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माइक्रोवेव

 वह मनोहर साहब से मिलने के लिये सचमुच आतुर थी।आख़िर कोई तो मिला जो उनके प्रोजेक्ट में पैसा लगाने को तैयार हुआ।उस दिन जब रौशन ने आकर बताया कि मनोहर साहब तैयार हो गए हैं तो उसकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह वही रही। वह खुशी से उछ्ली नहीं, 'अच्छी बात है ' कहकर काम में लगी रही। तैयार तो सभी हो जाते हैं, लगाएंगे सच में तो मानें।  शहर की उन्नति, विकास, इतिहास, भूगोल, चरित्र, लोककला और भविष्य की संभावनाओं को लेकर वृत्तचित्रों की श्रृंखला बनाने का प्रोजेक्ट था। कुछ निजी कम्पनियों ने इसमें रुचि तो ली, किन्तु कम्पनी के नियमानुसार वे स्पॉन्सर कर सकते थे,निर्माण  नहीं। उन्होंने रौशन को भरोसा दिलाया था कि वे स्पॉन्सरशिप के तौर पर अच्छी रक़म दे सकते हैं, अलबत्ता निर्माण का खर्च रौशन को ही करना होगा। रौशन की मनोहर साहब से इसी संदर्भ में मुलाक़ात होती रही। एकता ने कहा रौशन से, 'तुम ज़्यादा उतावले मत होना उनके सामने , जैसे तुम्हें ही ज़रूरत है ! ' रौशन हँसा , 'हमें नहीं है ज़रूरत तो किसे है ? ' ' तुम ये न समझो कि वो तुम्हारी ज़रूरत के लिए लगायेंगे । वो लगायेंगे  अपने लिये, वसूल करेंगे ...

चींटियाँ

 दिल्ली वह पहली बार नहीं आया,दर्जनों बार आ चुका है, और हर बार दिल्ली आते ही पहली प्रतिक्रिया यही होती है; उफ्फ! इतनी भीड़! उस भीड़ में व्यक्ति की एक इकाई की हैसियत मानों ख़त्म हो गयी थी, वह सिर्फ़ उस भीड़ का हिस्सा था। वह सोचता रहा कि इतने लोग एक ही वक्त में एक ही दिशा की तरफ क्योंं बढ़ते जा रहे हैं। फिर दूसरे ही पल अपने बारे में सोचा, उसे तो  बस अड्डे होकर आगे पाँच घण्टे का सफर तय करना है। इनमें से हर कोई पता नहीं कहाँ जा रहा हो...सब एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं लेकिन मंज़िलें अलग-अलग। उसके सामने ब्लू लाईन बस आकर रुक गयी। वह पीछे हट गया। पीछे से एक हुजूम धक्का देता हुआ आगे बढ़ गया और क्षण भर में पहले से ठसाठस भरी हुई बस में जाने कहाँ समा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, बस स्टाॅप पर अब भी उतनी ही भीड़ थी।उसने एक आटोरिक्शा ले ली। बस स्टाॅप पर खड़े रहते हुए धूप का गुनगुना स्पर्श अच्छा लग रहा  था,पर रिक्शा में बैठते ही सरसराती हवा की ठण्डक उसे कंपकंपी देने लगी थी। उसने घड़ी देखी, बारह बज रहे थे। चण्डीगढ़ पहुँचते-पहुँचते रात तो हो ही जाएगी। साउथ दिल्ली की साफ-सुथरी सड़कें पिछली रात ...

