पापाजी
साल 1970,मुम्बई।एक छह वर्षीय बच्ची को बुखार ने जकड़ लिया है। न डॉक्टर की सलाह काम आ रही है न दवाओं के नाम।खून की सभी जाँच भी सामान्य है।उन्हीं दिनों की एक फ़िल्म है , "अभिनेत्री " जिसका गीत " सा रे ग म प...प...प...प...म...ध...नी... गा रे मेरे संग मेरे साजना..." बहुत लोकप्रिय हुआ था।खिड़की की सलाखों पर सिर टिकाये यह बच्ची वही गीत गुनगुना रही है, लेकिन उस गीत की सरगम अनायास "सा...रे...ग...म...प...प...प...पापाजी..." में तबदील हो जाती है।तभी पास बैठी माँ से नज़रें मिलती है और आँखें भर आती हैं।माँ और डॉक्टर को समझते देर नहीं लगती कि वह बच्ची दरअसल अपने पापाजी की याद में विह्वल है।वह व्यक्त नहीं कर पा रही लेकिन इस मनोवैज्ञानिक कारण से उसे बार-बार बुख़ार हो रहा है।उसके पापाजी का तबादला मुंबई से बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र में हुआ था और दो महीने से वे वहीं थे।कुछ दिनों में पापाजी की वापसी के बाद बुख़ार गायब हो गया।यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वह बच्ची कौन थी !
हमारी विचारधारा, हमारे साहित्य,हमारे शास्त्र, कुलमिलाकर अभिव्यक्ति के सभी मंचों पर प्रायः माँ के विषय में, माँ के चरित्र ,समर्पण एवं त्याग के बारे में अनेक लेख या विचार सहजता से मिल जाते हैं।लेकिन पिता के विषय में जाने क्यों इतना नहीं मिलता।निस्संदेह माँ के साथ शिशु का सम्बंध जन्म से भी पहले का होता है।गर्भावस्था , प्रसव पीड़ा और शिशु के पालन-पोषण में माँ की सहनशीलता उसे पिता के अनुपात में अधिक उदात्त बनाती है।किंतु केवल इसी आधार पर पिता की भूमिका अथवा योगदान कमतर नहीं हो जाता।सच कहूँ तो यह अनुभूति मुझे पापाजी के चले जाने के बाद हुई।तब तक अनुमान नहीं था कि पापाजी का अस्तित्त्व और व्यक्तित्व मेरे भीतर तक कितना गहरा धँसा हुआ है।यह भी सच है कि पापाजी ने भी इतनी स्पष्टता से उस अंतरंगता को कभी अभिव्यक्त नहीं किया।सम्भवतः पिता और बच्चों में यह स्वाभाविक अंतर रहता ही है क्योंकि दोनों इसे ही सहज मान लेते हैं।लेकिन पापाजी के चले जाने के बाद से मुझे उनकी उपस्थिति और सामीप्य की अनुभूति बहुत अधिक होती रही है।
पापाजी का चले जाना एक अत्यंत आकस्मिक घटना थी क्योंकि न तो वे अस्वस्थ थे और न वृद्ध।पाँच सदस्यों के हमारे परिवार में वह मृत्यु की पहली घटना थी।उनके जाने के बाद उस रिक्तता ने जैसे हमें झकझोर दिया।वह दिन था 22 फरवरी 1995 ।तब पापाजी 67 वर्ष के थे।परिवार में मुख्यतः सभी बुज़ुर्गों का निधन अस्सी वर्ष की आयु के बाद ही हुआ है।इसलिए पापाजी का जाना एक तरह से हमारे लिए उनका अल्पायु में चले जाने ही था।
