चींटियाँ
दिल्ली वह पहली बार नहीं आया,दर्जनों बार आ चुका है, और हर बार दिल्ली आते ही पहली प्रतिक्रिया यही होती है; उफ्फ! इतनी भीड़! उस भीड़ में व्यक्ति की एक इकाई की हैसियत मानों ख़त्म हो गयी थी, वह सिर्फ़ उस भीड़ का हिस्सा था। वह सोचता रहा कि इतने लोग एक ही वक्त में एक ही दिशा की तरफ क्योंं बढ़ते जा रहे हैं। फिर दूसरे ही पल अपने बारे में सोचा, उसे तो बस अड्डे होकर आगे पाँच घण्टे का सफर तय करना है। इनमें से हर कोई पता नहीं कहाँ जा रहा हो...सब एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं लेकिन मंज़िलें अलग-अलग। उसके सामने ब्लू लाईन बस आकर रुक गयी। वह पीछे हट गया। पीछे से एक हुजूम धक्का देता हुआ आगे बढ़ गया और क्षण भर में पहले से ठसाठस भरी हुई बस में जाने कहाँ समा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, बस स्टाॅप पर अब भी उतनी ही भीड़ थी।उसने एक आटोरिक्शा ले ली। बस स्टाॅप पर खड़े रहते हुए धूप का गुनगुना स्पर्श अच्छा लग रहा था,पर रिक्शा में बैठते ही सरसराती हवा की ठण्डक उसे कंपकंपी देने लगी थी। उसने घड़ी देखी, बारह बज रहे थे। चण्डीगढ़ पहुँचते-पहुँचते रात तो हो ही जाएगी। साउथ दिल्ली की साफ-सुथरी सड़कें पिछली रात ...