बुधई
बुधई
मेरी लिखने-पढ़ने वाली मेज़ पर रखे क़लमदान में एक हरा पंख सजा है। प्राचीन नाटकों और ऐतिहासिक रचनाओं में कवियों को पक्षियों के सुंदर पंखों से काव्य रचनाओं की सृष्टि करते, राजाओं को ताड़पत्रों पर पंखों से राज-संदेश लिखते और वियोगिनी नायिकाओं को अपने प्रियतम को पंखों से प्रेम संदेश लिखते पढ़ा-सुना है। मेरी मेज़ पर रखा यह एकाकी पंख इनमें से कोई उद्देश्य सार्थक नहीं करता।
उसे हाथ में लेकर सहलाती हूँ तो सोचती हूँ सुदूर आकाश के वक्ष में किल्लोल करता बुधई मेरे स्पर्श का अनुभव करता हो! उसकी नन्हीं-सी देह में मेरी इस सहलाहट से स्पंदन होता हो! आकाश में मुक्त विचरण कर रहे असंख्य पक्षियों के समूह का एक हिस्सा बना बुधई अपने उस नन्हें से पंख से मेरी मेज़ और मेरे मानस पर अपना स्थान बना चुका है।
पशुओं के प्रति मेरे प्यार के चलते मेरे परिचित मुझे पालतू कुत्ते रखने में पारंगत समझते हैं। लेकिन यह तब की बात है जब पशु-पक्षी पालने के संदर्भ में मेरा अनुभव शून्य था। तब नन्हें-नन्हें पिल्लों या रंगबिरंगी मुनिया को देखकर ममता से उन्हें पालने की इच्छा अनेक बार होती, परंतु हर बार उनके उन्मुक्त जीवन में ममता का बंधन न डालने के मेरे विचार ने मेरी उस इच्छा पर अपना वर्चस्व बनाये रखा। इसलिए उस दिन एक छोटे से दमघोंटू पिंजरे में रखे तोते को लेकर मैं माँ के घर गयी तो घर के बाकी सदस्यों को ही नहीं स्वयं मुझे भी आश्चर्य हुआ था।
घर-परिवार में सुनती आयी हूँ कि कोई किसी के हिस्से का नहीं खाता, हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। हम जो कुछ दूसरों से लेते-देते हैं वो हमारे पूर्व जन्म के ऋण हैं। धन्य हैं हमारे हिंदू संस्कार जो हर लाभ-हानि की स्थिति को ऋणानुबंध की संज्ञा देकर सहने की क्षमता प्रदान करते हैं।संभवतः बुधई के साथ मेरा वह एकदिवसीय सान्निध्य भी पूर्व जन्म के किसी ऋण का भुगतान था।
बुधई को मैंने माँ के पास जाते हुए सड़क के किनारे एक बहेलिए से महज बीस रुपये में खरीदा था। उस अबोध प्राणी का मूल्य उस पिंजरे सहित केवल बीस रुपये !वह बीस रुपये वाले तोतों के झुण्ड में नीचे कहीं दबा पड़ा था। एक श्रेणी और थी, जिसे बहेलिए ने अपने मापदंड के अनुसार श्रेष्ठता प्रदान की थी। उस श्रेणी की क़ीमत 'बुधई नुमा' तोतों से दुगुनी यानि चालीस रुपये थी। मैंने अपने लिए पहले उस श्रेणी का ही तोता चुना था, लेकिन उसके पिंजरे को छूते ही वह आक्रांत स्वर में कुछ यूँ चीखा मानो मुक्त कण्ठ से विरोध कर रहा हो।
तभी पास खड़े कुछ लोगों में से किसी ने उनमें से एक छोटे-से तोते की ओर संकेत करते हुए कहा - इसे ले जाइए, बच्चा है, जल्दी बोलना सीख लेगा।
वह सचमुच शांत मालूम होता था। उसका पिंजरा उठाने पर भी उसकी ओर से कोई विरोध नहीं हुआ। मुझे आशंका हुई तो पूछ ही लिया - भैय्या ये बोलेगा भी?
बहेलिए ने कहा - बोलेगा जी, चटर-चटर बोलेगा।
- पर ये तो ऐसे चुप है जैसे गूंगा हो!
दो मनमौजी लड़कों ने दोनों श्रेणी के तोते खरीदे थे। उनमें से एक बोला, बीस रुपये का है ना, इसलिए चुप है!