उनका नाम ओमप्रकाश शर्मा था।अपने जन्म की तारीख को लेकर उन्हें थोड़ा संशय था, लेकिन किसी प्रमाणपत्र के अभाव में 1 सितंबर को ही सही मान लिया गया था।वर्ष था 1928।उनके पिता श्री दयालचन्द शर्मा रेलवे में हेड क्लर्क थे।पापाजी नौ भाई-बहनों में पाँचवें स्थान पर थे।उनका जन्म रावलपिंडी में हुआ था लेकिन बचपन लाहौर में बीता।मेट्रिक तक ही पढ़ पाए थे कि विभाजन की विभीषिका ने नौकरी करने के लिए विवश कर दिया।तब वे 19 वर्ष के थे।उस समय अपने पैरों पर खड़े होने के संघर्ष ने परिवार से जो दूर किया,उसने कभी लौटकर साथ रहने का मौका दिया ही नहीं।केंद्र सरकार की नौकरी में वे देशभर घूमते रहे।जन्म से ही और कुछ तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के कारण वे जुझारू प्रवृत्ति के थे।किशोरावस्था में ही देश की आज़ादी और विस्थापना ने उनके आचरण में क्रांतिकारी गुणों का बीजारोपण कर दिया।उन्हीं दिनों वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये जिससे ये गुण राष्ट्रभक्ति में परिवर्तित और पल्लवित हुए जो अंत तक बने रहे।इन सद्गुणों को हमनें भी विरासत में ग्रहण किया।विवाह से सम्बंधित दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों के चलते वे विवाह नहीं करना चाहते थे लेकिन अपने एक घनिष्ठ मित्र विट्ठल गावस्कर की छोटी बहन शांता से भेंट होने पर यह मत बदल दिया और अपनी शर्तों के साथ उससे विवाह कर लिया।पापाजी के संदर्भ में अनपेक्षित न होते हुए भी रूढ़िवादी पंजाबी परिवार में उन दिनों यह साहसिक और क्रांतिकारी कदम था।
उनके भाइयों से हमें पता लगा कि बचपन में पापाजी बालसुलभ शरारतें तो बहुत करते ही थे, साथ ही स्पष्टवादी और हठी स्वभाव के थे।ग़लत बात को ग़लत कहने में संकोच करना तो असंभव ही था, वे तो दूसरों को भी अपनी राय बदल देने के लिए आश्वस्त और विवश कर देते।इसलिए सब ने उनका नाम हुल्लड़ रख दिया था।यह पता लगने के बाद हम भी पापाजी के साथ खूब हँसा करते।यूँ तो वे अपने इन आदतों के कारण गरम स्वभाव के समझे जाते थे लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कुछ बातों को लेकर वे बहुत जल्दी भावुक हो जाते।अपरिचित बेटियों की विदाई देखकर ही उनकी आँखें सजल हो जाती थी।किसी अनजाने परिवार और व्यक्ति के लिए बेटियों को विदा कर देने की प्रथा उन्हें भावविह्वल कर देती थी।मेरे विवाह के दिन भी विदाई के समय पापाजी जाने कहाँ थे...
अपनी बेटियों के साथ उनका रवैया सदा उन्मुक्त रहा।हम लड़कियाँ हैं इसलिए हमें किसी विशेष तरीके से व्यवहार करना चाहिए या किन्हीं वर्जनाओं में रहना चाहिए ऐसा कभी अपेक्षित नहीं रहा।एक सुसंस्कृत मध्यमवर्गीय परिवार के संस्कार हममें जन्म से स्वभावतः रहे ही हैं।उनकी ओर से हमें अपने पसंद की शिक्षा ग्रहण करने और अपनी ही पसंद से विवाह करने का अधिकार था।मेरे पति के साथ उनका सम्बन्ध और व्यवहार मेरे विवाह के पहले से ही काफी उन्मुक्त और स्नेहसिक्त था।इतना ही नहीं अपने शौक पूरा करने में हमें उनका समर्थन और प्रोत्साहन दोनों मिला।जब मेरा रुझान रंगमंच की ओर हुआ पापाजी ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया।