Posts

Showing posts from July, 2021

कारगिल विजय दिवस पर...

बाज़ी लगाये जान की सरहद पर मैं खड़ा हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ रेत की हो आँधियाँ, या बर्फ की हवायें समन्दर से भी मेरी हैं सरहद पे निगाहें हर पल मैं अपनी वर्दी का फर्ज़ निभा रहा हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ ना यारी ज़िदगी से, ना  खौफ़ मौत का है मुझे तो बस जुनून एक तेरी हिफ़ाज़त का है मैं वतन की मिट्टी का कर्ज़ चुका रहा हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ संगीन उठी है मेरी सिर्फ़ तेरी हिफ़ाज़त में सर झुका है मेरा बस वतन की इबादत में फिर क्यों मैं तेरे हाथों के पत्थर का निशाना हूँ अमन का हूँ सिपाही ,वतन का बाँकुरा हूँ तिरंगे से लिपटी ये सिर्फ़ लाश नहीं है मेरी बच्चों की बिखरी ख्व़ाहिशों की भी है ये ढेरी अपनी बीवी के टूटे घरौंदे का एक निशां हूँ अमन का हूँ सिपाही, वतन का बाँकुरा हूँ माँ भारती का ये आँचल आसमाँ में ही लहराये ताबूत से लिपट कर ज़मीं पे ये ना आये मैं  तिरंगे की इसी शान पर आमादा हूँ अमन का हूँ सिपाही वतन का बाँकुरा हूँ।  © भारती बब्बर

लोखंडवाला...हाशिये पर

रजिस्टर के फटे पन्ने सरीखी लंबी सड़क के किनारे लाल लक़ीर से बने हाशिये जैसा फुटपाथ है...  पन्ने पर लिखने वाले हाशिया छोड़ देते हैं क्योंकि,  हाशिया लिखने के लिए नहीं,  सिर्फ़ रिमार्क के लिए है या फिर,  दस्तख़त के नीचे तारीख़ डालने के लिए।  पर इस सड़क के हाशिये पर बने इस फुटपाथ पर ये दस्तख़त किसके हैं?  तारीख़ कौन-सी है??  और  रिमार्क???  लोखंडवाला में एक घने, छायादार पेड़ के नीचे घर है , उसका,  छोटा-सा...  दीवारें न भी हों तो क्या!  सवेरे देखती हूँ उसे तरकारी काटते, या दाल छौंकते...  सूखी लकड़ियाँ जाने कहाँ से बीनती है वह!  धौंकता है उसका चूल्हा, और छौंक से छींकती है वह...  एक मुस्कुराहट से मुड़कर देखती है कोई और भी छींका क्या?  लाल रेलिंग पर बँधी मच्छरदानी है जिसके भीतर उसका 'घरवाला' खर्राटे भर रहा है,  जवान होते छोकरे ऊँघ रहे हैं...  वह चौका निपटा रही है इससे पहले कि उसकी रसोई को रंग-बिरंगे चप्पल-जूतों की चापें भर जायेे।  पेड़ संभाले खड़ा है  उसकी पूरी गृहस्थी को किचन कॅबिनेट की तरह...