जादू वाला बर्तन
डिगरी की सुबह से सिट्टीपिट्टी ग़ुम है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा कि अब आगे क्या होगा या हो सकता है। जो कुछ उसने देखा वह जादू से कम नहीं था। वह अभी तक स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पा रही कि ऐसा हो सकता है लेकिन आँखों देखी को कैसे झुठला दे ! सचमुच दुनिया में क्या-क्या होता है...वह तो कल्पना में भी वहाँ तक नहीं पहुँच पाती। डिगरी ने ईजा और बाबा को बताया तो सही लेकिन उन्होंने कितना समझा या उसपर कितना भरोसा किया पता नहीं। वह तो तब से खाट पर लेटे-लेटे बस वही सोच रही है। अब तो वह लाल बंगले की ओर जाने का साहस भी नहीं कर सकती। लाल बंगले का असल नाम कुछ और ही है लेकिन उसकी छत सुर्ख लाल रंग की है इसलिए प्रायः सभी उसे लाल बंगला ही कहते हैं। सिर्फ डाकिये को उसका अंग्रेज़ी नाम याद रहता है क्योंकि वह वहाँ अक्सर ही चिट्ठियाँ देने जाता है। वह बंगला किसी सरकारी विभाग के तहत है इसलिए सरकार के बड़े-बड़े अफसर वहाँ रहने आते हैं। हमेशा डिगरी ही सबको दूध देने जाती है, लेकिन अब... उस बंगले में रहने वाला परिवार कहाँ का है वह नहीं जानती। यूँ भी उसे अपने गाँव या घर के अलावा किसी जगह की जानकारी है ही नहीं। वह कभी स्कूल भी...