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कितने सालों में

 कितने सालों में बस रुकती तब तक सूर्योदय हो चुका था। यूँ सूरज की मुलायम किरणें कुछ पहले से ही  सामने की पहाड़ियों पर दिखने लगी। हमारी बस पहाड़ी के पश्चिमी तरफ वाली सड़क पर है, इसलिए सूरज के सीधे दर्शन नहीं हो सकते।किंतु सामने की पहाड़ियाँ सूरज के स्वागत की घोषणा कर चुकी हैं। दूर से पहाड़ी गाँवों का अंदाज़ा भर लग रहा है, लेकिन मेरी कल्पना बहुत कुछ देख पा रही है।कनस्तरों की बनी बालटियों में गदहरों से पानी भरती लड़कियाँ,बकरी या गाय चराते बालक...धूप के टुकड़े पर उकडूँ बैठे बीड़ी पीते पुरुष....घरों की छतों से निकलते धुएँ से चूल्हे के पास लोहे की नली से फूँक मारकर आग सुलगाती गृहिणी की कल्पना ....ये सभी चित्र मेरे मानस में सहज ही बन गये। चायना-व्यू  पर उतरने वाली सवारी हम ही हैं। पहले दिल्ली से आते हुए बस में कोई परिचित अवश्य मिल जाता था, परंतु इस बार ऐसी अपेक्षा करना ही बेकार है। पूरे पंद्रह वर्षों बाद दोबारा रानीखेत जाने का संयोग बना है। हम  पहले की तरह छोटे रास्ते से ही ऊपर चढ़ गये। दिन के आरंभ होने की कहीं कोई गतिविधि नहीं है। चीड़ के पेड़ भी स्तब्ध हैं, सुबह ने जैसे दस...