'बीस रुपये वाला' की संज्ञा के साथ मैं उसे अपने मायके ले आयी। घर पहुँचते ही उसके आवभगत की तैयारी शुरु हो गयी।मेरी छोटी बहन ने रसोई से सबसे नन्हीं कटोरी में पानी भरकर उसके 'घर ' में रख दी।
तब तक कोई उसे गंगाराम, कोई छोटू, कोई मिट्ठू , और माँ तो उसे शोनू कहकर बुला रही थी। संभवतः अपने तीनों कन्याओं के कारण किसी को पुत्रवत् स्नेह देने का अवसर न मिल पाने की कमीं को वे यहाँ पूरा कर लेना चाहती थी। भारतीय परिवारों में अकसर पुत्रों को माँएं लाड़ से मेरा राजा, मेरा बबलू और मेरा शोनू कहकर पुकारती हैं। माँ मेरी छोटी बहन को उसके छुटपन में मेरा नंदु या मेरा गौतम पुकारकर अपना चाव पूरा करती थी। अपने दामादों को पुत्रवत् मानते हुए भी वे लाड़ करने की अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पायी। पक्षी का ही सही, एक पुल्लिंग शिशु को घर में पाकर उनका चाव पूरा हो रहा था!!
जीजा-साली की पारंपरिक छेड़छाड़ को जारी रखते हुए मेरे पति ने उसे मेरी छोटी बहन का नाम दे दिया...तर्क ये कि इस बहाने नाम बार-बार होठों पर तो होगा! बाहरहाल, उसके आतिथ्य के साथ नामकरण जारी रहा।
माँ ने उसे हरी मिर्च खिलायी, इडली खिलायी, पर तोते राम थे कि कुछ छूते ही नहीं थे। उस कोठरीनुमा पिंजरे में वह ऊपर-नीचे होकर ऐसी कलाबाज़ी कर रहा था जैसे सर्कस या मेले में कलाबाज़ मौत के कुएँ में मोटरसाइकल चलाते हैं। अपनी कलाबाज़ियों से थककर उसकी देह जब चटखने लगी तो जनाब ने प्रस्तुत व्यंजनों को चखा, सिर्फ चखा,खाया नहीं। परंतु अब तक उसने अपने मधुरकण्ठ की वाणी से हमें प्रफुल्लित नहीं किया था।
मुझे आशंका हुई,कहीं सच में गूंगा न हो! पक्षी और गूंगा...मन में टीस हुई, एक पक्षी , वह भी गूंगा , उस पर उसे कैद कर लिया जाये तो उसके जीवन में क्या शेष रहा? पक्षियों के जीवन में चहचहाने और असीम क्षितिज पर पंख फैलाकर निर्बाध विचरण करने के अतिरिक्त क्या होता है!
मैंने उसका पिंजरा बालकनी में टाँग दिया। पवन के मंद-मंद झोंकों से पिंजरा हिलता तो वह भी हिलोरे लेता। तभी अकस्मात् उसकी आवाज़ आयी... पर वह कुहुक नहीं थी, वेदना भरी पुकार थी वह... बस उसके बाद फिर मौन... सामने नीलगिरी के पेड़ पर संध्या के समय अक्सर तोते, कबूतर और कुछ अन्य पंछियों का सामूहिक सम्मेलन होता था। उनके कलरव से आक्रांत होकर ही उसका आहत स्वर निकला होगा!
'यह तो बेचारा बुधई है' -मेरी बहन ने कहा। बुधई यानि डॉ राही मासूम रज़ा की अंतिम कृति "नीम का पेड़" का वह बेचारा बंधुआ ग़ुलाम बुधिराम जिसका अस्तित्व शोषित समाज में बुधिराम से सिमटकर बुधई रह गया था। जो अपने पर किये जा रहे शोषण से पीड़ित था और बंधुआ मजदूर रखने वाली उस दमघोंटू परंपरा को तोड़कर निकलना चाहता था... पर चुप था, क्योंकि अपने से बलवान सत्ता के समक्ष मुँह खोलने से भी डरता था। बुधई केवल एक चरित्र नहीं, उस सारी व्यवस्था से आहत वर्ग का प्रतीक बन गया। प्रकारांतर में उसी व्यवस्था की बलि चढ़ रहा था बेचारा निरीह पक्षी जो उस क़ैद से छूटने को आतुर था, किंतु असहाय और विवश भी।
उसका नामकरण स्थायी हो ही गया। एक नीम के पेड़ का मालिक बनकर ज़मींदार बनने का स्वप्न देखने वाला वह बंधुआ मजदूर बुधई, आकाश की नीलिमा में अपना टुकड़ा पाने के स्वप्न देखने वाला बुधई बनकर मेरे पास पड़ा था। उसकी नारंगी आँखों में करुणा थी और बालकनी से बाहर झाँकते आकाश के नीले टुकड़े की आभा भी। कितना विवश और लाचार महसूस कर रहा होगा वह! मैं सीटी मारकर उसे बुलाती तो वह निरीह आँखों से मानों कह रहा हो
"आज अपने स्वप्न को मैं सच बनाना चाहता हूँ,
दूर की उस कल्पना के पास जाना चाहता हूँ..."
