उस पार का सच
जीवन में हर बीतते क्षण के साथ अनुभवों पर समय की धूल परत-दर-परत जमती जाती है।अधिकांश पल उन परतों में दबकर विस्मृति के महासिंधु में विलीन हो जाते हैं।परन्तु कुछ पल उस महासिंधु में विलय के बाद भी लहरों की तरह बार-बार मानस-तट पर लौट कर आजीवन उपस्थित होते रहते हैं।उन पलों में उन आत्मीय जनों का सान्निध्य भी समाहित है जो स्वयं तो संसार के मायासागर के पार जा चुके हैं किंतु उनकी स्मृति कभी किसी सागर में विलीन नहीं होती... इस माया सागर के पार उस तट को जानने की जिज्ञासा हममें स्वाभाविक ही होती है।जाने वाले स्वयं, या लौट-लौटकर आती उनकी स्मृतियों की लहरें, तट पर कोई पदचिह्न छोड़कर नहीं जाती।उस पार का सच बताने के लिए कोई लौटकर नहीं आता...... ★★★ २२ फरवरी १९९५...अस्पताल का आपातकालीन कक्ष... पापाजी को कोमा में रहते तीन दिन हो गये हैं।सुबह के सवा दस बजे हैं।अभी-अभी मैंने पापाजी को गर्म पानी से स्पंज किया है।मैं उनकी नाक में लगी ट्यूब के ज़रिये उन्हें सिरिंज से दूध पिला रही हूँ...अचानक उनके चेहरे का गुलाबीपन कम होते-होते पीला पड़ गया...ट्यूब में पहले दूध और फिर खून लौट आया...और तभी उनकी गर्दन गोद से ख...