अतिथि देवो भव:
१९७७ में रानीखेत की एक सर्द रात।लगभग आठ बजे का समय।हम खाना खाने की तैयारी में थे।तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।भला जंगल में इतनी रात को कौन है!ये तो तय था कि कोई बाहरी व्यक्ति है क्योंकि पड़ोसी होते तो सीढ़ियों के तरफ वाले दरवाज़े से आते।दस्तक मुख्य द्वार पर थी।पिताजी ने उठकर दरवाज़ा खोला।घुप्प अंधेरे में एक आकृति उभरी।फौजी वर्दी में एक नवयुवक था। "गुड इवनिंग सर," इस अभिवादन के साथ उसने अपना परिचय दिया।वह कमांडो ट्रेनिंग कर रहा एक फौजी जवान था।ट्रेनिंग के दौरान एक एक्सरसाइज़ के लिए अकेले ही जंगल में घूमते हुए अंधेरे में रास्ता भटक गया था। उसकी वर्दी देखते ही पिताजी ने उसे भीतर आने को कहा।पहले तो वह हिचकिचाया,फिर माँ का आग्रह सुनकर आ गया।उसने बताया कि वह सुबह से निकला हुआ है।उसके पास पानी की एक छोटी-सी बोतल,एक चाकू,रस्सी का एक टुकड़ा और माचिस की एक डिबिया के अतिरिक्त कुछ नहीं था।इतनी सीमित वस्तुओं के साथ जंगल में घूमकर अपनी राह तलाश कर मंज़िल तक पहुँचना उसके प्रशिक्षण का हिस्सा था। हम बहुत उत्सुकता से उसकी बातें सुनते रहे।पिताजी ने उसे मॉल रोड का रास्ता बताया।वह आभार प्रकट करते हुए उठने ल...