कितने सालों में

 कितने सालों में

बस रुकती तब तक सूर्योदय हो चुका था। यूँ सूरज की मुलायम किरणें कुछ पहले से ही  सामने की पहाड़ियों पर दिखने लगी। हमारी बस पहाड़ी के पश्चिमी तरफ वाली सड़क पर है, इसलिए सूरज के सीधे दर्शन नहीं हो सकते।किंतु सामने की पहाड़ियाँ सूरज के स्वागत की घोषणा कर चुकी हैं। दूर से पहाड़ी गाँवों का अंदाज़ा भर लग रहा है, लेकिन मेरी कल्पना बहुत कुछ देख पा रही है।कनस्तरों की बनी बालटियों में गदहरों से पानी भरती लड़कियाँ,बकरी या गाय चराते बालक...धूप के टुकड़े पर उकडूँ बैठे बीड़ी पीते पुरुष....घरों की छतों से निकलते धुएँ से चूल्हे के पास लोहे की नली से फूँक मारकर आग सुलगाती गृहिणी की कल्पना ....ये सभी चित्र मेरे मानस में सहज ही बन गये।

चायना-व्यू  पर उतरने वाली सवारी हम ही हैं। पहले दिल्ली से आते हुए बस में कोई परिचित अवश्य मिल जाता था, परंतु इस बार ऐसी अपेक्षा करना ही बेकार है। पूरे पंद्रह वर्षों बाद दोबारा रानीखेत जाने का संयोग बना है।

हम  पहले की तरह छोटे रास्ते से ही ऊपर चढ़ गये। दिन के आरंभ होने की कहीं कोई गतिविधि नहीं है। चीड़ के पेड़ भी स्तब्ध हैं, सुबह ने जैसे दस्तक दी ही है और नगर ने अभी द्वार नहीं खोले....अभी अलसा ही रहा है।चढ़ते-चढ़ते ही मॉल रोड  की झलक मिल गयी। दुकानें बंद हैं, कोई राहगीर भी नहीं, यानि पूरा सन्नाटा। पहाड़ों की शांति में भी एक संगीत होता है। चीड़ के पेड़ों के बीच हवा की सरसराहट, किसी पंछी के परों की फड़फड़ाहट, चीड़ के पेड़ से ठीठे केे गिरने की आहट या कभी किसी इक्का-दुक्का वाहन के गुज़रने की आवाज़। ये सभी एक साथ तो नहीं होते, इसलिए रह-रहकर संगीत के एक-दो स्वर छेड़़नेे की-सी अनुभूति होती है।

हमारी रहने की  व्यवस्था मेघदूत होटल में है। पहले यहाँ कमरे किराये पर लेकर स्थायी तौर पर लोग रहा करते थे, हो सकता है़ अब भी रहते हों,परंतु अब इसे व्यावसायिक रूप से होटल की तरह भी पहचाना जाने लगा है।

मॉल रोड सभी पर्वतीय स्थलों की पहचान है। रानीखेत का मॉल रोड नैनीताल, मसूरी या शिमला की तरह बड़ा या बहुत दर्शनीय कहे जाने जैसा बिल्कुल नहीं है। यहाँ की सबसे प्रमुख इमारत मेघदूत होटल की ही है। बाज़ार कहे जाने के नाम पर दैनिक आवश्यकताओं की चंद दुकानें इसी इमारत की तल मंज़िल पर हैं। तल मंज़िल यानि जो मंज़िल मॉल रोड से जुड़ती है। वैसे इमारत की एक मंज़िल मॉल रोड से नीचे भी है। वहाँ पहुँचने के लिये होटल के दोनों छोर पर सीढ़ियाँ हैं। सड़क की दूसरी ओर जैत सिंह फ्लॅट्स हैै, जिसकी दो मंज़िलें बहुत सारे परिवारों को समेटे है। इसकी भी ऊपरी मंज़िल सड़क से जुड़ी है। कुल मिलाकर रानीखेत का मॉल रोड पूरी तरह रिहायशी है।

रानीखेत में रहते हुए पर्यटक की तरह स्वयं की कल्पना कभी नहीं की, इसलिए वहाँ होटल में रहने का अनुभव कुछ अलग है। जिस स्थान की प्रतीति मानस में दिनचर्या की तरह होती हो वहाँ व्यक्ति पर्यटक हो भी कैसे सकता है़!

