हमसफ़र मेरे हमसफ़र
यात्रा.... जीवन की एक शब्द में दी जाने वाली परिभाषा। किंतु प्रेम के अनबूझे ढ़ाई अक्षरों की तरह यह शब्द भी मुझे गूढ़ और रोमांचक लगता है। यह जीवन हमारी चिरंतन यात्रा का एक भाग है ही, इस जीवन यात्रा में होने वाली अनेकानेक भौतिक यात्राओं के अनुभव उनकी स्मृतियों को चिरंतन बना देते हैं।मेरे वे अनुभव एकाकी नहीं हैं, उसमें एक बड़ा समावेश मेरे उन सह यात्रियों का है जो किसी निजी परिचय के अभाव में भी मेरे जीवन का हिस्सा बन गये।
यात्रा करना मेरे जीवन का अविभाज्य अंग रहा है और मुझे यात्रा के दौरान गंतव्य की प्रतीक्षा कभी नहीं रही। कहीं पहुँचने की जल्दी या प्रतीक्षा यात्रा के आनंद और महत्त्व दोनों को घटा देती है।यात्रा की महत्ता उसकी निरंतरता में ही है। इस प्रक्रिया में यात्रा का परिवेश अत्यधिक प्रभावी होता है क्योंकि जीवन यात्रा के उस कालखंड की अमरता उस पर ही निर्भर है। यही कारण है कि जब भी किसी यात्रा का अनुभव याद करुँ तो जैसे वह मन में सजीव हो उठता है। लेकिन कभी-कभी उसकी याद सिर्फ उस सहयात्री के कारण भी रह जाती है जिसका परिचय इतना ही रहा कि उस यात्रा में वह साझेदार रहा है। मेरी स्मृति में ऐसे सह यात्रियों की लंबी सूची है जो जाने अनजाने मेरे जीवन का हिस्सा बन गये और कई मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक भी रहे। यात्रा की सीमित अवधि में स्मृति चिह्न छोड़ देने के इस विशेषता ने मानव स्वभाव की सुंदरता से मेरा परिचय कराया और गाहे-बगाहे हुए कटु अनुभवों के बीच नया विश्वास भी जगाया। यात्रा की सीमा और दोबारा न मिलने की संभावना में हम जिस व्यवहार का परिचय देते है, जीवन के साथ भी उसी सीमित अवधि और अनिश्चितता को याद रखें तो हमारे स्वभाव और व्यवहार दोनों में सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है।
मानस पटल पर अपने देश के मानचित्र की छवि है, कई शहरों को आपस में जोड़ती काल्पनिक रेखाएँ हैं जो वास्तविक यात्राओं को दर्शाती हैं।
पटना जंक्शन का प्लेटफॉर्म ... साल १९७१...मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी के द्वितीय श्रेणी का डिब्बा... एक गर्भवती महिला अपनी दो नन्हीं बेटियों के साथ बैठी है। उन्हें छोड़ने आया उसका पति प्लेटफॉर्म पर खड़ा है। ऐसी अवस्था में पति के बिना इतना लंबा सफ़र तय करने के ख़याल से वह आशंकित भी है। पापा को छोड़कर जाने की कल्पना बच्चों को भी डरा रही है। तभी बगल वाली सीटों पर दो आदमी आकर बैठ गये। प्लेटफॉर्म पर खड़े व्यक्ति ने उनसे कहा, आप भी बंबई जा रहे हैं? हाँ मे उत्तर मिलने पर कहा, इनका ज़रा ध्यान रखना... दोनों सह यात्रियों ने मुस्कुराहट के साथ आश्वासन दिया, आप बिल्कुल फिक़्र मत कीजिये। संचार व्यवस्था की तत्कालीन परिस्थिति में कम से कम सप्ताह भर तक कुशलता की सूचना मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। चार शब्दों के इस आश्वासन पर सहज विश्वास के साथ परस्पर संबंध जुड़ गया। संबंध की नींव केवल यही शब्द थे जिनके भरोसे पति-पत्नी आश्वस्त हो गये।
