स्मृतियों के शँख
कहते हैं न , कि बीता हुआ पल कभी लौटकर नहीं आता। लेकिन कभी-कभी तेज़ी से गुज़र गये समय के कुछ पल छिटक कर बिखर जाते हैं...और दबे रह जाते हैं , अलमारी में तह लगे कपड़ों के नीचे...या बरसों से बंद पड़े किसी किताब के पन्नों के बीच...वे पल गुज़रते नहीं , ठहर जाते हैं वहीं , इंतज़ार में , जब अचानक खींच ले कोई तह लगे कपड़ों को , या झाड़ने लगे किताब पर लगी धूल को...तब जैसे वक्त की शाख से टूटा वो पल कूदकर सामने आ खड़ा होता है , पूछता-सा कि याद हूँ मैं...? फिर , जिस काम के लिए तह लगे कपड़ेे बिखेरे या किताबें झाड़ी थी , उसे रोककर उस बिछुड़े पल को सहलाया जाता है.....
परसो कुछ यूँ ही हुआ...एक किताब में मिला एक तह लगा कागज़ और उस पर उकेरे हुए कुछ लफ़्ज़...कुछ पंक्तियाँ जो मैंने अपनी बेटी के नाम लिखी थी , जब वह उम्र के नये पड़ाव पर थी। आज वह उसे पार करके दूर निकल आयी है ...पर ये शब्द आज भी उसी के लिए हैं....
स्मृतियों के शँख
"टीन एज " की तुम्हारी हो एक चंदेरी शुरूआत,
उमंग, उल्लास, ख़्वाब और ख़्वाहिशों से
रहे ये बरस आबाद ...
सूरज भस्म कर दे सारे ग़म,
चाँद सहला जाये हर ख़्वाब,
सितारे न बुझने दे कोई ख़्वाहिश
और
खिलते रहें मन के गुलाब...
संजो लेना उन कलियों को
अपने अंतस् में कुछ यूँ ,
कि जब आये जीवन-संग्राम की
कँटीली-पथरीली डगर ,
तब,
उस पर धरते ही कदम,
उसकी चुभन से
चटक जायें वो कलियाँ...
सोख लेना उसकी गुलाबी आभा भीतर
और झड़ने देना पंखुड़ियों को राह पर...
जीवन की आपाधापी में
समय की कोई विकराल लहर
जब छोड़ जाये किनारे पर
स्मृतियों का कोई शंख
तब,
उठाकर कान से लगाना उसे...
सुनना उन कलियों की चटकन ,
फैलने देना स्मृति की महक को ऐसे ,
कि भूलकर राह की चुभन
मन बरबस कह उठे ,
"आह ! क्या दिन थे.......!! "
© भारती बब्बर
बहुत खूब, सार्थक और स्पर्शी,ऐसा केवल आप ही लिख सकती हैं👌👌👌👌🌹🌹
ReplyDeleteजी सही फ़रमाया आपने,जो भारती लिख सकती है,कोई नहीं लिख सकता👌✨💫👏
Deleteइतनी सुंदर और प्रेरक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 🙏 किन्तु मेरे प्रशंसक अज्ञात रहें, यह अन्याय है। 🙏
Deleteअज्ञात की प्रतिक्रिया तो मेरी है-नीना बहल😌
Deleteतो यहाँ स्वयं को अज्ञात क्यों रखा डियर ?
Deleteकितनी प्यारी कविता है। बहुत खूब
ReplyDeleteबहुत आभार 💖
Deleteबहोत खूब भारती I कितनी सहज कविता...
ReplyDeleteबस ऐसेही आप लिखती रहें I
शुभकामनाएं I
बहुत आभार भावना 🙏तुमने सदा ही उत्साह वर्धन किया है।
DeleteMarvelous
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏
Deleteवाह भारती👏👏👏गद्य के साथ पद्य भी बहुत ख़ूब🤗अपनी एक नज़्म बहुत ही याद आ गई,तुम्हें आई क्या😊
ReplyDeleteबहुत आभार नीना 🙏 शायद तुम उस नज़्म का ज़िक्र कर रही हो जो तुमने अपनी बिटिया के लिए लिखी है ।
DeleteWow..! Very nice ..Bharati.
ReplyDeleteThanks a lot🌹
DeleteKitna sunder likhti ho !! Khoobsoorat shuruaat k saath Pyari si Kavita, bitiya k naam...wakai...kya din the😍
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार मनु, 💝
DeleteManu
ReplyDeleteजब पहली बार पढ़ी तब टिप्पणी लिखने से पहले कुछ व्यवधान आ गया। बहुत सुन्दर लिखी है आनंदित करने वाली। सच में कभी कभी किताबों, डायरी, कभी कपड़े जो थे गये लेकिन बिना पहने रह गये, कभी मौसम बदलने पर टंगे रह गये कपड़ों की जेब आपको आपका खजाना लौटा देते हैँ ऐसा ही खजाना है ये " में खुश कित्ता जी -
Deleteललित सिराड़ी
प्रश्न उठता है की मेरी बात तुम्हारे पास कैसे पहुंचेगी How
बहुत बहुत आभार सर 🙏 आपने अपना नाम लिख दिया तो पहुँच गया आपका संदेश। आपकी प्रतिक्रिया आपका आशीर्वाद है, जिसकी सदा आवश्यकता है। 🙏
Deleteबहुत सुंदर प्रेरणादायक लिखा है भारती । पढ़कर मजा आ गया ।
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏 मुझे परिचय मिल जाता तो कितना संतोष होता...
Deleteबहुत सुंदर लिखा है। मालूम नहीं था कविता भी लिखती हो।
ReplyDeleteबहुत आभार प्रभात 🌷 जानते हो, सभी लेखकों की अभिव्यक्ति की पहली लड़ाई कविता से ही होती है ☺
DeleteBeautifully written, Bharati! ( As usual.) I'm sure K will appreciate it more and more with passing years. Thanks for sharing with us.
ReplyDeleteThanks a lot Jaya ❣️
Delete