यह सच है कि रानीखेत की विशेषता उसकी अनुभूति में है।नैनिताल, शिमला या मसूरी की तरह मॉल रोड पर टहलते या चहलकदमी करते हुए पाॅपकाॅर्न , भुुट्टा या आइसक्रीम खाने जैसा कोई प्रलोभन रानीखेत अपने पर्यटकों को नहीं देता। चीड़ के जंगलों की नीरवता में उसकी सुगंध के साथ, सीढ़ीदार खेतों की पर्वत श्रेणी के पीछे धीरे-धीरेे नारंगी गोले को लुप्त होते देखना और देर तक उसकी  लालिमा को आत्मसात करना यदि आपके सौंदर्य-बोध का हिस्सा है, तो रानीखेत में आपका स्वागत है।

जब तक कमरे में सामान आदि रखकर तैयार होते, नगर अपनी दिनचर्या में जुट गया। मॉल रोड की दुकानें पिछले दिन के सामान के साथ खुल गयीं। शहरों की तरह यहाँ ताज़ा सामान या सब्ज़ी सवेरे नहीं आती। मेरी स्मृति में तो डबल रोटी और अख़बार भी शाम को दिल्ली से आने वाली बस से आते थे। अख़बार देने वाला बीस-पच्चीस अख़बारों का गट्ठर उठाये दूर-दूर तक पैदल घूमकर अख़बार बाँटता था। तब सबसे अधिक प्रतीक्षा साप्ताहिक 'धर्मयुग', 'पराग' और 'नंदन' की रहती थी।

सब्ज़ी की एकमात्र दुकान पप्पू की है। वह मर्दानी पोशाक वाली दबंग महिला है। कुछ दुकानें छोड़कर पहले चनन अंकल की दुकान थी, जहाँ बच्चों की लुभावनी वस्तुएँ जैसे टॉफी, बिस्किट आदि मिला करती थीं। चनन अंकल पंजाबी थे, पर पता नहीं कितने बरसों से यहाँ के होकर रह गये। उनके गुज़र जाने के बाद उनकी दुकान के स्थान पर उन्हीं के बेटे ने चाय की दुकान खोल ली। बीच में लोक संपर्क विभाग का दफ्तर था , मेघदूत होटल का रेस्तरां ,नवीन मिष्ठान्न भंडार और गुलु मियाँ की ड्राय क्लीनिंग की दुकान...यही है मॉल रोड।

मॉल रोड किसी हथेली की तरह है, जिसके सिरे से पाँच उंगलियों जैसे पाँच राहें निकलती हैैं। सीधी राह झूला देवी होते हुए चौबटिया जाती है। दाहिनी ओर नीचे जाती छोटी सड़क नाॅर्टन होटल की तरफ जाती है। नाॅर्टन होटल भी नाममात्र का होटल है जहाँ परिवार किराये पर स्थायी तौर पर रहते हैं।यही सड़क "पर्ल लाॅज" तक जाकर लगभग समाप्त हो जाती है। सीधे रास्ते की बायीं ओर चौड़ी सीढ़ीदार चढ़़ाई है । उससे बायीं ओर की चढ़़ाई वाली सड़क घूमकर इससे मिलते हुए आगे बढ़ती है,और थोड़ा आगे जाकर झूला देवी जाने वाली सड़क से मिल जाती है। मॉल रोड से ही जा रही लंबी ठण्डी सड़क घने जंगल के बीच घुमावदार मोड़ों से होकर अलसाती हुई, झूला देवी के पास मिल जाती है। अन्ततः एक होकर ये राह चौबटिया तक जाती है। पहाड़ों पर प्रायः ऊपर  नीचे की सड़कें एक सिरे पर मिल जाया करती हैं।

