बरगद की कोंपलें
बरगद की कोंपलें
बरगद... इस शब्द से ही इतिहास,स्थायित्त्व, गहराई और धरती से युगीन जुड़ाव का बोध होता है।किस्से-कहानियों में तो 'बूढ़ा बरगद' विशेषण प्रायः उल्लेख में आता है। हम सब के भीतर एक बरगद होता है, जिसकी जड़ें किसी सुदूर गाँव-कस्बे के छोटे-से आँगन में गहरी जुड़ी होती हैं। हम जहाँ-जहाँ जाते हैं वहाँ अपने इतिहास का टुकड़ा साथ ले जाते हैं। फिर व्यक्ति सात समंदर पार क्यों न चला जाए वहाँ भी बरगद की जड़ें अपनी मिट्टी ढूँढ़ लेती हैं।
हमारी एक पारिवारिक मित्र कोसीकलां में पली-बढ़ी। आज अमेरिका की प्रतिष्ठित डाॅक्टर हैं, पर कोसीकलां के नाममात्र से ही पुलकित होकर वहाँ की यादों की किताब खोलकर बैठ जाती हैं।हममें से कई कोसीकलां का नाम भी न जानते होंगे।वह मथुरा के निकट एक छोटा कस्बा है। अमेरिका की उच्च स्तरीय जीवन शैली कोसीकलां में गहरायी उनकी जड़ें न हिला सकीं। पच्चीस पैसे की फीस देकर गाँव में पेड़ के नीचे की हुई पढ़ाई की मीठी-सोंधी याद अमेरिकी शान पर आज भी भारी है। मन के बरगद की जड़ें देश-काल की सीमाएँ नहीं जानती।
अकसर स्वयं के मन को टटोलकर बरगद ढूँढ़ने की कोशिश की है।
"तुम कहाँ की रहने वाली हो?"
शायद चौथी कक्षा में पहली बार इस प्रश्न से पाला पड़ा था। गरमी की छुट्टियाँ होने वाली थी और सब अपने गाँव का नाम बता रहे थे, जहाँ वे जा रहे थे। मैं हर बार की तरह बंबई (तब यही नाम था) जा रही थी।मेरे इसी उत्तर के प्रत्युत्तर में मुझे यह पूछा गया था।उससे पहले पूरी कक्षा मेरे उत्तर पर ठहाका लगा चुकी थी। बंबई के साथ गाँव का संदर्भ हास्यास्पद था ही!
मेरी गरमी की छुट्टियाँ बंबई में ही बीतती थी क्योंकि वहाँ मेरा ननिहाल है। माँ का पैतृक गाँव कोंकण में है, परंतु उससे मेरा कभी संसर्ग नहीं रहा। पिता लाहौर में पले-बढ़े और विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली में बस गया। वहाँ पैतृक घर कहे जाने जैसा स्थान कभी बन न सका। विभाजन के समय पिता उन्नीस वर्ष के थे। तब जीवन-यापन के लिए नौकरी करने की विवशता में घर छोड़ना पड़ा। नौकरी भी ऐसी मिली जिसमें घाट-घाट का पानी पीना पड़ा। पर उनके मन के बरगद की जड़ें लाहौर में रहींं। अपने घर को दूसरों के हवाले करने की कटुता के बीच उस आँगन में बीते उनके बचपन की यादें उनकी आँखे नम कर जातीं। पर उस बरगद पर मेरा कोई अधिकार नहीं था। हम पर माँ का प्रभाव होना तो स्वाभाविक ही था। उनके साथ बोलचाल मराठी में होती थी और पिता के साथ हिंदी में।
मेरा जन्म दिल्ली में हुआ किंतु छह महीने बाद पिता की नौकरी उन्हें बंबई ले गयी। मैंने वहीं होश संभाला।वहाँ के स्कूल और समाज से परिचय गहराता उससे पहले रेलगाड़ी की तीन दिन लंबी यात्रा हमें ले पहुँची सुदूर बंगाल के सीमावर्ती कस्बे पानागढ़...बंबई से विलग होने का वह पहला अवसर था। बंगाल की संस्कृति से परिचय हुआ।रोशोगोला और खिचुरी प्रिय भोज बन गये। तब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की आज़ादी के संदर्भ में युद्ध के बादल भारत पर भी मंडरा रहे थे। उन्हीं परिस्थितियों में पिता का तबादला पटना हो गया। बंबई के माहौल के बाद यह दूसरा नया परिवेश था।पटना में बालपने की अपार मीठी यादें हैं। बिहारी बोली, बिहारी खान-पान, वहाँ की होली-दीवाली, सब न सिर्फ मोह गयी बल्कि हमारे स्वभाव और व्यक्तित्त्व का हिस्सा बन गयी।
