मानसिकता

 मानसिकता

आजकल शाम को टहलने में बहुत आनंद आता है क्योंकि गर्मी का मौसम गुज़र चुका है और हवा में सर्दी की हल्की-सी आहट है।

कल शाम टहलते हुए एक परिचिता से भेंट हो गयी।बातचीत के दौरान पता चला कि वे दो महीने पहले दादी बनी हैं।जब मैंने थोड़े शिकायती अंदाज़ में कहा कि खुशखबरी देर से दे रही हैं आप,तो हल्के से मुस्कुराते हुए बोली,गुड़िया हुई है.... यानि गुड्डा होता तो जल्दी बताना बनता था!यही क्यों साथ शायद लड्डू भी मिल जाते !लगा हम विकास, आधुनिकता और सभ्यता का चाहे जितना चमकीला लबादा ओढ़ लें, अपनी मानसिकता में उसे ढालना अभी शेष है।इस विषय पर जितना भी लिखा-पढ़ा जाये कम है।

अक्सर लोगों को कहते सुना है कि हमारी बेटी ही हमारा बेटा है।आमतौर पर वही लोग ये कहते मिलेंगे जो मानते हैं कि बेटा होना चाहिये था,चूँकि नहीं है तो बेटी ही बेटा है।उनके मस्तिष्क में ये अंतर स्पष्ट होता है और उनका यह कहना उस मानसिकता को ढाँपने का असफल प्रयास मात्र होता है।हम तीन बहने हैं और मुझे याद नहीं आता कि कभी हमारे माता-पिता ने हमसे कहा हो कि हम उनके बेटे हैं।उन्होंने तीनों को उच्चतम शिक्षा दिलायी और यही कहा कि हम उनका गौरव हैं।बेटी को बेटा कहना उसके बेटी होने की महत्ता और गौरव को कम आँकना है।

हमारी एक और परिचित आंटी हैं।वे जब भी घर आतीं मेरी माँ से एक बार अवश्य कहती कि आपने बेटियों को बेटों की तरह पाला है।मज़े की बात ये है कि ऐसा कहने का उनका आधार रसोई में रखे माल्टोवा के डिब्बे होते जो माँ छोटी बहन को दूध में मिला कर पिलाती थी।कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके विचार से ये बेटे को देने तक तो ठीक है अलबत्ता बेटियों के लिए ये "एक्सट्रा ट्रीटमेंट" है।उनका कहना हमें हास्यास्पद भी लगता और दुःखद भी।ऐसे लोगों की मानसिकता में बेटे और बेटियों के पालन-पोषण के तरीके और मानदण्ड अलग होते हैं।

इसी श्रेणी में वे लोग भी आते हैं जो बहू को बेटी की तरह रखने का दावा करते हैं।उनका यह मत भी इसी मानसिकता का द्योतक है कि बहू को बहू की तरह रखने का तात्पर्य उसे प्रताड़ित करना है।यदि आप नहीं कर रहे तो बेटी की तरह रख रहे हैं।कोई इनसे ये पूछे कि आपने बेटी को ही बेटी होने का गौरव नहीं दिया तो बहू को क्या देंगे!सास भी प्रताड़ना दे तो सास होने को परिभाषित करती है, अन्यथा वो माँ है।

मुझे ये विषय बहुत महत्त्वपूर्ण और विचारणीय लगता है।हम स्त्री-विमर्श की बात तो करते हैं लेकिन ऐसे विमर्श का क्या अर्थ है जो स्त्री को केवल पुरूष के मुकाबले में खड़ा करने तक सीमित हो।स्त्री का स्त्रीत्व उसका मान, सम्मान और पहचान क्यों नहीं हो सकता?बेटी, बहू, सास... हर रिश्ते के लिए अलग परिभाषा क्यों???


©भारती बब्बर


Comments

  1. Well written Bharati...straight...to the point. Keep it up ✌️

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  2. हमारे देश की बहुत बड़ी समस्या है बेटी और बेटे में फर्क करने की। बिहार में तो और भी बुरी हालत है की जिनकी बेटियां हैं उन्हें पिता दादा की संपत्ति में से कुछ भी नहीं मिलता। जिन बच्चों के बेटे होते हैं वही वॉइस चलाने लायक माने जाते हैं और उन्हें सारी संपति जाती है। लड़की होना अभी भी सुख की खबर नहीं लाता

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    1. जी दुःखद परिस्थिति है.....🙏 धन्यवाद

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  3. Bilkul sahi likha abhi bhi hum ya soch nhi badlay

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  4. You are absolutely very correct Dear Bharati..! You have very well read the mind set of such people in the society...!! Infact these things are so deep rooted in the society u nd me can't change the mindset overnight..until unless we ourselves or soul realise it...!! I admire u have underlined the facts what we when we r so advanced but our thinking towards a girl child not changed...!! 👍🏼❤️

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  5. भारती जी, बिलकुल सही लिखा है आपने I दोष हमारी सामाजिकता है जो आज भी पुरुष प्रधान संस्कृती को बढावा देती है I आपकी माताजी तथा पिताजी बडेही भाग्यशाली थे क्यों की उनकी तीनोही बेटियों ने अपने निजी क्षेत्र में सफलता हासिल की I
    बढिया लिखती हैं आप, जारी रखें लिखना इसी तरह I बहोत धन्यवाद I

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    1. बहुत-बहुत आभार भावना जी,माता-पिता के संस्कारों की ही देन है....🙏

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  6. भावना जी से पूर्णतः सहमत👍ऐसी बेटियों पर गर्व होना स्वाभाविक है💫भारती को निरंतर पढ़ सकने का सौभाग्य हमें देने के लिए इस मंच का हृदय से आभार❣️ इस विषय पर गहन विचार विमर्श की आवश्यकता है,यह भेदभाव कम ज़रूर हुआ है,समाप्त होने में अनेकानेक बाधाएं हैं!नहीं है हमारा समाज ऐसा कि पुत्री के जन्म पर सभी पुत्र जन्म जैसी प्रसन्नता अनुभव कर पाएं!

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    1. बहुत बहुत आभार नीना,सहमति और समीक्षा के साथ प्रोत्साहन के लिए🙏

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  7. भारती बहुत ही सुंदर में लिखा है।

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