मैं उस अनुभव को एकाकी ही जीना चाह  रही हूँ जो मेरे मानस में निजी हैं। उसका संबंध मेरे भीतर के संसार से है। इसलिए सुबह सबके जगने से पहले ही मैं निकल जाना चाहती हूँ। मेरे साथ मेरा पालतू झबड़ा पाॅमरेनियन कुत्ता पाॅमी भी है। उसे  घुुमाने का निमित्त भी है, और उसका साथ भी। यूँ भी मुझे किसी यात्रा के दौरान रास्ते में और किसी स्थान पर पहुँचकर वहाँ की भोर देखना बहुत पसंद है। एक ही सूरज अलग-अलग परिवेश में अलग ही  आभा लिए होता है। उस स्थान विशेष की संस्कृति जैसे उसकी छटा बदल देती है।

अगली सुबह तड़के साढ़े छः बजे मैं निकल पड़ी,विगत क्षणों को एक बार फिर अनुभव करने। सूर्योदय हो चुका है परंतु धूप पहाड़ी पार करके मॉल रोड तक नहीं पहुँची । मैंने ठण्डी सड़क के साथ वाली राह पकड़ी। उसके मुहाने पर ही कोने पर सीढ़ीदार चढ़़ाई केे बीच पुलिस चौकी है। छोटे-से गोलाकार वृत्त को साफ करके, एक छोटे-से कमरे में चौकी का दफ़्तर है। चारों ओर सुंदर क्यारियों में रंग-बिरंगे फूल खिले हैं मानो चीड़ के झुरमुट के बीच  एक रंगीन झालर वाला पैबंद ! वहाँ पहुँचते ही एक गीत की पंक्ति मन में कौंधी..."ये मौसम आया है कितने सालों में..." १९७५ में जब पहली बार यहाँ आये थे,तब स्कूल आते-जाते हुए अक्सर ये गीत पुलिस चौकी में बजता था। जैसे ये तय था कि हमारे नियत समय पर ही उसने बजना है। संभवतः उसी समय नये गीतों का कार्यक्रम होता था और तब ये गीत नया था। पर इस गीत का शाश्वत संबंध मानो इस मोड़ से जुड़ गया। आज भी मैं कहीं भी रहूँ यह गीत बजते ही मेरा मानस चीड़ की सुगंध, देवदार की हवा और बाँज के पत्तों की सरसराहट की एक परिचित-सी अनुभूति के साथ रानीखेत में इसी मोड़ पर पहुँच जाता है।

चौकी पर अभी चुप्पी है। सड़क पर भी सबकुछ शांत है। पेड़ भी जैसे ऊँघ रहे हैं। पंद्रह बरस पहले भी ये पेड़ यहीं थे। तो क्या इन्हें भी गुज़रते लोगों की पहचान होती होगी! पंद्रह बरसों में पेड़ों का घनत्त्व बढ़ा ही है, इसलिए रास्ते पर पूरी छाया है। यूँ भी धूप निकलने में अभी देर है।

थोड़ी ही देर में मैं "ऑसमन थाॅर्प" बंगले के सामने हूँ। यही वह घर है जहाँ हम रानीखेत के अपने आरंभिक दिनों में रहे हैं। प्रकृति से मेरा पहला साक्षात्कार यहीं हुआ था। ढलाऊ छत, लकड़ी का फर्श, खुला दालान और सामने बड़ा-सा हरा मैदान जिसके किनारे पर बड़े-बड़े पेड़ थे,जो अब भी हैं।सामने एक बड़ा विशालकाय देवदार का पेड़ है जिसके अंडाकार पुष्प  सूख जाने पर टूटकर लकड़ी के गुलाब की तरह के हो जाते और हम उन्हें तीलियों में फंसाकर गुलदस्ते में सजा देते थे। खुबानी और आडु के पेड़ भी थे, पता नहीं अब हैं या नहीं। नाश्ते के पराँठे को चुपके-से बचाकर  खुबानी के पेड़ पर चढ़कर खाने का मज़ा कुछ और ही था।इस मैदान के बाद ढलान है जो माल रोड से आने वाली ठण्डी सड़क पर उतरती है। बगल में पानी की टंकी है, और उसके पास नौकरों व अर्दलियों के रिहायशी क्वार्टर। फिलहाल यहाँ कोई दिख तो नहीं रहा, पर चिमनी से निकल रहा धुँआ बता रहा है कि चाय की तैयारी है।