उसी दौरान मुझे जालंधर दूरदर्शन की एक टेलीफिल्म में मुख्य भूमिका करने का प्रस्ताव मिला था तब पापाजी मुझे जालंधर लेकर भी गये और स्वयं दूरदर्शन अधिकारियों से बात की।दुर्भाग्यवश पंजाब में आतंकवाद के कारण वह फ़िल्म रुक गयी।मुझे इस बात का खेद सदैव रहेगा कि मुझे लेखिका के तौर पर उभरते हुए देखने के लिए वे नहीं रहे।कभी आई की अनुपस्थिति में हमनें बनाया खाना खाते तो बेहद बढ़चढ़कर प्रशंसा करते। दफ़्तर से आकर कहते कि मेरे दोस्त पूछ रहे थे कि आज खाना किसने बनाया, सब्ज़ी बहुत स्वादिष्ट बनी है ! वैचारिक और व्यावहारिक स्तर पर वे अपने समय से आगे थे।उन्हें दकियानूसी बातों और रूढ़िवादी रीति-रिवाज़ों से चिढ़ थी।कहते थे कि दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और हम रूढ़ियों में ही धँसे रहेंगे।
पापाजी को नन्हें शिशु बेहद प्यारे थे,नन्हें यानि घुटनों पर रेंगने वाले।उनको लगता था कि घर में उस उम्र का शिशु हमेशा रहे तो जीने का मज़ा आ जाये ! आई को भी बच्चे प्रिय थे इसीलिए हम जहाँ भी रहे आसपड़ोस के नन्हें बच्चों से गहरा सरोकार रहा।वे उन चुनिंदा पुरुषों में से थे जो घर के कामकाज को केवल स्त्री की ज़िम्मेदारी नहीं समझते थे।आई के साथ घर के कामों में हमेशा हाथ बँटाते थे।सब्ज़ियाँ काटना,पूरियाँ या पकौड़े तलना तो जैसे उनका ही काम होता। जब मिक्सर नहीं था तब इडली-डोसे का आटा ग्राइंडर पर पीसकर देना,और जब वॉशिंग मशीन नहीं थी तब आई के साथ चादरें, पर्दे आदि धुलवाने जैसे काम वे करते थे।उन्हें अपना काम स्वयं करने की आदत थी।अपने कपड़े खुद ही धोते।यहाँ तक कि अपने कपड़ों की उधड़न इत्यादि खुद ही सी लेते।तब हँसी-हँसी में कहते कि जुम्मन चाचा आये हैं जो सम्भवतः किसी दरज़ी का नाम था।
देश के विभाजन की पीड़ा उनके व्यक्तित्त्व में गहरी धँसी हुई थी।अपनी बातचीत में कई बार लाहौर की बातें करते और तब उनकी आँखों की कोर नम हो जाती।एक बार चंडीगढ़ में एक सामाजिक संस्था "ज्ञान प्रबोधिनी " की ओर से उन्हें बच्चों के साथ स्वतंत्रता तथा विभाजन से सम्बंधित अपने अनुभव साँझा करने के लिए आमंत्रित किया गया।बोलते-बोलते वे अतीत में कहीं दूर चले गये थे तब मैंने महसूस किया कि उनके हृदय में कहीं एक टीस है जो उजागर नहीं हो सकी।अपनी जड़ों से कट जाने का दंश तो कई बार जाने-अनजाने व्यक्त हो जाता।विशेषतः जब एक राज्य से स्थानांतरित होकर दूर किसी नये राज्य के शहर में जाने की तैयारी होती तब वे गुनगुनाते..." मुसाफ़िर हूँ यारों न घर है ना ठिकाना...." तब लगता था और आज भी लगता है कि काश उन्हें एक बार लाहौर जाकर अपने घर को फिर देखने का अवसर मिल पाता ! यूँ पाकिस्तान जाने का मुझे कोई शौक नहीं है लेकिन उनका मोहल्ला और घर देख आने की एक हल्की-सी ख़्वाहिश ज़रूर है।
