माइक्रोवेव
वह मनोहर साहब से मिलने के लिये सचमुच आतुर थी।आख़िर कोई तो मिला जो उनके प्रोजेक्ट में पैसा लगाने को तैयार हुआ।उस दिन जब रौशन ने आकर बताया कि मनोहर साहब तैयार हो गए हैं तो उसकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह वही रही। वह खुशी से उछ्ली नहीं, 'अच्छी बात है ' कहकर काम में लगी रही। तैयार तो सभी हो जाते हैं, लगाएंगे सच में तो मानें। शहर की उन्नति, विकास, इतिहास, भूगोल, चरित्र, लोककला और भविष्य की संभावनाओं को लेकर वृत्तचित्रों की श्रृंखला बनाने का प्रोजेक्ट था। कुछ निजी कम्पनियों ने इसमें रुचि तो ली, किन्तु कम्पनी के नियमानुसार वे स्पॉन्सर कर सकते थे,निर्माण नहीं। उन्होंने रौशन को भरोसा दिलाया था कि वे स्पॉन्सरशिप के तौर पर अच्छी रक़म दे सकते हैं, अलबत्ता निर्माण का खर्च रौशन को ही करना होगा। रौशन की मनोहर साहब से इसी संदर्भ में मुलाक़ात होती रही। एकता ने कहा रौशन से, 'तुम ज़्यादा उतावले मत होना उनके सामने , जैसे तुम्हें ही ज़रूरत है ! ' रौशन हँसा , 'हमें नहीं है ज़रूरत तो किसे है ? ' ' तुम ये न समझो कि वो तुम्हारी ज़रूरत के लिए लगायेंगे । वो लगायेंगे अपने लिये, वसूल करेंगे ...