बंगलेे के आगे यह सड़क मॉल रोड से आने वाली चौड़ी सीढ़ीदार चढ़ाई के अंतिम छोर से मिल जाती है। उस छोर के किनारे बाँज का पुराना पेड़ है जिसके नीचे अंग्रेज़ी के अक्षर 'डी' के आकार का चबूतरा बना हुआ है। हमनें उसे डी-स्टाॅप का नाम दिया था। स्कूल जाते हुए बाकी साथियों की वहीं रुककर प्रतीक्षा होती थी। कोई पहले निकल जाये तो चबूतरे पर निशानी बना जाता, ताकि पीछे आने वाला न रुके। 

मैं डी-स्टॉप पर पहुँचकर ठिठक गयी हूँ। चबूतरे की हालत गुज़रे वक़्त का एहसास करा रही है। पता नहीं अब भी यह किसी के रास्ते का मील का पत्थर है या सिर्फ पेड़ के तने का सहारा मात्र रह गया है। स्टॉप पर बैठकर पुराने क्षणों को दोहराती हूँ...फ़िल्म की रील की तरह चित्र आँखों के आगे चल पड़ते हैं। दायीं ओर से जूनी चली आ रही है, उसके छोटे भाई भी साथ हैं... मेरे साथ मेरी छोटी बहन...हम दोनों ने अपने भाई बहन के बस्ते उठा रखें हैं... पीछे स्कूल के और सहपाठी हैं, सभी जूनियर, झूला देवी या चौबटिया से आने वाले... सीढ़ीदार सड़क से मॉल रोड़ की तरफ स्कूली बच्चों का हुजूम उतर रहा है और मॉल रोड़ से दफ्तरों की तरफ जाने वाले रोज के चिर-परिचित चेहरे। 

चौबटिया गार्डन में काम करने वाले कर्मचारी भी हमें रास्ते में मिलते। तब हमारी मुलाक़ात रास्ते में कहाँ होती थी उससे भी स्कूल पहुँचने के सही वक़्त का अंदाज़ा लग जाता। उनमें एक व्यक्ति विशेषतः याद है जिसका नाम हमनें हरी झंडी रखा था,क्योंकि वह रोज हरी पतलून पहनता था। कभी-कभी पतलून नीली होती। तब हम कहते, आज झंडी नीली है। हमारी बाल बुद्धि में नामकरण करने का चातुर्य तो था परंतु इतनी संवेदनशीलता नहीं थी कि हम उसकी दो पतलूनों का सम्बंध उसकी आर्थिक परिस्थिति से जोड़ पाते।

मैंने सड़क से एक पत्थर उठाकर स्टॉप पर सही का निशान बना दिया। 

सीढ़ियों से उतरकर वापस पुलिस चौकी पर पहुँच गई हूँ।चौकी पर सुबह की हलचल शुरू होने लगी है। मॉल रोड़ पर भी सुगबुगाहट है। सब्ज़ी की दुकान खोलकर पप्पू दिनचर्या शुरू कर रही है। कल उससे भेंट हो चुकी है और पिछले पन्नों को पलटकर, दिमाग़ पर ज़ोर डालकर वह पहचान भी गयी है, अब भी एक दूसरे को देखकर अभिवादन स्वरूप हम दोनों मुस्कुरा दिये। 

