाह करने की थी। उसने नौकरी पेशा पिता को आर्थिक सन्तुलन बनाने की जद्दोजहद करते देखा था।
मिलने और देखने-दिखाने का दिन तय हुआ। लड़का अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ आया। क़द काठी और शक़्ल-सूरत से औसत। यूँ सुमेधा भी देखने में साधारण ही थी,किन्तु उसे लड़के के व्यक्तित्त्व में बड़े शहर के आत्मविश्वास और विचारों का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं दिखा। वे तो सुमेधा को पसंद कर गये, किन्तु सुमेधा ने पिता के सम्मुख अपना मत रख दिया कि लड़का बड़े शहर का पढ़ा-लिखा नहीं लगता।लेकिन माँ को लड़के की सरलता भा रही थी तो पिता उनके व्यावसायिक स्तर से प्रभावित थे। इन मतों के बीच उन्हें सुमेधा की दलील वज़नदार नहीं लगी,उसपर लड़के में शराब न पीने और लहसुन-प्याज़ न खाने की अतिरिक्त विशेषता तो थी ही। सुमेधा की सहेलियों ने जब सगाई के दिन उसके मंगेतर को देखा तो शरारती अंदाज़ में छेड़ते हुए कहा, जीजाजी कौन से स्कूल में पढ़ते हैं? इस पर माँ का कहना था कि सालियाँ तो छेड़छाड़ करेंगी ही,लड़के में उम्र के साथ परिपक्वता आ ही जायेगी, शरीर भी भर जायेगा।यानि कुछ कुछ मिश्रित भावनाओं की नैय्या में सवार हो सुमेधा अपने ससुराल आ गयी।
जैसा कि तयशुदा शादियों की विडंबना होती है, दम्पत्ति एक होने के बावजूद एक-दूसरे के स्वभाव, आदतों,आचार विचार इत्यादि से नितांत अपरिचित होते हैं,सुमेधा के साथ भी वही हुआ। उसने देखा कि उसका पति घर के बाकी सदस्यों से बहुत भिन्न था,इतना कि पारिवारिक मामलों में न उसको कोई महत्त्व नहीं दिया जाता न ही उसकी किसी बात को, क्योंकि उसकी विचारधारा थी ही इतनी अजीब और हास्यास्पद। वह दुकानदारी में समय देने से अधिक पूजा पाठ में लगा रहता । यही नहीं ,वह स्वयं को प्रकाण्ड पण्डित होने का भ्रम भी पाले बैठा था और उसी पाण्डित्य को बघारने में हँसी का पात्र भी बन जाता। घर पर तो उसका कोई मान-सम्मान था ही नहीं, परिचित समाज में भी सब या तो उससे बचते या मज़ाक उड़ाते। उसका न तो कोई मित्र था ना ही घर पर कोई उसे गम्भीरता से लेता था इसलिए वह सुमेधा के इर्दगिर्द रहता। परिवार में यह अलग मज़ाक का विषय बन गया।
सुमेधा के स्वप्न ढह चुके थे। अपने पति की इस दुर्दशा से समझौता करने के सिवाय कोई रास्ता था भी नहीं। व्यवसाय सांझा था और उसमें पति का सार्थक योगदान नगण्य।बाकी सदस्यों के साथ भी वह सामंजस्य बनाने में विफल रही, पर सांझे परिवार में गुज़ारा तो करना ही था।उसने एक निजी स्कूल में नौकरी कर ली। उससे वह अपने खर्चे के लिए किसी पर निर्भर नहीं रही।अपने पति के कारण ,ससुराल में वह किसी के भी साथ आत्मीयता बनाने में विफल रही। घर का हर काम करती,पर अंदाज़ निर्वाह करने का होता, उनसे अपनत्त्व का नहीं।पति व्यक्तित्त्व से मूर्ख लगता पर था निरा स्वार्थी। ज्योतिषियों के चक्कर में पड़कर वह यह भ्रम पाल बैठा कि वह दीर्घायु है, केवल शतायुषि नहीं,बल्कि दो सौ साल जीने वाला!!कोई इस बात का मज़ाक उड़ाता तो भी उसे परवाह नहीं थी।सुमेधा ने उसके अजीब व्यवहार के चलते एक मनोचिकित्सक से सलाह भी ली। उसने मानसिक असन्तुलन बताया और इलाज करने को कहा। भला पति इस सब के लिए कहाँ राज़ी होता!सुमेधा को यह सब अजीब भी लगता,बुरा भी।लेकिन पति को स्वयं से अधिक मान देने के उसके संस्कारों के चलते वह चुप रहती।लेकिन उसने अपने पति को अपने सहकर्मियों से कभी नहीं मिलवाया।इसलिए अपने सहकर्मियों के साथ उसने सामाजिक सम्बन्ध कभी नहीं रखा ताकि किसी के घर आने-जाने की आवश्यकता ही न पड़े।
शादी के चार वर्षों के भीतर उसे दो बेटे हुए। कुछ वर्षों बाद सास-ससुर भी गुज़र गये। जब पारिवारिक सम्पत्ति के विभाजन का समय आया तो अपने हिस्से से उसके पति ने एक दूसरी दुकान खरीद ली और अनुभव न होते हुए भी और जैसे उसका स्वभाव था, किसी की सलाह न मानते हुए सूखे मेवों का धंधा शुरू कर दिया। जैसा कि अपेक्षित ही था, व्यवसाय विफल रहा। परन्तु वह कुछ उपाय करने की बजाय पूजा करता रहता,इस विचार के साथ कि संघर्ष करना उसकी नियति और कर्त्तव्य है फल देना न देना भगवान की इच्छा। घर तो स्वाभाविक है सुमेधा के खर्चे पर चल रहा था। शुक्र यह कि पारिवारिक मकान का एक हिस्सा भी बँटवारे में मिल गया था, इसलिए छत की चिंता नहीं थी।
