तस्मै समिधाय नमः

 तस्मै समिधाय नमः

हमारे परिवार में सनातन पद्धति के स्थान पर आर्य समाज की पद्धति से हवन करने की परंपरा रही है।जब कभी भूल से भी हवन करने वाली लकड़ी कह देते तो शास्त्री जी तुरंत टोक देते, " यह साधारण लकड़ी नहीं है, समिधा है, विशेष है।" अलबत्ता उसकी विशेषता यही थी कि वह चूल्हा जलाने केे लिए नहीं पूजन के लिए इस्तेमाल हो रही थी। भला पेट-पूजा से बड़ी कौन-सी पूजा हो सकती है! पर तब उनसे शास्त्रार्थ करने की न बुद्धि थी न साहस। तब यही समझ आया कि जिस विशेषता से वेे शास्त्री कहलाते हैं, उसी विशेषता से वह समिधा कहलाती है। 

अभी  हाल में कहीं पढ़ा  कि समिधा का धर्म हवन की आहुतियों को इष्ट तक पहुँचाना  है।हवन की सार्थकता घृत एवं सामग्री से है और समिधा उसे समर्पित करने का माध्यम मात्र!! जलती समिधा है किंतु सुगंध और पवित्रता घी तथा सामग्री से  आती है! अर्थात इदन्नमम के उच्चारण के साथ अग्नि को समर्पित होने वाली समिधा वास्तव में किसी की नहीं। रोचक बात तो यह है कि यद्यपि अकेली समिधा अग्नि प्रज्ज्वलित कर सकती है, किंतु घी और सामग्री नहीं, तथापि उसका अस्तित्त्व कारण न होकर  माध्यम मात्र है।

जीवन- रुपी इस यज्ञ में भी समिधा के मौन समर्पण के उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री केे होने की कहावत उसी समिधा की कहानी कहती है। मैं आपका परिचय चार ऐसी ही "समिधाओं" से कराना चाहती हूँ, जिन्होंने घी और सामग्री की अनुपस्थिति में स्वयं को समर्पित करके जीवन-यज्ञ संपन्न किया है। उनका परिचय चार नामों से करुंंगी। यथा,सुजाता, सुचरिता, सुलक्षणा और सुमेधा।

आज कहानी सुजाता की... 

एक मध्यमवर्गीय सुसंस्कृत ग्रामीण परिवार में जन्मी सुजाता तीन बहनों में सबसे बड़ी थी। पिता निजी कंपनी में साधारण  पद पर कार्यरत थे।सुजाता ने केवल बारहवीं तक पढ़ाई की, क्योंकि उसके लिए रिश्ते आने लगे और उम्र के बीसवें साल में पास ही के एक गाँव में वह ब्याह दी गयी। पति भी बारहवीं पास था। उसकी किराने की दुकान थी।एक बड़ा भाई था जो शहर में रहता था। यानि घर में सिर्फ सास और वे दोनों। सुजाता हर दृष्टि से सुखी थी। एक साल बाद उसे बेटा हो गया तो जीवन जैसे भरपूर हो गया।

बेटा दो वर्ष का हुआ तब सुजाता दूसरा बच्चा चाहने लगी,एक बेटी हो जाये तो परिवार पूरा। पर पति अभी  तैयार नहीं था। दिन हँसी-खुशी कटते रहे।

वह दिन भी आम दिनों जैसा ही था। सुजाता दो दिन मायके रहकर आयी तब पति घर पर  नहीं था।दुकान भी बंद थी। उसे थोड़ी हैरानी हुई, क्योंकि माँ को वह अकेली छोड़ता नहीं था। माँ ने बताया वह अभी-अभी निकला है। रात को खाने पर वह प्रतीक्षा करती रही।जब आधी रात बीत गयी, तब वह चिंतित हो गयी। अगली दोपहर तक शहर सूचना पहुँचा दी गयी और रात को पुलिस में भी रपट दर्ज हो गयी। दिन, हफ्ते, महीने बीत गये..., सुजाता केवल सवालों से घिरी रहती। कुछ जो लोग उसे पूृछ रहे थे, कुछ  वह स्वयं से पूछ रही थी। किंतु उसके पास कोई जवाब  नहीं था। 

सुजाता ने दुकान पर बैठना शुरु कर दिया क्योंकि कोई और उपाय था ही नहीं। गाँव के लोग तो सहानुभूति दिखाते लेकिन सास और जेठ ने उसे ही कसूरवार ठहरा दिया। परिस्थिति इतनी बिगड़ गयी कि सुजाता को मायके वापस जाने के सिवा कोई चारा न था। 

पति का कोई अता-पता न लग पाने के कारण जीवन-यापन का प्रश्न मुँह बाये खड़ा था। सौभाग्य से माता-पिता पूरी  तरह बेटी के साथ थे। दोनों बहनों की भी शादी हो गयी। परंतु बेटे की पढ़ाई और लालन-पालन का मूलभूत प्रश्न तो था ही। अब सुजाता का सारा ध्यान बेटे के भविष्य पर था। वह शहर जाकर नौकरी करने पर विचार करने लगी पर पिता ने उसे भेजने से मना कर दिया। विधि का विधान कुछ और ही था। पिता की असामयिक मृत्यु हो गयी और वह माँ के साथ शहर चली गयी। 

बारहवीं पास को कौन-सी नौकरी मिलती! एक रिश्तेदार ने दया दिखाकर अपनी फॅक्टरी में काम दे दिया, परंतु यह एहसान उठाना कौन-सी आसान बात थी! फॅक्टरी के एक सहयोगी ने सलाह दी कि इससे बेहतर वह स्वयं का कोई काम शुरु करे,पर  क्या? सुजाता को अपना कम पढ़ा-लिखा होना बेहद अखर रहा था, मैंने सिवाय खाना  बनाने के सीखा ही क्या है! 

