तस्मै समिधाय नमः (भाग : ३...सुलक्षणा )
तस्मै समिधाय नमः (भाग : ३ सुलक्षणा )
हमारे परिवार में सनातन पद्धति के स्थान पर आर्य समाज पद्धति से हवन करने की परंपरा रही है।जब कभी भूल से भी हवन करने वाली लकड़ी कह देते तो शास्त्री जी तुरंत टोक देते, " यह साधारण लकड़ी नहीं है, समिधा है, विशेष है।" अलबत्ता उसकी विशेषता यही थी कि वह चूल्हा जलाने केे लिए नहीं पूजन के लिए इस्तेमाल हो रही थी। भला पेट-पूजा से बड़ी कौन-सी पूजा हो सकती है! पर तब उनसे शास्त्रार्थ करने की न बुद्धि थी न साहस। तब यही समझ आया कि जिस विशेषता से वेे शास्त्री कहलाते हैं, उसी विशेषता से वह समिधा कहलाती है।
अभी हाल में कहीं पढ़ा कि समिधा का धर्म हवन की आहुतियों को इष्ट तक पहुँचाना है।हवन की सार्थकता घृत एवं सामग्री से है और समिधा उसे समर्पित करने का माध्यम मात्र!! जलती समिधा है किंतु सुगंध और पवित्रता घी तथा सामग्री से आती है! अर्थात इदन्नमम के उच्चारण के साथ अग्नि को समर्पित होने वाली समिधा वास्तव में किसी की नहीं। रोचक बात तो यह है कि यद्यपि अकेली समिधा अग्नि प्रज्ज्वलित कर सकती तथापि उसका अस्तित्त्व कारण न होकर माध्यम मात्र है।
जीवन- रुपी इस यज्ञ में भी समिधा के मौन समर्पण के उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री केे होने की कहावत उसी समिधा की कहानी कहती है। मैं आपका परिचय चार ऐसी "समिधाओं" से कराना चाहती हूँ, जिन्होंने घी और सामग्री की अनुपस्थिति में स्वयं को समर्पित करके जीवन-यज्ञ संपन्न किया है। उनका परिचय चार नामों से करुंंगी। यथा,सुजाता, सुचरिता, सुलक्षणा और सुमेधा।
सुजाता और सुचरिता से आपका परिचय पिछले अंकों में हो चुका है।
आज मिलिए सुलक्षणा से
सुलक्षणा का जन्म और शिक्षा अहमदाबाद में हुई। परिवार में वह सबसे बड़ी थी,छोटी एक बहन और सबसे छोटा भाई। पिता राज्य सरकार में कार्यरत और माँ गृहिणी। मध्यम वर्गीय सुसंस्कृत गुजराती परिवार। पढ़ाई में साधारण सुलक्षणा खेलकूद में हमेशा अग्रणी रही। पूरे स्कूल में एथेलेटिक्स में उसका कोई सानी नहीं था। उसके घर की अलमारियाँ स्कूल ,ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर की विजेता ट्रॉफियों से भरी पड़ी थी। खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए उसे शहर और राज्य से बाहर भी जाना पड़ता। घर से उसे पूरा सहयोग था।
अहमदाबाद में ऐसे ही एक राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिता में उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई। वह बिहार की एथेलेटिक्स टीम का सदस्य था। प्रतियोगिता के सप्ताह भर के दौरान दोनों एक दूसरे के परस्पर निकट आ गये।समारोह के दौरान वह घर भी आया,सुलक्षणा के माता-पिता से भेंट भी की । उसका परिचय सुलक्षणा और उसके परिवार से एक फिज़िकल ट्रेनर की हैसियत से हुआ था। बातचीत और व्यवहार से वह अत्यंत सरल था। इस मुलाकात के लगभग छह महीने बाद दोनों विवाह के सूत्र में बंध गये। उससे पहले दोनों के परिजनों की आपस में भेंट भी हुई। लड़के का बड़ा भाई और मामा बाक़ायदा अहमदाबाद आकर मिले। लड़के वालों ने बताया कि वे अत्यंत साधारण स्तर के लोग हैं जो वे लगते भी थे। शादी भी कुछ पारिवारिक सदस्यों के साथ अहमदाबाद में सम्पन्न हुई।
देश के पश्चिमी छोर से सुलक्षणा की डोली पटना पहुँची।वहाँ पहुँचकर सुलक्षणा को पता लगा कि वे पटना शहर नहीं बल्कि पास के एक कस्बे में रहते हैं। लेकिन घर पहुँचने पर उसे वह तथाकथित कस्बा भी किसी गाँव से कम नहीं लगा। वह सारा माहौल सुलक्षणा के लिए बेहद अपरिचित था।पति हालाँकि उसका ध्यान रखता था। घर में जेठ,जेठानी ,सास और ससुर थे। घर और परिवार का वातावरण ग्रामीण था। सुलक्षणा के लिए उनकी बोली,रहन सहन ,व्यवहार सब नया था। चूँकि शादी में गिने-चुने लोग ही शामिल हुए थे इसलिए घर में कई दिनों तक रिश्तेदार आकर मिलते रहे।हर कोई उसे शगुन के तौर पर रुपये पकड़ा रहा था ।उनकी बातें, हँसी-मज़ाक उसे कुछ भी पल्ले न पड़ता। कभी जो वह समझती, मतलब उसके विपरीत होता।