दो दिन और दो रातों की वह यात्रा मेरी प्रारंभिक स्मृतियों का सुंदर भाग है। वे दोनों व्यक्ति भाई थे,गुजराती थे और बंबई के स्थायी निवासी। मेरी माँ के साथ उनका भाई-सा रिश्ता बन गया। उस दौरान उन्होंने इलाहाबाद में अमरूद की टोकरी भेंट ले दी और इटारसी में मुझे एक खिलौना। मेरी माँ को उस अवस्था में पानी के लिए भी अपनी सीट से उठना नहीं पड़ा। मुंबई पहुँच कर देखा कि हमें लेने के लिए मामाजी अभी पहुँचे नहीं थे। ऐसे में हमारा सामान उतार कर वे तब तक खड़े रहे जब तक उन्हें हमारी सुरक्षा का भरोसा नहीं हो गया। टाटा बाय-बाय कहकर,ह्रदय से उनका आभार मानकर हमनें विदाई ली अवश्य ,पर वास्तव में हमारे जीवन से वे कभी विदा न हो सके। आजतक वे यादों का हिस्सा हैं। उनका परिचय न नाम है न कोई पता... वे कबाड़ी का व्यवसाय करते थे और विशाल चरित्र के परिचायक थे।
१९८७...मुंबई से अंबाला .... पश्चिम एक्सप्रेस... मैं अपनी माँ के साथ थी। माँ से थोड़ी बड़ी उम्र की एक महिला अकेले सफ़र कर रही थी।दोनों महिलाओं में बातचीत का अनवरत सिलसिला चलता रहा। विषय स्वाभाविक है घर-परिवार ही था। वह शायद अग्रवाल परिवार से थी और उनके पास नमकीनों का बढ़िया संग्रह था जिसका आनंद उठाने का अधिकार हम प्राप्त कर चुके थे।
हमें अंबाला उतरना था, और संभवतः उन्हें भी। गाड़ी दिल्ली में घण्टा भर रुकती थी। उस महिला के बेटे का हाल ही में विवाह हुआ था और वह दिल्ली में ही रहता था। उन्हें उससे मिलने की उम्मीद थी।तब मोबाईल का आविष्कार तो हुआ नहीं था, अतः पत्राचार के माध्यम से केवल सूचना थी कि वे यात्रा कर रहीं हैं। उनके हर्ष की सीमा न रही जब उनका बेटा सपत्नी पहले ही प्लेटफॉर्म पर हाज़िर मिला। डिब्बे के सामने ही एक बेंच पर सब बैठ गये। उन्होंने मेरी माँ को भी बुलाया और अपनी बहू से रिश्तेदार की तरह ही परिचय कराया। बस फिर क्या, एक संस्कारी वधू की तरह उसने झुककर माँ के चरण छुए। परिवार की तरह तीनों बतियाती रहीं। जब गाड़ी चलने का समय हुआ और विदाई की घड़ी आयी, वधू ने झुककर दोनों को पुनः प्रणाम किया। लेकिन इस बार मेरी माँ ने सुहाग के आशीर्वाद के साथ ग्यारह रुपये शगुन के रूप में उसकी हथेली पर रख दिये।दिल्ली से अंबाला की यात्रा और भी घनिष्ठता में बीती। गले मिलकर परस्पर विदाई हुई, मुझे भी ढेरों आशीर्वाद मिले और संबंध का एक नया अनुभव लिए हम वहाँ से चण्डीगढ़ की बस में बैठ गये। उस सवा दिन के रिश्ते को मैं कोई नाम नहीं दे सकती...
