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दो पंछी दो तिनके

  " दो पंछी दो तिनके कहो लेके चले हैं कहाँ,ये बनाएंगे इक आशियाँ......."बरसों पहले ये गीत आया था।तब भी और इतने सालों बाद आज भी ये गीत मन में एक पुलक जगाता है।जीवन की रुमानियत, साँझापन, ताउम्र किसी के साथ रहकर सुख की बयार और दुःखों के झंझावात झेलने के अनुभवों की गुदगुदाहट का अनुभव होता है।शायद इसीलिए नीड़, बसेरा, घरौंदा, घोंसला,आशियाना जैसे शब्द स्निग्ध-सी अनुभूति दे जाते हैं।घोंसला बनाने की पंछियों की कार्यकुशलता यूँ भी विस्मयकारी और प्रेरणास्पद है।     नये घर में आने के बाद मैं भी इस स्निग्ध अनुभव को जीने लगी।कमरों की सजावट को तो अलबत्ता इस उत्साह का साक्षी होना ही था,मेरे लिए सबसे सुखकर अनुभव था अपनी बालकनी को फूलों और पौधों से भरना।मिट्टी से कई मीटर ऊपर रहकर स्वयं को मिट्टी से जुड़े रहने की प्रतीति देना,ठीक वैसे ही जैसे आकाश से दूर होते हुए भी बालकनी में खड़े होकर स्वयं को उसके क़रीब समझना।वहाँ से पक्षियों का कलरव भी सुनती और आकाश में उनके निर्बाध आलोड़न का दूरस्थ आनन्द भी लेती।उन्हें आकर्षित करने के लिए रंग-बिरंगे फूलों से भरे गमलों के बीच मैंने उनके लिए दाना-पानी रख दिया।क...