इस तरह असमंजस में लगभग महीना बीत गया। उसका पति कभी-कभी घर से निकलता ,जल्दी ही लौट भी आता। वह इस बात का विशेष ध्यान रखता कि सुलक्षणा को बहुत देर उसके बिना न रहना पड़े। घर के बाकी सदस्यों का व्यवहार भी अच्छा था। एक दिन जेठानी से बातों में उसने जानना चाहा कि घर से पुरुषों के काम पर जाने के बाद घर में उनकी क्या गतिविधि होती है। जेठ बिहार सरकार में काम करते थे और पता चला कि वे अलग मकान लेकर रहते थे,जो सुलक्षणा के लिए नयी खबर थी। यानि पति के दफ्तर जाने के बाद उसे सास के साथ सारा दिन अकेले रहना होगा! सुलक्षणा के लिए यह खयाल थोड़ा चिंतित करने वाला था। एक तो उनसे ज़्यादा बात होती नहीं, जो होती वह भी आधी समझ नहीं आती। पर जेठानी ने आश्वस्त किया कि तुम्हारा पति साथ है तो!
और जब वह भी दफ्तर चला जायेगा तब ?
वो कहीं जाने वाला नहीं! जेठानी के हँसकर दिये इस जवाब का मतलब सुलक्षणा नहीं समझी।
बाद में उसने पति से जानना चाहा कि उसकी छुट्टी कब तक है। इस सवाल के जवाब में उसने उल्टा सवाल किया,किसी ने कुछ कहा क्या?
कुरेदने पर ,लगभग ज़िद पर अड़ने पर ही उसने बताया कि उसके पास कोई नौकरी नहीं है!
सुलक्षणा के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। तो वो फिज़िकल ट्रेनर का काम ? पति ने बताया कि वह अस्थायी तौर पर था, खेल विभाग के एक अधिकारी से दोस्ती के चलते उसने गुजरात जाने का जुगाड़ कर लिया था। पर वह चिन्ता न करे,वह जल्दी ही अपना काम शुरू करने वाला है।लेकिन सुलक्षणा के लिए यह सब जानना बेहद धक्कादायक था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसके घरवालों को पता लगा तो? ससुराल के बाकी सदस्यों ने भी यह बात छुपायी थी।
अगले दिन सुलक्षणा सास के सामने सवालों की सूची लेकर खड़ी हो गयी। बेचारी ग्रामीण सास नयी बहू के सवालों से घबरा गयी और उसने सुलक्षणा को पूरी बातें बता दी। तब सुलक्षणा को पता चला कि अहमदाबाद से लौटकर उसके पति ने शादी की ज़िद पकड़ ली। घर वालों को लगभग धमकी ही दे दी कि उसकी बेरोज़गारी के बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा। बेचारी सास तो गुजरात के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी, जब बेटे ने ज़िद पकड़ ली तो उन्होंने अपने भाई और बड़े बेटे को रिश्ते की बात करने के लिए अहमदाबाद भेज दिया। वे तो भोलेपन में अब भी यही कह रही थी कि बेटे ने कोई न कोई काम कर ही लेना है,अब तक घर जैसे चल रहा था चलता रहेगा । किन्तु यह व्यवस्था सुलक्षणा के गले नहीं उतरी। बेरोज़गार पति के साथ गृहस्थी कैसे चलेगी इस बात की चिंता के साथ-साथ उसे यह चिंता अधिक सता रही थी कि उसका पति इस विषय को लेकर गम्भीर नहीं था।
सुलक्षणा के पास शगुन में मिले कुछ रुपये थे। गिनकर देखे तो लगभग आठ-दस हजार थे। उसके बिलकुल निजी ख़र्च के लिए भी यह रकम तीन या चार महीने ही चलने वाली थी। उसके दिमाग़ से नयी दुल्हन होने का नशा काफ़ूर हो गया। उसने पहला कदम तो ये उठाया कि पति से साफ शब्दों में कह दिया कि भरण-पोषण की समस्या सुलझने से पहले वह किसी क़ीमत पर परिवार नहीं बढ़ायेगी।
धीरे-धीरे उसने आसपास कहलवाया कि वह बच्चों की ट्यूशन ले सकती है। यूँ भी वहाँ पर वही सबसे पढ़ी लिखी थी ।दूसरे प्रदेश और बड़े शहर की होने के कारण उसके पड़ोसी भी उसे प्रशंसा से देखते थे।उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए उसके पास भेजना शुरू किया।