स्मृतियों के शँख

  कहते हैं न , कि बीता हुआ पल कभी लौटकर नहीं आता। लेकिन कभी-कभी तेज़ी से गुज़र गये समय के कुछ पल छिटक कर बिखर जाते हैं...और दबे रह जाते हैं , अलमारी में तह लगे कपड़ों के नीचे...या बरसों से बंद पड़े किसी किताब के पन्नों के बीच...वे पल गुज़रते नहीं , ठहर जाते हैं वहीं ,  इंतज़ार में , जब अचानक खींच ले कोई तह लगे कपड़ों को , या झाड़ने लगे किताब पर लगी धूल को...तब जैसे वक्त की शाख से टूटा वो पल कूदकर सामने आ खड़ा होता है , पूछता-सा कि याद हूँ मैं...? फिर , जिस काम के लिए तह लगे कपड़ेे बिखेरे या किताबें झाड़ी थी , उसे रोककर उस बिछुड़े पल को सहलाया जाता है..... परसो कुछ यूँ ही हुआ...एक किताब में मिला एक तह लगा कागज़ और उस पर उकेरे हुए कुछ लफ़्ज़...कुछ पंक्तियाँ जो मैंने अपनी बेटी के नाम लिखी थी , जब वह उम्र के नये पड़ाव पर थी। आज वह उसे पार करके दूर निकल आयी है ...पर ये शब्द आज भी उसी के लिए हैं.... स्मृतियों के शँख "टीन एज " की तुम्हारी हो एक चंदेरी शुरूआत, उमंग, उल्लास, ख़्वाब और ख़्वाहिशों से रहे ये बरस आबाद  ... सूरज भस्म कर दे सारे ग़म, चाँद सहला जाये हर ख़्वाब, सि...

पापाजी

साल 1970,मुम्बई।एक छह वर्षीय बच्ची को बुखार ने जकड़ लिया है। न डॉक्टर की सलाह काम आ रही है न दवाओं के नाम।खून की सभी जाँच भी सामान्य है।उन्हीं दिनों की एक फ़िल्म है , "अभिनेत्री " जिसका गीत " सा रे ग म प...प...प...प...म...ध...नी... गा रे मेरे संग मेरे साजना..." बहुत लोकप्रिय हुआ था।खिड़की की सलाखों पर सिर टिकाये यह बच्ची वही गीत गुनगुना रही है, लेकिन उस गीत की सरगम अनायास "सा...रे...ग...म...प...प...प...पापाजी..." में तबदील हो जाती है।तभी पास बैठी माँ से नज़रें मिलती है और आँखें भर आती हैं।माँ और डॉक्टर को समझते देर नहीं लगती कि वह बच्ची दरअसल अपने पापाजी की याद में विह्वल है।वह व्यक्त नहीं कर पा रही लेकिन इस मनोवैज्ञानिक कारण से उसे बार-बार बुख़ार हो रहा है।उसके पापाजी का तबादला मुंबई से बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र में हुआ था और दो महीने से वे वहीं थे।कुछ दिनों में पापाजी की वापसी के बाद बुख़ार गायब हो गया।यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वह बच्ची कौन थी ! हमारी विचारधारा, हमारे साहित्य,हमारे शास्त्र, कुलमिलाकर अभिव्यक्ति के सभी मंचों पर प्रायः माँ के विषय में, माँ क...

मेरी आई

आई....दो अक्षरों का यह एक शब्द मेरे लिए एक वटवृक्ष के उस बीज की तरह है जो अपने भीतर एक विशाल वृक्ष का उद्भव समेटे है।जब तक आई साक्षात थी तब तक ये भान नहीं था क्योंकि तब ये मालूम ही नहीं था कि उसके बिना जीवन कैसा होगा !  आई का जन्म कोंकण महाराष्ट्र के तत्कालीन रत्नागिरी ज़िले ( अब सिंधुदुर्ग ) के वेंगुरला तहसील के उभा दाण्डा गाँव में 1 जुलाई 1936 को हुआ था।उनके पिता श्री गोविंद नारायण गावस्कर गाँव में किराने की दुकान चलाते थे।उनके चार बेटों और दो बेटियों में आई सबसे छोटी थी।आई के सबसे बड़े भाई श्री जयवंत गावस्कर उनसे उन्नीस वर्ष बड़े थे।जब आई नौ बरस की थी उनके पिता का साया सर से उठ गया।तब उन्हीं बड़े भाई ने,जो तब विवाहित थे, पिता का स्थान सहजता से ग्रहण कर लिया।उन्हें सब अण्णा बुलाया करते थे।अपने परिवार के लिए अण्णा हमेशा पितातुल्य ही रहे।मेरे पिता भी उन्हें अपना साला न समझकर श्वसुर का मान दिया करते थे और हमारे लिए वे नाना और मामी नानी की जगह रहे,हालाँकि हमारी नानी तब जीवित थीं।नानी का निधन 1979 में बयासी वर्ष की आयु में हुआ। नाना के असमय निधन के बाद सारा परिवार मुंबई आ गया।आई ने गाँव म...