बड़ा बेटा इंजीनियरिंग करना चाहता था, उसे व्यवसाय और विशेषकर पिता के साथ कोई काम करने में लेशमात्र भी रुचि नहीं थी। किन्तु पिता ने पढ़ाई पर खर्चा करने से ये कहकर मना कर दिया कि उनकी हैसियत नहीं है।फिर घर का व्यापार उसे सम्भालना है।इस बात पर पिता और पुत्र में ठन गयी।सुमेधा ने अपनी सारी बचत बेटे की पढ़ाई पर लगा दी।वह स्कूल से लौटकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती।बड़े बेटे की इंजीनियरिंग पूरी होने से पहले छोटे बेटे के कॉलेज का भी खर्च सर पर आ गया।छोटा बेटा माँ के संघर्ष और पिता की अकर्मण्यता से इतना पीड़ित हुआ कि उसे जल्दी अपने पैरों पर खड़े होने की इच्छा थी।पढ़ाई वह उतनी ही करना चाहता था जितनी नौकरी के लिए आवश्यक हो।लेकिन वास्तविकता इतनी सरल तो नहीं थी।बीकॉम करने के बाद उसने विदेश जाकर किस्मत आज़माने की ठान ली।उसके आसपास के बहुत से लड़के जा रहे थे।इस बात के लिए पिता के तैयार होने का तो सवाल ही नहीं था। किंतु जब पिता ने विदेश गये हुए बच्चों की आर्थिक सफलता की गाथायें सुनी तो उसे पूरे परिवार का भविष्य स्वर्णिम दिखने लगा। तब तो उसे लगने लगा कि एक बार बेटा वहाँ स्थायी हो जाये तो वह भी जा सकता है।परन्तु उसके लिए भी वह पैसा खर्च करने के लिए तैयार नहीं था।सुमेधा को लगा कि यदि उसने इस बेटे की नहीं मानी तो वह उसे पक्षपात करने का उलाहना देगा।यूँ भी बच्चों के भविष्य के लिए कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती थी।
बेटे ने कनाडा में एक स्नातकोत्तर डिप्लोमा कोर्स के लिए आवेदन किया।सुमेधा ने बैंक में कर्ज़ के लिये प्रयास किया और नौकरी स्थायी थी इसलिए अपने बलबूते पर वह सफल भी हो गयी।उसका पति यही कहता रहा कि पैसे ख़र्च करके जाने की कोई ज़रूरत नहीं है, वह दुकान सम्भाले तो बेहतर होगा। इस मुद्दे पर पिता की छोटे बेटे से भी ठन गयी।बेटे ने यहाँ तक कह दिया कि पिता की कोई ज़िम्मेदारी न उठाने के कारण वे पिता कहलाने के योग्य ही नहीं है।सच भी यही था कि पिता के रूप में उसने कुछ भी नहीं किया ।बच्चों की स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक की सारी व्यवस्था सुमेधा ने ही की।स्नातक होने के साल भर के भीतर छोटा बेटा विदेश चला गया। दो वर्ष की पढ़ाई के उपरांत स्थायी होने के शुरूआती संघर्ष के बाद वहाँ का नागरिक होने की उसकी इच्छा वास्तविक होने वाली है।बड़े बेटे ने भी बंगलुरू में रहकर कुछ मित्रों के साथ अपनी निजी स्टार्टअप कम्पनी शुरू की और व्यस्त हो गया।
सुमेधा ने दोनों बेटों को पैरों पर खड़ा किया।बेटे माँ के प्रति संवेदनशील हैं।बाहर रहकर बच्चे परिपक्व हो गये।तब वे भी पिता को लेकर शर्मिंदगी महसूस करने लगे।दोनों में से कोई भी उस शहर में नहीं रहना चाहता जहाँ पिता के अजीबोगरीब व्यवहार से सभी परिचित हों।अपनी नौकरी और पति के तथाकथित व्यवसाय के कारण सुमेधा वहीं रहने के लिए विवश है।छोटा बेटा माँ को अपने साथ ले जाना चाहता है लेकिन सुमेधा जानती है कि बेटों के साथ संयुक्त परिवार में रहना कभी सम्भव नहीं हो सकता।अपने संस्कारों के चलते सुमेधा ने अपने भाग्य से यह सोचकर समझौता कर लिया है कि इस व्यक्ति और परिवार से उसकी नियति बंधी थी।उसने अपने लिए तो नियति से समझौता स्वीकार कर लिया, लेकिन अपने बच्चों के लिए कोई समझौता नहीं किया। स्वयं समिधा बनकर उसने अपने बच्चों के जीवन को सुगंधित कर दिया है।
© भारती बब्बर
Ati sundar
ReplyDeleteधन्यवाद 🙏
Deleteऐसे मिसमैच विवाह बहुत होते हैं हमारे समाज में!दुःखद😣और अत्यंत दुःखद यह कि इन बेमेल विवाहों को निभा ले जाने का सम्पूर्ण दायित्व स्त्री का☹️आपकी चारों समिधाओं के लिए👏👏👏👏
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏
DeleteBhut khub Bharati 👏👏👏👏
ReplyDeleteधन्यवाद 🙏
DeleteBahut marmik chitran hai Sumedha ka..Kitni Sumedhayen samidha ban kar aakhir kab tak samaj ki aag me jalti rahengi????
ReplyDeleteधन्यवाद नीलम, 🙏 बेटियों को शिक्षित करने के बाद भी उनके मत को महत्त्व न देना उसे अशिक्षित रखने जैसा ही है।
DeleteBahut badhia, di.
ReplyDeleteधन्यवाद मृदुला 🙏
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