कारगिल विजय दिवस पर...
बाज़ी लगाये जान की सरहद पर मैं खड़ा हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ रेत की हो आँधियाँ, या बर्फ की हवायें समन्दर से भी मेरी हैं सरहद पे निगाहें हर पल मैं अपनी वर्दी का फर्ज़ निभा रहा हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ ना यारी ज़िदगी से, ना खौफ़ मौत का है मुझे तो बस जुनून एक तेरी हिफ़ाज़त का है मैं वतन की मिट्टी का कर्ज़ चुका रहा हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ संगीन उठी है मेरी सिर्फ़ तेरी हिफ़ाज़त में सर झुका है मेरा बस वतन की इबादत में फिर क्यों मैं तेरे हाथों के पत्थर का निशाना हूँ अमन का हूँ सिपाही ,वतन का बाँकुरा हूँ तिरंगे से लिपटी ये सिर्फ़ लाश नहीं है मेरी बच्चों की बिखरी ख्व़ाहिशों की भी है ये ढेरी अपनी बीवी के टूटे घरौंदे का एक निशां हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ माँ भारती का ये आँचल आसमाँ में ही लहराये ताबूत से लिपट कर ज़मीं पे ये ना आये मैं तिरंगे की इसी शान पर आमादा हूँ अमन का हूँ सिपाही वतन का बाँकुरा हूँ। © भारती बब्बर