हरसिंगार

डॉक्टर के चले जाने के बाद भी आभा देर तक बरामदे में ही बैठी रही।मेज़ पर चाय की जूठी प्यालियों के नीचे मेडिकल रिपोर्ट के पन्ने फड़फड़ाते रहे।कमरे से टीवी चलने की आवाज़ आ रही थी लेकिन आभा के कानों में सिर्फ डॉक्टर के शब्द गूँज रहे थे..." तुम्हें विनय को सम्भालना होगा आभा..." अन्ततः उसका डर सच साबित हो ही गया। आभा ने रिपोर्ट उठाकर लिफाफे में डाली और भीतर आ गयी।विनय भावशून्य-सा टकटकी लगाये टीवी देख रहा था।पल भर आभा को लगा कि वह डॉक्टर के आने के बारे में कुछ पूछेगा लेकिन विनय ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया।विनय की यही चुप्पी उसे खटकने लगी है।डॉक्टर ने आभा से इसकी आदत डाल लेने को कहा है लेकिन लगातार बोलने वाले विनय की यह ख़ामोशी आभा को बहुत परेशान करती है।अब विनय अपनी ओर से कोई बात नहीं करता,आभा कुछ पूछे तब भी कम से कम शब्दों में उत्तर देता है या कभी-कभी कोई प्रतिक्रिया ही नहीं देता।आभा को लगने  लगा है जैसे घर के भीतर विनय और वह अलग-अलग द्वीपों पर रह रहे हैं। विनय की सेवानिवृत्ति के बाद उसने सोचा था कि जीवन की आपाधापी में एकसाथ रह सकने के उन गुमशुदा पलों की भरपायी अब हो सकेगी जो दोनों चा...

जादू वाला बर्तन

 डिगरी की सुबह से सिट्टीपिट्टी ग़ुम है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा कि अब आगे क्या होगा या हो सकता है। जो कुछ उसने देखा वह जादू से कम नहीं था। वह अभी तक स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पा रही कि ऐसा हो सकता है लेकिन आँखों देखी को कैसे झुठला दे ! सचमुच दुनिया में क्या-क्या होता है...वह तो कल्पना में भी वहाँ तक नहीं पहुँच पाती। डिगरी ने ईजा और बाबा को बताया तो सही लेकिन उन्होंने कितना समझा या उसपर कितना भरोसा किया पता नहीं। वह तो तब से खाट पर लेटे-लेटे बस वही सोच रही है। अब तो वह लाल बंगले की ओर जाने का साहस भी नहीं कर सकती। लाल बंगले का असल नाम कुछ और ही है लेकिन उसकी छत सुर्ख लाल रंग की है इसलिए प्रायः सभी उसे लाल बंगला ही कहते हैं। सिर्फ डाकिये को उसका अंग्रेज़ी नाम याद रहता है क्योंकि वह वहाँ अक्सर ही चिट्ठियाँ देने जाता है। वह बंगला किसी सरकारी विभाग के तहत है इसलिए सरकार के बड़े-बड़े अफसर वहाँ रहने आते हैं। हमेशा डिगरी ही सबको दूध देने जाती है, लेकिन अब... उस बंगले में रहने वाला परिवार कहाँ का है वह नहीं जानती। यूँ भी उसे अपने गाँव या घर के अलावा किसी जगह की जानकारी है ही नहीं। वह कभी स्कूल भी...