१९८८,फ्रंटियर मेल का एसी प्रथम श्रेणी का डिब्बा... एक बार फिर मुंबई से अंबाला। मैं अपनी बड़ी बहन के साथ थी, साथ में बहुत सारा सामान भी। डिब्बे में गिने-चुने लोग देखकर हम दोनों आशंकित थे। सौभाग्य से हमारी बगल की सीटों पर दो महिलाओं के साथ एक सज्जन आकर बैठ गये। वे तीनों लगातार किसी पारिवारिक विषय पर टीका टिप्पणी किये जा रहे थे जिसका केंद्रीय पात्र कोई चौथा था। जब पता चला कि हमारे साथ कोई और नहीं है,वे सज्जन तुरंत मुखिया की भूमिका में आ गये।उन्हें राजस्थान के महावीर जी उतरकर कहीं आगे जाना था इसलिए वे अपने साथ ढेर सारे ठेपले लेकर आए थे जो हमनें भी खाये। वे आधे सफर तक ही हमारे साथ थे।हमसे वे बतियाते रहे, मुंबई में कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं आदि पूछते रहे। जैसे ही पता लगा कि मेरी बहन मुंबई में नौकरी करती है,उन्होंने बटुए से अपना कार्ड निकाल कर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, कभी कोई जरुरत हो तो आ जाना। उनका नाम तो मुझे याद नहीं पर पता पेडर रोड का था इतना अब भी याद है। उतरने से पहले उन्होंने ठेपले का डिब्बा हमें ये कहते हुए थमा दिया कि तुम्हें अभी काफी सफर करना है, खा लेना, एसी कोच में कोई बेचने वाला आता नहीं, तुम दोनों का काम चल जायेगा...और वाक़ई चल भी गया। अलबत्ता आगे के सफर में उन्होंने कैसे काम चलाया ये हम कभी जान नहीं पाये...
२००७,हुसैन सागर एक्सप्रेस, हैदराबाद से मुंबई। मैं अपनी आठ वर्षीय बेटी के साथ थी। सामने वाली सीट पर बुर्क़ा पहनी हुई महिला अपनी बेटी के साथ थी जो लगभग मेरी बेटी की हमउम्र थी। मेरी साथ की सीट पर मेरी उम्र की महिला थी जो दक्षिण भारतीय लग रही थी। गाड़ी चलने से पहले ही मेरी छोटी बहन ने प्लेटफॉर्म से एक पुस्तक खरीदकर मुझे दी।पुस्तक के बहाने ही बातचीत का सिलसिला चल पड़ा। मेरी बगल वाली महिला पढ़ने की बेहद शौकीन थी इसलिए विषय पुस्तकें ही थी। उस महिला का नाम था माला पाण्डे। वह केरल में गुरुवायूर की रहने वाली थी पर हैदराबाद में ही पली-बढ़ी थी।विवाह हैदराबाद में पले-बढ़े उत्तर भारतीय से हुआ था।हिंदी पर उनकी पकड़ अच्छी थी ।मुस्लिम महिला ईरान से थी और बहुत हँसमुख स्वभाव की थी। हम तीनों का और हमारी बेटियों का समय मज़े में कटा। रात के खाने के लिए बहन ने आलू की सब्ज़ी और पराँठेे दिये थे। उस मुस्लिम बच्ची को वे इतना पसंद आए कि उसने अपना खाना खाने से मना कर दिया। उसकी माँ इस बात पर चिंतित हो गयी कि कहीं वह गोश्त छोड़कर आलू न खाने लग पड़े! तब पहली बार पता चला कि उनके समुदाय में मांसाहारी होना धार्मिक अनिवार्यता है । यही नहीं, वर्ष में एक बार ऊँट का मांस खाना एक अनुष्ठान है! माला पहली बार मुंबई जा रही थी और उसके पास मोबाईल न होने के कारण उसने मेरे फोन से ही अपने रिश्तेदार से संपर्क किया।एक दूसरे के फोन नंबरों का आदानप्रदान और मिलने के आश्वासन के साथ हमनें विदा ली। लगभग दो वर्ष तक हमारा संपर्क रहा।अगली बार हैदराबाद जाने पर उसके घर भी जाना हुआ। माला ने दही-वड़े खिलाये और एक डिब्बा भरकर घरवालोंं के लिए भी दिया। उसके पढ़ने के शौक के चलते मैं उसके लिए भेंंटस्वरुप एक पुस्तक ले गयी थी। मुझे तुम्हारी पुस्तक पढ़ने का मन है, वो कब दोगी... माला का आग्रह था। अगली बार... मैंने कहा।अगले साल माला का घर बदल गया और मेरा फोन नंबर।उसके लिए मेरी पुस्तक अब तक मेरे पास ही है...
