बुधई
बुधई मेरी लिखने-पढ़ने वाली मेज़ पर रखे क़लमदान में एक हरा पंख सजा है। प्राचीन नाटकों और ऐतिहासिक रचनाओं में कवियों को पक्षियों के सुंदर पंखों से काव्य रचनाओं की सृष्टि करते, राजाओं को ताड़पत्रों पर पंखों से राज-संदेश लिखते और वियोगिनी नायिकाओं को अपने प्रियतम को पंखों से प्रेम संदेश लिखते पढ़ा-सुना है। मेरी मेज़ पर रखा यह एकाकी पंख इनमें से कोई उद्देश्य सार्थक नहीं करता। उसे हाथ में लेकर सहलाती हूँ तो सोचती हूँ सुदूर आकाश के वक्ष में किल्लोल करता बुधई मेरे स्पर्श का अनुभव करता हो! उसकी नन्हीं-सी देह में मेरी इस सहलाहट से स्पंदन होता हो! आकाश में मुक्त विचरण कर रहे असंख्य पक्षियों के समूह का एक हिस्सा बना बुधई अपने उस नन्हें से पंख से मेरी मेज़ और मेरे मानस पर अपना स्थान बना चुका है। पशुओं के प्रति मेरे प्यार के चलते मेरे परिचित मुझे पालतू कुत्ते रखने में पारंगत समझते हैं। लेकिन यह तब की बात है जब पशु-पक्षी पालने के संदर्भ में मेरा अनुभव शून्य था। तब नन्हें-नन्हें पिल्लों या रंगबिरंगी मुनिया को देखकर ममता से उन्हें पालने की इच्छा अनेक बार होती, परंतु हर बार उनके उन्मुक्त जीवन में ममत...