पिंजरे की सींखचों पर रगड़ खाने से उसके परों के नन्हें हरे रुई जैसे टुकड़े चिपक गये थे। वह पिंजरा था ही इतना छोटा। बहेलिए पक्षियों को सजावट की एक निर्जीव वस्तु समझकर बेचते हैं। इसलिए जहाँ तक संभव हो उनका पिंजरा लागत बचाने के
लिए छोटे से छोटा लेते हैं। तब तक उसका ध्यान उस कारावास से हटाकर जीवन के और सुखों की ओर मोड़ने के विचार से हम उसे नये-नये व्यंजन परोस रहे थे।हिमाचल के बाग़ानों से आयी सेबों की पेटी में से चुनकर सेब, दक्षिण भारतीय इडली,बेकरी के ताज़े बिस्कुट,अमरुद, चने की दाल और जाने क्या-क्या !पर बुधई पर उन प्रलोभनों का कोई प्रभाव नहीं था। उसकी आँखों में मैं कवि शिवमंगल सिंह सुमन के शब्द पढ़ रही थी...
"हम बहता जल पीने वाले
मर जायेंगे भूखे प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक कटोरी की मैदा से।"
बुधई के लिए नया पिंजरा लेना सिर्फ ज़रुरी ही नहीं अनिवार्य हो गया था। हमनें नये पिंजरे के लिए भरी धूप में सारा बाज़ार छान मारा लेकिन व्यर्थ।एक बुधई था कि पिंजरे में घूम-घूमकर बाहर निकलने के प्रयास में अपनी चोंच सलाख़ों पर मार रहा था। इससे उसके माथे पर चोट लग गयी। वह शिशु की तरह मचल रहा था। माँ ने पिंजरे के नीचे से उसके पंजे पकड़ लिए , मैंंने उसकी पूँछ पकड़ ली और माँ ने उसकी चोट पर पेेनसिलिन का लेप लगा दिया। बुधई के हरे माथे पर जैसे चंदन का टीका लग गया। किंतु स्वयं को छुड़ाने के इस प्रयत्न में उसका एक पंख मेरे हाथ में आ गया।
उस रात बुधई को नया पिंजरा न मिल सका।रात भर वह उसी पिंजरे में चुपचाप पड़ा रहा। पर सलाख़ों को भेदने की कोशिश शायद सारी रात चलती रही, क्योंकि सुबह तक उसके माथे की चोट और गहरी हो गयी थी। उस पर रक्त की लालिमा भी आ गयी थी। उसका मूक विद्रोह देखकर पीड़ा हुई।क्या अधिकार था हमें अपने मनोरंजन के लिए उसे उसके प्राकृतिक अधिकार से वंचित रखने का!
मेरी बहन बार-बार मुझे कह रही थी कि उसे पीड़ा देकर मैं अपनी नर्क की टिकट कटा रही हूँ। स्वयं मैं उसकी विवशता से आहत थी, पर मन का एक कोना उसके मोहवश उसे रखने के लिए उकसा रहा था।
क्यों न उसे बेहतर सुविधायें देकर देखू़ं, संभव है वह खुश हो जाये! भला पिंजरे की सुविधायें भी मोहित कर सकीं हैं कभी!!
"स्वर्ण श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले"
उसकी मूक आँखों में वेदना के शब्द मुझे भेद गये...
