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सुबह की भूमिका

 सुबह चाय की चुस्कियों के साथ खिड़की के पास बैठकर बाहर झाँकने का अपना ही आनन्द है । मुझे लगता है सुबह के समय जीवन का वास्तविक स्वरूप उजागर होता है , अपने भीतर भी और अपने आसपास भी । दिनचर्या की शुरुआत होती है इसलिए एक उमंग तो होती ही है , हर सुबह नये दिन की नयी भूमिका लिखी जाती है । पर किसी जीवन की हर सुबह एक जैसी हो तो ? हर रोज एक नियम, एक ही लकीर , भूमिका भी वही और दिन का उपसंहार भी वही ... बीच में संघर्ष की कहानी , कभी छोटी कभी बड़ी । ऐसी बहुत जीवनियाँ हैं हमारे आसपास । सामने की चार मंज़िला इमारत में सुबह-सुबह बहुत चहल-पहल रहती है । निचली मंज़िल पर मैकडॉनल्ड्स के पारदर्शी द्वार पर " ओपन " की तख़्ती लटकाकर एक सरीखी पोशाक वाले लड़के-लड़कियों के चेहरे खिले हुए हैं । तथाकथित आधुनिक फ़ैशन के फटेहाल पश्चिमी परिधान में खिलखिलाते युवाओं का जमघट शुरू हो चुका है । बगल वाले प्रॉपर्टी डीलर ने भी दुकान चमका ली है । चमक उसके चेहरे पर भी है जो फोन पर उसकी ऊँची आवाज़ से बिखर रही है । आर्चीज़ की दुकान का शटर उठते ही शोकेस महँगी वस्तुओं की चमक से जगमगा उठा । बुद्ध की हज़ारों की क़ीमत वाली मूर्तियाँ , से...