इस दौरान हम हर साल गरमी की छुट्टियाँ बंबई जाकर मनाते। इस कारण हम "बंबई के" माने जाते रहे। यह बात दूसरी है कि बंबई और वहाँ के संबंधियों के लिए हमारा अस्तित्त्व प्रवासी होने का ही था। हमारे बदले हुए लहजे और खान-पान ने हमें बिहारी होने की संज्ञा दिलवा दी। अब तक ठिकुआ, मालपुए,दही चिवडा और कटहल हमारे प्रिय भोज बन चुके थे । किसी को चुप कराने के लिए बिहारी लहजे में "बअक" कहना बोलचाल का हिस्सा था। पर पटना के लिए हम बिहारी नहीं बन पाये। हमारी मातृभाषा मराठी और वार्षिक गंतव्य बंबई होने के कारण यह स्वाभाविक भी था।वस्तुतः हमारी पहचान त्रिशंकु के समान रही।
चार वर्षों बाद एक बार फिर रेल का लंबा सफर पटना से विदा लेकर हमें दिल्ली ले गया, लेकिन मंज़िल थी जालंधर। पिता इस तबादले से बहुत खुश थे, क्योंकि यह उसी पंजाब का हिस्सा था जिसे वे बरबस छोड़ आये थे।परंतु मात्र दो महीने बाद ही पदोन्नति के साथ नये तबादले के आदेश हो गये।
इस बार हमनें राह पकड़ी उत्तराखंड के छोटे से पर्वतीय स्थल रानीखेत की।
अगले छः वर्ष ज़िंदगी के सर्वाधिक प्रभावशाली वर्ष सिद्ध हुए, हालांकि इसका हमें बिलकुल अनुमान नहीं था। पहाड़ी जीवन का वह पहला अनुभव था और किशोरावस्था में होने के कारण वे अनुभव कहीं गहरी छाप छोड़ गये। रानीखेत ने मानस और हमारी वैचारिक प्रवृत्ति पर जितना प्रभाव डाला वह स्थायी सिद्ध हुआ। हिमालय और वनों का सान्निध्य मेरे लिए सृजनशील सिद्ध हुआ। बर्फीली सर्दियों में आग के पास बैठकर उपन्यास पढ़ने की रुमानियत से परिचय हुआ।उस रुमानियत को कागज़ पर उतारने की इच्छा और कोशिश ने लेखक बना दिया।स्वयं से नवीन परिचय हुआ। वहाँ की मिट्टी में जाने कौन-सी चीज़ थी जिसने मिलने वाले हर व्यक्ति, हर परिस्थिति, हर अनुभव के साथ व्यक्तित्त्व में नया आयाम जोड़ा। पहाड़ी जीवन और लोगों से परिचय घनिष्ठ और स्थायी हो गया। परंतु वहाँ रहना स्थायी न था।
छः वर्ष रानीखेत के सुरम्य वातावरण से निकलकर हम अब पहुँचे थे मेरठ की गलियों में। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में केवल सुना था। पिताजी वहाँ युवावस्था में रह चुके थे, इसलिए वहाँ उनके परिचितों की कमीं न थी। वहाँ के शैक्षणिक वातावरण से वे संतुष्ट न थे।उन्होंने मुझे काॅलेज की पढ़ाई के लिए छात्रावास भेजने का निर्णय किया।
तीन महीनों बाद मैं राजस्थान के बनस्थली विद्यापीठ में थी। हिमालय से निकलकर मेरठ की गलियों से होते हुए अब मेरा परिचय हुआ राजपूताना जीवन से।शहर से दूर,बबूल की झाड़ियोंं , ऊँटों ,रंगीन घाघरा-चोली और बोरला पहनी ग्रामीण बालाओं से वास्तविक परिचय हुआ। दालबाटी-चूरमा से प्रेम हुआ, परिधान में बंधेज और साँगानेरी छपाई की सलवार कमीज़ें शामिल हो गयी।जब तक स्नातक की परीक्षा देती, परिवार मेरठ से चण्डीगढ़ पहुँच चुका था। जालंधर के बहाने पंजाब से जो परिचय रह गया था उसकी भरपाई अब होनी थी।
चण्डीगढ़ में ही पिता के सेवानिवृत्त होने की संभावना हो गयी इसलिए अब स्थायी निवास चुनने का वक्त आ गया था। व्यक्ति ऐसे में बरगद की जड़ों के पास लौट आता है। परंतु वह संभव नहीं था। बंबई वाले कहलाये जाने के बावजूद महानगर में नये सिरे से स्थायित्त्व का प्रयत्न करना भी सरल और व्यावहारिक नहीं था। विधि का विधान जानिए, माता-पिता ने चण्डीगढ़ में ही अपना मकान बना लिया। वर्षों से हर तबादले के साथ " मुसाफ़िर हूँ यारों... " गाने वाले मेरे पिता को सन् सैंतालिस के बाद जैसे अब ठौर मिल गया।तब चण्डीगढ़ शहर के नाम पर स्वयं जड़ें तलाश रहा था। तब तक पंजाबी भी बोलचाल में शामिल हो गयी,लेकिन बंबई वाले तमगे ने साथ नहीं छोड़ा...