"माँ, छोड़ दो इसे... " मैं सहसा बोल गयी।
पिंजरे में कोई दरवाज़ा नहीं था।मैंने बहेलिए को पक्षी को ग्रीवा से पकड़कर सींखचों से बाहर खींचते देखा था। उस प्रक्रिया में बेचारा निरीह प्राणी कराह भी नहीं सकता था।
माँ ने पिंजरा उतारकर उसकी सीखचें ढीली करनी शुरु की। ऊपर जहाँ घेरा छोटा था, वहाँ से तार टूट गयी और एक छेद बन गया। बुधई वहाँ से आसानी से निकल सकता था। उसकी कलाबाज़ी अब भी जारी थी। हमनें पिंजरा टेढ़ा कर दिया ताकि उसे घूमते हुए खुला हिस्सा दिख जाये। एक-दो चक्कर लगा लेने के बाद उसे वहाँ से आकाश दिखायी दे गया। वह ठिठका,और कुछ इस तरह कि किसी को पता न चल जाये, बाहर निकल गया। क्षण भर को बालकनी की मुंडेर पर बैठा, फिर टाँय-टाँय के पंचम स्वर के साथ पंख फैलाकर नीलगिरी की सबसे ऊँची टहनी पर बैठ गया। बिना किसी पूर्व तैयारी के, हम सब ने ताली बजा कर उसका अभिवादन किया।
बहुत देर तक मैं आँखें गड़ाकर हरे पत्तों के बीच उसकी हरित आभा को पहचानती रही, फिर जाने कब वह उनमें विलीन हो गया...
संध्या होते ही वहाँ से फिर पक्षियों का कलरव सुुनायी दिया, लेकिन आज उनका स्वर और भी मधुर था क्योंकि उनमें मेरे बुधई का स्वातंत्र्य गीत भी सम्मिलित था।
बुधई और मेरा इतना ही ऋणानुबंध था। मेरे घर में लगे पेड़़ का एक भी फल बुधई के नाम का नहीं था। उसने तो माँ के हाथ से खाकर उन्हें ऋण मुक्त करना था।
सड़क के किनारे बैठे बहेलिए के पिंजरे में बंद कई बुधई कब स्वतंत्र होंगे उन ऋणानुबंधों से? कब मिलेगा बुधई को उसके हिस्से का नीम का पेड़??
© भारती बब्बर
बहुत सुन्दर भारती l
ReplyDeleteकब से प्रतीक्षा थी इस दिन की👍हार्दिक बधाई और असीम शुभकामनाएं💐समय मिले तो ऐन्वे ही "ainvehi"blogspot पर घूम आइए😊
ReplyDeleteधन्यवाद 🙏
DeleteBeautifully written, Bharati, and very touching. Looking forward to many more posts.
ReplyDeleteI still remember that day when we bought the cage for him .and his voice when we set him free. He didn't get neem tree but was happy to be on eucalyptus tree just behind our house.
ReplyDelete😊👍
DeleteBahut marmsparshi.Aisi hi sundar kahaniyan,Kavitayen,Natak likhati Raho.Aashirwaad...
ReplyDeleteThanks a lot🙏
Delete"हम बहता जल पीने वाले
ReplyDeleteमर जायेंगे भूखे प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक कटोरी की मैदा से।"
Bharti bahut sundar,I liked the discription of family feelings and taking the whole story to a beautiful conclusion.I wish you all the best for your future endeavours.
Thanks🙏
Delete"हम बहता जल पीने वाले
ReplyDeleteमर जायेंगे भूखे प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक कटोरी की मैदा से।"
Bharti bahut sundar,I liked the discription of family feelings and taking the whole story to a beautiful conclusion.I wish you all the best for your future endeavours.
"हम बहता जल पीने वाले
ReplyDeleteमर जायेंगे भूखे प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक कटोरी की मैदा से।"
Bharti bahut sundar,I liked the discription of family feelings and taking the whole story to a beautiful conclusion.I wish you all the best for your future endeavours.
Thank you Bharati for giving me the insight of the thoughts going into your mind...Aai’s mind...Sunder’s mind...and his mind...our Budhai’s mind. You remember I had gone to Karnal for some official work after having Budhai in our home. I dropped you and Budhai at Aai’s place and rushed to Karnal to come back next day to meet Budhai...I spent the night thinking of Budhai first and you second. I came back the next day...and found that Budhai is gone. You said he injured himself in the small cage and you could not see him suffering and so let him off...I could not react...as I didn’t know his pain and yours too...I kept silent just wishing I could have seen him again. But today I feel you actually did good. He was meant for the higher reaches of the skies and was not supposed to be caged in that “20 Rupees” pleasure which I had bought assuming that it would make you and me happy. Thank you for giving him his skies. I feel relieved today 🙏
ReplyDelete-Sunil Babbar
Thankyou😍
Deleteबहुत ह्रदय स्पर्शी
ReplyDeleteBharti di, bahut hi sundar aur dil ko choo lene wala lekhan hai aap ka. Thanks for this treat.😍
ReplyDeleteThanks a lot, Neelam 😍🙏
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