लाहौर उन दिनों फ़िल्म उद्योग का केंद्र था।पापाजी के पास तत्कालीन सितारों से सम्बंधित कई किस्से थे।यही नहीं, स्वयं वे एक विज्ञापन देखकर अपने एक मित्र के साथ फ़िल्म में काम करने की गरज़ से दिये गए पते पर पहुँच गये थे....ये और बात है कि वह विज्ञापन फर्जी निकला क्योंकि उस पते पर टूटी हुई कुर्सी मेज़ों के अलावा कुछ नहीं था।उन्होंने ही यह किस्सा हमें सुनाया जो हमारे परिवार में अक्सर हँसी-मज़ाक का विषय बनता रहता।वे भी यह कहकर ठहाके लगाते कि हम स्टार-किड्ज़ बनते-बनते रह गये !!! पापाजी का शुमार ख़ूबसूरत मर्दों की गिनती में होता था, वे थे ही इतने ख़ूबसूरत।
एक गजब का गुण जो उनमें था वह है समय की पाबंदी।उनके दफ़्तर में तो यह बात प्रचलित थी कि जैसे ही वे पहुँचते, उनके सहयोगी कहते कि अपनी घड़ी मिला लो शर्मा जी आ गये यानि नौ बज गये।मुझे गर्व है कि यह बात मैंने भी उनसे आत्मसात की है और लोगों से यही शब्द मैं अपने लिये भी सुन चुकी हूँ।उन्होंने सिखाया था कि जो समय तुम्हें दिया जाये, स्वयं के लिए आधा घन्टा पहले मान लो,इससे कभी देर नहीं होगी और वह अतिरिक्त समय बोनस होगा।
पापाजी ने स्वयं को कभी बूढों में नहीं गिना।एक दिन उन्होंने अपनी हथेली के ऊपर की त्वचा को चुटकी से पकड़ते हुए मुझसे कहा कि ये ऐसी इकट्ठी क्यों हो रही है ? मैंने कहा ,पापाजी बुढ़ापे में त्वचा ऐसी हो ही जाती है।उनकी अनायास प्रतिक्रिया थी - "होती होगी, पर मेरी क्यों हो रही है...!" अगले ही दिन सवेरे उनका ब्रेन हेमरेज हो गया और वे कोमा में चले गए... दो दिन बाद वे अनन्त में विलीन हो गए।हमारे मानस में उनकी छवि युवा ही रही क्योंकि न उनके बालों में सफेदी आयी थी और न व्यवहार में बुढ़ापा।अलबत्ता उनके चले जाने के बाद मुझे कई ऐसे पारलौकिक अनुभव हुए जिससे मुझे उनसे मिलने जैसी अनुभूति हुई।उन अनुभवों को तार्किक दृष्टि से सिध्द न कर सकने के बावजूद उन्हें केवल छद्म अथवा कल्पना कहकर नकारा नहीं जा सकता।मुझे निश्चित तौर पर इस बात का विश्वास तथा सन्तोष है कि मरणोपरांत भी पापाजी मेरे साथ मानस और आत्मा से सम्पर्क में हैं।इस पारलौकिक अनुभव को मैंने शब्दबद्ध किया है जिसे इसी ब्लॉग पर " उस पार का सच " शीर्षक के अंतर्गत पढ़ा जा सकता है।
आज भी वही तारीख है... तीस साल पहले का वह दिन मानस में आज भी ताज़ा है... पापाजी का हँसता-खिलखिलाता चेहरा उससे भी ज़्यादा ताज़ा है, और रहेगा....
© भारती बब्बर
Wo aj ka hi din tha hum kese bhul sakte hai🙏
ReplyDeleteसच है, उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। आभार आपका 🙏
Deleteअत्यंत सुंदर लेखन👌अभिभूत!मैं भी हर वक़्त यही दुआ करती हूँ कि अगर कोई अगला जन्म हो तो यही माता पिता मुझे मिलें, यही परिवार और यही मित्र❤️
ReplyDeleteईश्वर हमारी यह कामना पूरी करे, ताकि इस जन्म में छूटे हुए पलों की भरपायी कर सकें। कितना कुछ तो अधूरा छोड़ गये... 🙏
Deleteबहुत सुंदर दिल को छू लेने वाला लेखन ।
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏
Delete👌👌क्या डूब कर लिखती हो! बहुत खूब ।
ReplyDeleteबहुत आभार 🙏
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