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Showing posts from October, 2025

चींटियाँ

 दिल्ली वह पहली बार नहीं आया,दर्जनों बार आ चुका है, और हर बार दिल्ली आते ही पहली प्रतिक्रिया यही होती है; उफ्फ! इतनी भीड़! उस भीड़ में व्यक्ति की एक इकाई की हैसियत मानों ख़त्म हो गयी थी, वह सिर्फ़ उस भीड़ का हिस्सा था। वह सोचता रहा कि इतने लोग एक ही वक्त में एक ही दिशा की तरफ क्योंं बढ़ते जा रहे हैं। फिर दूसरे ही पल अपने बारे में सोचा, उसे तो  बस अड्डे होकर आगे पाँच घण्टे का सफर तय करना है। इनमें से हर कोई पता नहीं कहाँ जा रहा हो...सब एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं लेकिन मंज़िलें अलग-अलग। उसके सामने ब्लू लाईन बस आकर रुक गयी। वह पीछे हट गया। पीछे से एक हुजूम धक्का देता हुआ आगे बढ़ गया और क्षण भर में पहले से ठसाठस भरी हुई बस में जाने कहाँ समा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, बस स्टाॅप पर अब भी उतनी ही भीड़ थी।उसने एक आटोरिक्शा ले ली। बस स्टाॅप पर खड़े रहते हुए धूप का गुनगुना स्पर्श अच्छा लग रहा  था,पर रिक्शा में बैठते ही सरसराती हवा की ठण्डक उसे कंपकंपी देने लगी थी। उसने घड़ी देखी, बारह बज रहे थे। चण्डीगढ़ पहुँचते-पहुँचते रात तो हो ही जाएगी। साउथ दिल्ली की साफ-सुथरी सड़कें पिछली रात ...

स्मृतियों के शँख

  कहते हैं न , कि बीता हुआ पल कभी लौटकर नहीं आता। लेकिन कभी-कभी तेज़ी से गुज़र गये समय के कुछ पल छिटक कर बिखर जाते हैं...और दबे रह जाते हैं , अलमारी में तह लगे कपड़ों के नीचे...या बरसों से बंद पड़े किसी किताब के पन्नों के बीच...वे पल गुज़रते नहीं , ठहर जाते हैं वहीं ,  इंतज़ार में , जब अचानक खींच ले कोई तह लगे कपड़ों को , या झाड़ने लगे किताब पर लगी धूल को...तब जैसे वक्त की शाख से टूटा वो पल कूदकर सामने आ खड़ा होता है , पूछता-सा कि याद हूँ मैं...? फिर , जिस काम के लिए तह लगे कपड़ेे बिखेरे या किताबें झाड़ी थी , उसे रोककर उस बिछुड़े पल को सहलाया जाता है..... परसो कुछ यूँ ही हुआ...एक किताब में मिला एक तह लगा कागज़ और उस पर उकेरे हुए कुछ लफ़्ज़...कुछ पंक्तियाँ जो मैंने अपनी बेटी के नाम लिखी थी , जब वह उम्र के नये पड़ाव पर थी। आज वह उसे पार करके दूर निकल आयी है ...पर ये शब्द आज भी उसी के लिए हैं.... स्मृतियों के शँख "टीन एज " की तुम्हारी हो एक चंदेरी शुरूआत, उमंग, उल्लास, ख़्वाब और ख़्वाहिशों से रहे ये बरस आबाद  ... सूरज भस्म कर दे सारे ग़म, चाँद सहला जाये हर ख़्वाब, सि...