इस बीच उसने पति पर भी काम शुरू करने का दबाव डाला। पति को केवल स्थानीय राजनीति में ही रुचि थी और वह छुटभैया नेता बनने का प्रयोजन बनाता रहता। इसी तरह दो वर्ष बीत गये। एक बार जब वह मायके गयी तो आते समय अपने सारे प्रमाणपत्र आदि ले आयी। घरवालों की प्रतिक्रिया से डरकर उसने सच छुपाये रखा। लौटकर उसने स्कूलों में आवेदन भेजना शुरू किया। सौभाग्य से उसे निकटवर्ती कस्बे में एक अर्ध-सरकारी विद्यालय में पीटी टीचर की नौकरी मिल गयी। वहाँ रहने के लिए दो कमरों का मकान भी मिल गया।
समय पर वह दो बच्चों की माँ भी बनी,एक बेटा और एक बेटी। शुरू से उसने बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया। पति का व्यवहार अच्छा तो था लेकिन रोज़गार और आत्मनिर्भरता को लेकर उसकी उदासीनता से सुलक्षणा व्यथित थी। घर सुलक्षणा के बल पर ही चलता रहा। फिर पति ने किसी के साथ मिलकर प्रॉपर्टी एजेंट का काम शुरू किया जो कुछ महीने तक चला।उस धंधे में इतनी आमदनी भी न हुई कि महीने भर घर भी चलता । सुलक्षणा को समझते देर नहीं लगी कि यह लड़ाई उसने अकेले ही लड़नी है। बच्चों की पढ़ाई उसकी प्राथमिकता बन गयी जिसके लिए उसने जी तोड़ मेहनत की। वह ट्यूशन के बच्चों के साथ अपने बच्चों को भी पढ़ाती।
सुलक्षणा को उसकी कर्मठता का उत्कृष्ट फल मिला। बेटे ने यूपीएससी की परीक्षा दी।कोचिंग के अभाव में पहली बार उत्तीर्ण न कर सका। कोचिंग की फ़ीस भरना उसके हैसियत से बाहर की बात थी। सुलक्षणा ने अपने प्रोत्साहन और सहयोग से इस कमीं को पूरा किया। तीसरे प्रयास में वह उत्तीर्ण हो गया।
बेटी के बीस वर्ष के होते ही परिवार में उसके विवाह की बात होने लगी। सुलक्षणा ने यह कहकर सबको चुप कर दिया कि वह पहले अपने पैरों पर खड़ी होगी। उसका विवाह भी तब होगा जब वह चाहे। सुलक्षणा ने उसका दाखिला पटना के अच्छे कॉलेज में कर दिया और रहने के लिए होस्टल भेज दिया। स्पष्टतः ये निर्णय लेना और उनको लागू करना सरल नहीं था।पति का न शिक्षा से अधिक वास्ता था और न वह कोई निर्णय लेने में सक्षम था। शेष परिवार सुलक्षणा के सम्मुख अपराध बोध से ग्रसित था,उनके दख़ल की गुंजाइश ही नहीं थी।
आज सुलक्षणा का बेटा राजस्व विभाग में अधिकारी बन गया है और बेटी रसायन शास्त्र में पीएचडी कर रही है ।छोटे से कस्बे में सीमित साधनों से उनका इस ऊँचाई पर पहुँचना उनके श्रम का परिचय तो देता ही है, किन्तु उससे अधिक वह उनकी माँ सुलक्षणा की विलक्षण शक्ति और प्रेरणा का परिचायक है। उसके अभाव में वे भी अपने पिता और शेष परिवार की भाँति जीवन के न्यूनतम पायदान पर ही पहुँच कर सन्तुष्ट रह गये होते। सुलक्षणा का पति आज भी स्थानीय नेताओं की शरण में छुटभैये पिछलग्गुओं की श्रेणी में घूमता है।
© भारती बब्बर
Ati sundar
ReplyDeleteधन्यवाद🙏
Deleteशाब्बाश सुलक्षणा👏👏👏
ReplyDeleteधन्यवाद🙏
DeleteVery well written, di. I really like your portrayal of women..they actually rise like phoenix.
ReplyDeleteThanks a lot Mridula 🙏
DeleteBeautifully expressed ,Bharati....The strong ,intelligent Sulakshna...salute to all brave women :Sujata, Sulochana and now Sulakshna .They epitomize bravery and determination to achieve their goal,even with their meagre resources....Waiting for Sumedha eagerly...
ReplyDeleteThanks a ton 🙏
DeleteWah Bharti di, bahut sundar 👍🤗. Nari ki vivashta aur uski anant shakti ko kitni sashakt tarike se ubhara hai aap ne 👍.
ReplyDeleteबहुत आभार नीलम 🙏🌹
DeleteBahut badhiya Bharti.Sashakt nari ka sunder varnan.👏👏
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏
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