दोपहर को सबसे निचली सड़क पर टहलने का मन किया।इस सड़क को ठण्डी सड़क कहा जाता है। मॉल रोड़ की भाँति हर पर्वतीय नगर में ठण्डी सड़क का होना भी जैसे अनिवार्य है। प्रायः यह सड़क घने पेड़-पौधों से घिरी होती है। धूप से इनका सान्निध्य कम ही हो पाता है, इसलिए सड़क पर घनी छाँव और ठण्डापन स्वाभाविक ही है। यही इसके नामकरण की वजह भी होगी। वास्तव में यह कहीं भी पहुँचने का लम्बा और अलसाया मार्ग होता है। मुझे इस सड़क से हमेशा आँधी फ़िल्म का गीत  'इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते...' याद हो आता है। 

ठण्डी सड़क बहुत लम्बी है। इस सड़क पर ही ब्रिटिश काल के बने पुराने बंगले हैं जो अपनी बनावट और अंग्रेज़ी नामों के कारण इतिहास का कालबोध कराते हैं। हालाँकि अब उन बंगलों में पुराने बाशिंदे नहीं रहे। अधिकतरों को शहरों के व्यवसायियों ने ख़रीद लिया है जो इसे ग्रीष्मकालीन निवास के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। एस एस बी का कार्यालय होने वाला खूबसूरत बंगला " रोज़ माउन्ट" अब एक शानदार रेसॉर्ट है। वहाँ एक वयस्क महिला पेड़ की छाया में आराम कुर्सी पर अधलेटी-सी पुस्तक पढ़ती दिखी। उसका पति अपनी आँखों पर रुमाल रखकर रेडियो सुनने में तल्लीन था। तब गुलज़ार साहब का लिखा मौसम फ़िल्म का गीत याद आ गया, " दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन...." ये दम्पत्ति उस गीत को शब्दशः जीते हुए लगे।

"रोज़ माउंट" के थोड़ा आगे ही "जगाती माउंट" है जहाँ हमनें बेहतरीन छह बरस बिताये। दरअसल ठण्डी सड़क पर केवल पुराने बंगले ही हैं। उनमें से एक "द हिमालयन हाउस" है जो मिसेज़ दयाल का है। मिसेज़ दयाल रानीखेत की प्रतिष्ठित महिला रही हैं। उनके पति वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होने के बाद नेपाल में भारत के उच्चायुक्त भी रहे। उनके देहांत के बाद उनकी पत्नी यहीं बस गयी। मिसेज़ दयाल स्वयं एक विदुषी थी। वे महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित एवं सुशिक्षित ब्राह्मण परिवार की पुत्री थी। उनकी माताजी श्रीमती क्षमा पंडित संस्कृत की प्रकाण्ड विदुषी थीं। मुम्बई के मरीन ड्राइव पर उनके निवास "क्षमा भवन" को उनके मरणोपरान्त उनकी बेटी मिसेज़ दयाल ने संस्कृत साहित्य के संग्रहालय एवं पुस्तकालय का रूप दिया। अब मिसेज़ दयाल भी नहीं रही। 

"हिमालयन हाउस" के पास ही एक बंगले में सत्र न्यायालय है। वहाँ पेड़ों का घनत्त्व और झाड़ियों का झुरमुट इतना अधिक है कि धूप की एक रेखा के लिए भी वहाँ प्रवेश दुर्गम है। यूँ भी ठण्डी सड़क पर बाँज के पेड़ बहुतायत में हैं। बाँज के पेड़ों की विशेषता ये है कि इसकी जड़ें जल का संग्रहण करती हैं, इसलिए इसके आसपास आर्द्रता रहती है। उसपर धूप न होने से दिन के हर प्रहर में ठण्डी सड़क अपने नाम की सार्थकता बनाये रखती है। एक पेड़ पर बरसों से एक तख़्ती लगी है जिसपर "द सिल्वर ओक" लिखा है। बगल में एक पगडण्डी भी है। वहाँ वास्तव में इस नाम का कोई बंगला है या नहीं हमें कभी पता नहीं चला। उस वीरान पगडण्डी पर किसी को आते-जाते देखा नहीं। हम खोज करने का साहस भी न कर सके।

