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रेडियो...मेरा साथी

आज विश्व रेडियो दिवस है।रेडियो से मेरी पीढ़ी का बहुत निकट का सम्बन्ध है।कम से कम मेरे लिए तो रेडियो जीवन का बेहद महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामान्य ज्ञान की बढ़ोत्तरी के लिए भी रेडियो की भूमिका मेरे जीवन में अपरिहार्य रूप से सदा ही रही है। मेरे मानस में पहली स्मृति एक ट्रांज़िस्टर की है।तब मेरी उम्र मुश्किल से चार बरस की रही होगी।ट्रांज़िस्टर के ऊपर चमड़े का भूरे रंग का आवरण था जिसमें पकड़ने के लिए लम्बा फीता भी था।रात को खाना खाने के बाद टहलने निकलते तो उसे साथ उठा लेते।पापा उसका फीता मेरे नन्हें कन्धों पर  टाँग देते तो मैं खुशी से फूले नहीं समाती।उस उम्र में मेरे लिए वह बहुत ही विस्मयकारी और चमत्कारी चीज़ थी।मैं बहुत विस्मित हुआ करती थी कि लता मंगेशकर एक ही गीत बार-बार हू-ब-हू कैसे गा लेती है ? ! कंप्यूटर युग के बच्चों के पास मुझे बौड़म कहने के लिए यह कारण पर्याप्त है, लेकिन पचास साल पहले बचपन वाक़ई मासूम हुआ करता था। कुछ वर्षों बाद हमारे घर रेडियो आया,मरफ़ी का मेफेयर रेडियो।तब घर की ऐसी वस्तुओं को किसी त्यौहार के बहाने से खरीदा जाता था।हमारा रेडियो दशहरे के अवसर पर आ...