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किसी दिन

" मैं आ गया अम्मी..." इसी आवाज़ के अहसास के साथ सुबह रईसा की आँख खुली।आज फिर वह उसके सपने में आया था।उसे लगा हल्की-सी मुस्कान से उसके होंठ फैले हुए हैं।उसने आईना नहीं देखा, पर उसे लगा जैसे होंठों के किनारे थोड़े से खिसक गये हैं।ऐसा महसूस होते ही पल भर में होंठ सिकुड़कर वापस अपनी जगह पर आ गये।उनके सिकुड़ते ही लगा जैसे वे दोबारा सीलबंद हो गये हों। वह जब भी सपने में उसे देखती है, उसे ऐसा ही महसूस होता है।उसके वापस लौट आने की उम्मीद फिर बंध जाती है।उसकी वापसी के ख़याल से ही, उम्र से ढल चुकी छाती में वह दोबारा कसाव महसूस करती।उसे लगता है अगर सचमुच उसके सामने आ गया तो उसकी सूखी छाती से दोबारा दूध की धार बह निकलेगी।ऐसा सोचते ही बरबस उसका हाथ छाती पर पहुँच जाता।ऐसा जाने कब से हो रहा है...उसे याद भी नहीं।पहले,जब तक वह था,तारीख जानने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी।उसका चेहरा देखकर सवेरा होता और उसके काम से लौटते ही वह समझ जाती, शाम हो गयी।वक़्त का पहिया जैसे उसी के इर्दगिर्द घूमता था।अब, जब वह नहीं है तो समय जानकर  भी क्या करना है उसे!न जाने तो ही बेहतर।एक-एक दिन,सुबह-शाम का हिसाब रखती तो...घड़ियों...