२०१७...मुंंबई की लोकल ट्रेन।मेरी बेटी की NEET की परीक्षा के बाद चर्चगेट से बोरिवली लोकल पकड़नी थी। स्टेशन तक पहुँचानेे वाले टॅक्सी ड्रायवर ने उतरते समय कहा,आप निश्चिंत रहिये, आप जिस काम से आये हैं वो होगा ही, ये ब्राह्मण की ज़ुबान है।उसके शब्दों को आशीर्वाद की तरह स्वीकार कर हम बढ़ गये।
लोकल के लेडीज़ डिब्बे में हमेशा की तरह भीड़ थी, पर हमें सीट मिल ही गयी। दादर पर भीड़ का एक रेला और जुड़ गया। सीटों के बीच लोग खड़े हो गये। एक २७-२८ वर्ष की युवती गोद में ९-१० महीने की बच्ची को थामे, दूसरे कंधे पर थैला संभाले हमारी सीटों के बीच खड़ी हो गयी। स्वाभाविक है उसे चलती गाड़ी में संतुलन बनाये रखना कठिन था। मैंने उसे बच्ची को मेरी गोद में देने के लिए कहा तो उसने सहर्ष उसे मुझे थमा दिया। वह बच्ची भी सहज मेरी गोद में बैठ गयी।उस बच्ची का नाम अनन्या था। दो-तीन स्टेशन के बाद उसे मेरे साथ ही जगह मिल गयी।वह काफी मिलनसार थी।अनन्या के बहाने बातचीत के विविध विषय मिल रहे थे।उसे मेरी बेटी की परीक्षा का पता चला तो वह थैले में कु़छ टटोलने लगी। फिर मुझे एक लिफाफा थमा दिया। वह सिद्धिविनायक का प्रसाद था।आपकी बेटी ज़रूर डाॅक्टर बनेगी देखना, गणपती बाप्पा का आशीर्वाद रहेगा। मधुर स्मित के साथ हमनें विदा ली और उतर गये। उतरते ही बेटी ने कहा कि हमनें उनका नंबर लेना चाहिये था! किंतु आधे घण्टे की वह भेंट किस प्रारब्ध का परिणाम थी, ईश्वर जाने!! मेरी बेटी मेडिकल के चौथे वर्ष में है...
२०२०, हज़रत निज़ामुद्दीन से मुंबई... अगस्त क्रांति एक्सप्रेस... हमारे साथ एक मुस्लिम दम्पत्ति थे। दोनों चेहरे से ही मिलनसार लगते थे। स्टेशन से ट्रेन छूटते ही मौसम और भारतीय रेल के बहाने हमारी बातचीत शुरु हो गयी। वे यूनानी दवा बनाने वाली किसी कंपनी में कार्यरत थे और मुंबई एक सेमिनार के सिलसिले में जा रहे थे। पत्नी पहली बार मुंबई घूमने के बहाने साथ थीं।वे सज्जन बिलकुल अनौपचारिक तरीके से बतियाते हुए हमारे साथ नमकीनों का आनंद ले रहे थे। इस दौरान वे मेरे हाथों में होने वाले कंपन को भाँप रहे थे। पुरुष वर्ग राजनैतिक विषय की टिप्पणी में व्यस्त था और मैं और उनकी पत्नी, जिसका नाम फरज़ाना था, बच्चों और मुंबई के दर्शनीय स्थानों के बारे में बातें करते रहे। उन्होंने रात के लिए खाने का ऑर्डर दिया तो बात रेल्वे के स्तर की चल पड़ी।हमनें अपने कुछ बुरे अनुभव बताये तो वे हँसते हुए बोले, आप हमें डरा रहे हैं!