बस हो गया काम! उसके सहयोगी ने कहा और दोनों ने मिलकर टिफिन देनें का काम  शुरु किया।कुछ ही महीनों में उसने नौकरी छोड़कर पूरी तरह से स्वयं को इसी काम में झोंक दिया। काम बढ़ता गया और सुजाता ने "मम्मी जी का ढाबा" नाम से दुकान खोल दी। कुछ जरुरतमंद औरतों को काम देकर व्यवसाय बढ़ाने में जुट गयी। लेकिन इस सबके बीच जीवन का केंद्र-बिंदु उसका बेटा ही रहा, जिसके जीवन को सुगढ़ बनाने में सुजाता ने कोई क़सर नहीं छोड़ी। सुजाता ने सिद्ध किया कि उसके पास डिग्रियों की कमीं थी संस्कारों की नहीं। 

शहर के रहन-सहन को सुजाता ने ऐसा अपनाया कि ग्रामीण बाला की अपनी पहचान वह स्वयं भूल गयी।वक्त की ज़रुरत ने अंग्रेज़ी भी सीखा दी और गाड़ी चलाना भी। बेटे को भी उसने इतना मज़बूत बना दिया कि वह राष्ट्रीय सैन्य अकादमी के ज़रिये वायुसेना में पायलट बन गया और अपनी एक सहपाठिनी के साथ विवाह भी कर लिया। अपने बलबूते पर सुजाता ने जीवन यज्ञ की समस्त आहुतियाँ सफलतापूर्वक अर्पित की। 

उसे एक ही आपत्ति है, उसकी पहचान ससुराल में अपने पति की पत्नी के रूप में ही रही। उस व्यक्ति की पत्नी जिस पर अचानक गायब होने को लेकर किसी ने सवाल नहीं उठाये! पत्नी और दूधमुहें बच्चे को अधर में छोड़ कर जाने का आरोप तक नहीं लगाया किसी ने! उसके लिए वह बेटे को संसार में लाने का निमित्त मात्र ही था। इसलिए जब बेटे के विवाह के निमंत्रण-पत्र छापने की बारी आयी तो उसने अपने नाम के साथ अपनी माँ का नाम लिखा। उसका मानना है कि जिस यज्ञ की यजमान भी वह है और समिधा भी वही तो उसकी सुगन्ध और फलश्रुति में उसके नाम का क्या काम जिससे बेटे का परिचय हुआ ही नहीं। समस्त रिश्तेदार उस समारोह में शामिल हुए किन्तु किसी ने उसके लापता पति को याद नहीं किया। सुजाता ने अपने दम पर जीवन यज्ञ सम्पन्न किया जिसका सुगन्धित धुँआ उसकी आहुतियों की कथा कह रहा था। आज वह सुखी है,सन्तुष्ट है और अभी भी अपने व्यवसाय में संलग्न है। सुजाता के यज्ञ की फलश्रुति हो चुकी है, उसका बेटा अपने नाम के साथ पिता के स्थान पर माँ का नाम लगाता है। 


© भारती बब्बर


Comments

  1. Strong presentation of a strong WOMAN. Very well written Bharati ✌️

    ReplyDelete
  2. Apki har kahani,ek se badh ke ek hoti hain....Mujhe aap ki kahaniyon me jo thehrav hota hai wo achha lagta hai.

    ReplyDelete
    Replies
    1. इस सराहना के लिए बहुत धन्यवाद मृदुला 🙏

      Delete
  3. भारती जी, बडा समर्पक नं दिया आपने इस कहानी को I इस नाम से हमने एक किताब पढी हैंI
    लेखिका का नाम है साधना ताई आमटे I परम पूज्य बाबा आमटे जी की पत्नी की आत्मकहानी है यह किताब I
    आगे की कहानियां पढने की प्रतीक्षा में I

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत धन्यवाद भावना 🙏

      Delete
  4. Di, aapki kahani pad kar Munshi Premchand ji ki katha shaili yad aa gayi. Bahut hi achha likha hai. Aaj ek yagya meine bhi shuru kiya hai...aapki rachnayen padne ka.😊😍

    ReplyDelete
    Replies
    1. इतनी प्रशंसा के लिए धन्यवाद नीलम🙏 शेष रचनाओं पर तुम्हारी बेबाक़ राय का इंतज़ार है।

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

चींटियाँ

स्मृतियों के शँख

मेरी आई