मेरा भाग्य मुझे एक बार फिर बंबई ले गया जो स्वयं अपनी पुरानी पहचान पाकर मुंबई बन चुका था।अबकी बार नाम के साथ उसका प्रारूप भी बदल चुका था। वहाँ स्थायी कहलाने वाले भी किसी न किसी स्तर पर प्रवासी ही थे।स्वयं मैं वर्षों से बंबई वाली कहलाने के बाद अब चण्डीगढ़ वाली थी। मेरे आसपास अलग-अलग प्रांतों से आये लोग थे,बंगाली, राजस्थानी, बिहारी, पंजाबी,पहाड़ी....और मेरे पास सब के साथ साझा करने के लिए उनके प्रांत की बातें भी थी और अनुभव भी। पंजाबी- मराठी और महाराष्ट्र से तो पारिवारिक संबंध है ही।हर प्रांत के लोगों को मैं और मुझे वे,सब अपने ही लगते। बांग्ला भाषा, साहित्य और संस्कृति से मेरी घनिष्ठता के कारण मूलतः बंगाली लेकिन मुंबई में पली-बढ़ी रीना दी से मुझे बड़ी बहन का स्नेह मिला।रानीखेत से जाकर मुंबई में बसने वाले बिष्ट जी ने मुझे दीदी बना लिया क्योंकि बकौल उनके,' आप रानीखेत के जो ठहरे!' पटना की कनक सिन्हा खुश थी कि मैं उसके शहर से इतनी परिचित हूँ। मेरी बेटी की एक सहपाठिनी ने जब मुझे अपनी माँ के साथ जयपुर की बातें करते सुना तो पूछ ही लिया, आंटी,आप राजस्थान के हो? बरबस मैंने कह दिया,मैं हिन्दुस्तान की हूँ...तब क्षणांश में यह अनुभूति हुई कि जिस बरगद की मुझे खोज थी, उसकी कोंपलें तो हर उस स्थान पर मैं स्वयं लगा आयी हूँ । यह अनुभूति किसी एक जड़ से कहीं अधिक संतोषप्रद और सुखदायी लगी.....अपने नाम को सार्थक करने की खुशी हुई वो अलग!
© भारती बब्बर
बहुत ही सुंदर लिखा है। पूरा जीवन वृतान्त !!! अति सुंदर
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद🙏
DeleteWell done Dear Bharati! You have touched your life so meticulously! Very touching indeed! You r so creative added another feather to the cap! Great thinker, great writer! Keep it up👍🏼👍🏼👍🏼👌🏻👌🏻👌🏻🙏
ReplyDeleteThanks a lot Umed 🙏
Deletevery well written rich and sensitive brief account of the past .enjoyed reading it
ReplyDeletekeep it up.
Thanks a lot🙏
DeleteBeautiful flow of thoughts very well tied in words. Reading through is like a journey which one wants to go on and on and on..............You really have class!!
ReplyDeleteThanks a lot🙏... I can't make out who's the sender... Kindly mention your name🙏
ReplyDeleteSimply superb! Bur then what's new? Keep writing, Bharati!
ReplyDeleteThanks a lot Jaya 😊🙏
Deleteभारत की भारती.... तुझे सलाम !
ReplyDeleteधन्यवाद नीना 🙏😊
Deleteरोचक।ये सवाल हमारे सामने भी आजीवन लटकता रहा कि हम कहां के हैं। हम वहां के ही नहीं होते जहाँ होते हैं। जहां के होने चाहिए वहाँ हम होते नहीं।
ReplyDeleteसही कहा आपने सूरज जी... 🙏 धन्यवाद
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