आप जानती हैं, आप में मॅग्नेटिज़्म ज़्यादा है....वे मुझसे कह रहे थे।आप अपने दिमाग़ से बिलकुल निकाल दें कि आपको कोई तकलीफ़ है...आप सबकुछ कर सकती हैं...मैं उनके अचानक इस तरह बोलने से चौंक गयी। पर वे मेरी गतिविधि पर नज़र रखे हुए थे, ये मैं अनुभव कर रही थी।
आप ख़ुद को कभी बेचारा न समझें, आप बिलकुल ठीक हो जायेंगी। बस भरोसा रखें... उनके स्वर और लहजे में विश्वसनीयता और आत्मीयता थी। रात को खाना खाने के बाद साथ मिली वॅनीला आइस्क्रीम मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले, ये तो आप खा सकती हैं , रेलवे की नहीं है। मेरे मना करने को उन्होंने बिलकुल गंभीरता से नहीं लिया। बाद में पत्नी के हिस्से में से जब उन्हें खाते देखा तो मैंने शिकायत करते हुए कहा, ये क्या भाई साहब, आप कह रहे थे आप नहीं खाते, अब मेरी वजह से भाभी जी को भी कम मिली। इस पर बोले, आप एक ही बार में मुझे भाई भी कह रही हैं और ये बात भी! ये आप ही के नाम की है... मैं निरुत्तर हो गयी।
सोने के लिए मुझे मिडिल बर्थ पर चढ़ने की कोशिश करते देखकर वे कुछ बोलते उससे पहले मैं बोल पड़ी, आपने कहा न, मैं सबकुछ कर सकती हूँ...
बिलकुल! वे बोले और मैं चढ़ गयी। वे प्रशंसा में मुस्कुरा दिये। हमनें पहले उतरना था। उन्होंने मुझे शुभकामनाएँ दी। मैंने भी कहा, भाई साहब जब ठीक हो जाऊंगी आप को याद ज़रूर करुंगी... उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा, मेरी दुआएँ रहेंगी...
इस तरह बिन माँगी दुआओं ने जीवन में कितने काम सँवारे होंगे! हर यात्रा ने नये अनुभव जोड़े हैं और हर बार मैंने ईश्वर को इस संयोग के लिए धन्यवाद कहा है। जीवन में कुछ रिश्ते जन्म के साथ आते हैं,कुछ हम बाद में बनाते हैं।इन सब के अलावा कुछ रिश्ते अनायास बन जाते हैं। सफ़र में बनने वाले ये रिश्ते फूलों की तरह भले ही कुछ ही देर दिखते हों पर उनकी महक फूलों के इत्र की तरह जीवन भर साथ रहती है....
© भारती बब्बर
Bharati, as usual a wonderful post. It really resonates with me. I, too, have had these memorable encounters; fond memories of the Indian Railways.
ReplyDeleteThanks a lot Jaya...I guess all those who moved frequently can relate to it
Deleteशुक्रिया भारती!तुम्हारी रचनाओं को निरंतर पढ़ने की मेरी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए😊जारी रखना👍💐
ReplyDeleteधन्यवाद नीना, तुम जैसी सखियों का स्नेह व प्रोत्साहन मिलता रहा तो आशा कर सकती हो... 😊
DeleteBhut badhiya yatra aur yade. Aaise hi aur apne experience share karna.
ReplyDeleteSmita Sharma
Thankyou Smita 😊
DeleteHow do you remember so many train journeys. Most if us have had such experiences but to put them together so beautifully, hats off again.
ReplyDeleteThankyou.... How can one forget such beautiful encounters! 😊
Deleteअति सुन्दर। बहुत अच्छा लिखा है, हमेशा की तरह। ऐसे ही लिखती रहो
ReplyDeleteधन्यवाद भाग्यश्री, प्रतिक्रियाओं से प्रोत्साहित होकर लिखती रहूंगी 😊
Deleteअति सुन्दर। बहुत अच्छा लिखा है, हमेशा की तरह। ऐसे ही लिखती रहो
ReplyDeleteBahut achcha likha hai ....aisse hi or likhna.....I am proud to have such a talented friend....
ReplyDeleteधन्यवाद 🙏
DeletePadhne mai bahut aana f aaya...bahut sunder anubhutiyan hain...
ReplyDeleteMeeta
This comment has been removed by the author.
Deleteधन्यवाद मीता 🙏
DeleteExcellent Dear Bharati...!!!! You have touched emotions of life of human being!! U r sooooo creative and active! God bless you! Keep on writing..! Regards 🌹
ReplyDeleteBhut khub Bharati 👏👏👏👏👏👏👏
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