"जगाती माउंट" के कुछ आगे दो चार बंगले और हैं। एक डॉ  तेवतिया का है जो वनस्पति विज्ञान के शोधकर्ता थे। एकाध निजी बंगले और हैं जिनकी नारंगी और गहरी नीली छतों से ही हमारा वास्ता था, क्योंकि "चेस्टर फील्ड" जाते हुए ठण्डी सड़क से केवल उनकी छत ही हमें दिखती थी। "चेस्टर फील्ड" हमारी सखी जूनी यानि ज्योति त्रिपाठी का घर था। बेहद खूबसूरत बंगला। जूनी के माता-पिता बाग़बानी के शौकीन थे इसलिए उनके घर खूबसूरत फूलों की क्यारियाँ हमें मोहित करती। मैग्नोलिया का एक पेड़ भी उनके घर पर था। उसमें साल में शायद एक ही बार फूल खिलता था। हम साल भर उसका इंतजार करते। 

"चेस्टर फील्ड" के पास ही "फॉरेस्ट रेस्ट हाउस" है। किंतु वहाँ जाने का मुख्य द्वार ऊपरी सड़क से है। ठीक उसके बग़ल में "रिजवे" बंगला है जो एस एस बी के निदेशक का सरकारी आवास था। इन सभी बंगलों के मूल निवासी इन्हें छोड़ चुके हैं। ठण्डी सड़क पर "चेस्टर फील्ड" पहुँचकर हम वहीं से ऊपरी सड़क पर पहुँच गये। कुछ क़दम चलकर "रिजवे" का गेट आ गया और दो क़दम और चलते ही हम फिर डी-स्टॉप पहुँचकर मॉल रोड पर उतर गये।

शाम ढल चुकी है। हम टॅक्सी में हैं। दिल्ली के यातायात का शोर कानों को बींधे जा रहा है। गरमी तन को खाये जा रही है...लेकिन मैं देवदार के टूटे पुष्पों के कठगुलाब सहेजे,चीड़ की सुगंध और बाँज की शीतलता को मानस में संजोये अब भी मॉल रोड के उसी मोड़ पर खड़ी हूँ...गीत बज रहा है.... ये मौसम आया है कितने सालों में.....


© भारती बब्बर





Comments

  1. Beautifully described the Beauty of a small town also considered "Queen of Hills "by few. Thanks for the nice bloh

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    1. भारती दीदी, पढ़ते पढ़ते ऐसा लगा जैसे मै आपके साथ चल रहा हूँ।1979 में हम जगाती माउंट में साथ रहते थे। मुझे याद है कि सबसे पहले मुझे स्कूल आप और मधु दीदी ही ले गए थे।रानीखेत की यादें सच में अद्भुत हैं।

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    2. मनीष ....प्रतिक्रिया से अनुमान लगा रही हूँ कि तुम ही हो !धन्यवाद 🙏

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    3. रानीखेत क्या है ये वही जानते हैं जो वहाँ रहे !☺️

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  2. अप्रतिम भारती l मैं मॉल रोड की ओर कम ही जाता था क्यूंकि हम रानीखेत के दूसरे छोर में रहते थे पर पढ़ कर बहुत अच्छा लगा l हिन्दी में तुम्हारी पकड़ अद्भुत है
    हरीश रावत

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    1. धन्यवाद हरीश ...🙏 अब तो मॉल रोड घूम आये न ? 😄

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  3. वाह! मॉल रोड घूम आए दिल्ली बैठे बैठे। कितना वास्तविक वर्णन किया है भारती। तुम्हारा रानीखेत से लगाव बखूबी झलक रहा है।

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    1. धन्यवाद मनीषा...🙏 सचमुच रानीखेत का आकर्षण जादुई है जो चालीस साल बाद भी बरकरार है!

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  4. वाह!! क्या लिखा है। इतना सुन्दर वर्णन किया है कि लगा
    रानीखेत में ही हूं। बचपन याद आ गया। बार बार वही जाने का मन करता है। जीवन के वे स्वर्णिम वर्ष!!!

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    1. धन्यवाद, यदि मेरे शब्द पाठकों को रानीखेत ले जाने में सफल हुए तो मेरी लेखनी सार्थक हुई ☺️

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